यूसुफ · 62/111
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूसुफ
وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ فِي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَا إِذَا انقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ ۝٦٢
Wa qaala lifityaanihij `aloo bidaa`atahum fee rihaalihim la`allahum ya`rifoonahaaa izan qalabooo ilaaa ahlihim la`allahum yarji`oon
📖 हिंदी अर्थ
और हम ज़रुर इस काम को पूरा करेंगें और यूसुफ ने अपने मुलाज़िमों (नौकरों) को हुक्म दिया कि उनकी (जमा) पूंजी उनके बोरो में (चूपके से) रख दो ताकि जब ये लोग अपने एहलो (अयाल) के पास लौट कर जाएं तो अपनी पूंजी को पहचान ले

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فِتْيَانِهِ (अपने सेवकों/नौकरों से) — यहाँ यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) के ख़ादिमों और काम करने वालों की ओर इशारा है।
  • بِضَاعَتَهُمْ (उनका माल/सामान) — इससे मुराद वह राशि या सामान है जो उन्होंने अनाज के बदले में दिया था, यानी उसकी कीमत।
  • رِحَالِهِمْ (उनके असबाब/सामान में) — यानी उनके काठ के बोरे या सामान रखने की जगहों में।
  • يَعْرِفُونَهَا (वे उसे पहचान लें) — यानी वे हमारी तरफ़ से एहसान और इज़्ज़त को समझ जाएँ।
  • انقَلَبُوا (जब वे लौटें) — जब वे अपने घर वापस जाएँ।
  • يَرْجِعُونَ (वे फिर आएँ) — वे दोबारा हमारे पास लौटकर आएँ।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों को अनाज दिया और उनकी ज़रूरत पूरी की, तो उन्होंने अपने सेवकों से कहा कि जो राशि या सामान उन्होंने अनाज की कीमत के तौर पर दिया है, उसे चुपचाप उनके असबाब में रख दो, ताकि जब वे अपने घर वापस पहुँचें और अपना सामान खोलें, तो उसे पाकर समझ जाएँ कि हमने उनसे कोई कीमत नहीं ली और यह हमारी तरफ़ से उनके लिए इज़्ज़त और एहसान है। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) का यह क़दम बहुत ही हिकमत-आमोज़ था — उन्होंने यह इसलिए किया ताकि जब वे लोग यह एहसान देखें, तो उनका दिल हमारी तरफ़ माइल हो और वे दोबारा हमारे पास लौटकर आएँ, और साथ में अपने भाई (बिन्यामीन) को भी लेकर आएँ, जैसा कि उन्होंने उनसे वादा लिया था। यह एक नेक चाल थी, जिसमें न तो कोई धोखा था और न ही नुक़्सान — बल्कि यह मुहब्बत, हुस्ने-अख़्लाक़ और किरदार की बुलंदी की मिसाल थी।

दावती पहलू (इस्लामी दृष्टिकोण):

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि एक मुसलमान को चाहिए कि वह दूसरों के साथ भलाई करे, चाहे सामने वाला उसका भाई हो या अजनबी। हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों के साथ जो सलूक किया, वह इस बात का सबूत है कि इस्लाम में माफ़ी, दरगुज़र और एहसान का कितना बड़ा मक़ाम है। उन्होंने अपने भाइयों के साथ पुरानी शिकायतों का बदला नहीं लिया, बल्कि उन्हें इज़्ज़त दी और उनके साथ नेकी की। यह हमारे लिए एक बेहतरीन नमूना है कि हम भी अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों और हर इंसान के साथ हुस्ने-सुलूक करें, क्योंकि अल्लाह तआला नेकी करने वालों से मुहब्बत करता है। और जब हम दूसरों के साथ भलाई करते हैं, तो अल्लाह हमारे दिलों में उनकी मुहब्बत पैदा करता है और हमारे रिश्तों को मज़बूत करता है। यही इस्लाम की रूह है — कि हम लोगों को अपनी तरफ़ नरमी, मुहब्बत और एहसान से खींचें, न कि सख़्ती और बदले से।



📜 आयत 60-64 — सूरा यूसुफ

60فَإِن لَّمْ تَأْتُونِي بِهِ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِندِي وَلَا تَقْرَبُونِ
पस अगर तुम उसको मेरे पास न लाओगे तो तुम्हारे लिए न मेरे पास कुछ न कुछ (ग़ल्ला वग़ैरह) होगा
61قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ
न तुम लोग मेरे क़रीब ही चढ़ने पाओगे वह लोग कहने लगे हम उसके वालिद से उसके बारे में जाते ही दरख्वास्त करेंगे
62وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ فِي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَا إِذَا انقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और हम ज़रुर इस काम को पूरा करेंगें और यूसुफ ने अपने मुलाज़िमों (नौकरों) को हुक्म दिया कि उनकी (जमा) पूंजी उनके बोरो में (चूपके से) रख दो ताकि जब ये लोग अपने एहलो (अयाल) के पास लौट कर जाएं तो अपनी पूंजी को पहचान ले
63فَلَمَّا رَجَعُوا إِلَىٰ أَبِيهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَا أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
(और इस लालच में) यायद फिर पलट के आएं ग़रज़ जब ये लोग अपने वालिद के पास पलट के आए तो सब ने मिलकर अर्ज़ की ऐ अब्बा हमें (आइन्दा) गल्ले मिलने की मुमानिअत (मना) कर दी गई है तो आप हमारे साथ हमारे भाई (बिन यामीन) को भेज दीजिए
64قَالَ هَلْ آمَنُكُمْ عَلَيْهِ إِلَّا كَمَا أَمِنتُكُمْ عَلَىٰ أَخِيهِ مِن قَبْلُ ۖ فَاللَّهُ خَيْرٌ حَافِظًا ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ
ताकि हम (फिर) गल्ला लाए और हम उसकी पूरी हिफाज़त करेगें याक़ूब ने कहा मै उसके बारे में तुम्हारा ऐतबार नहीं करता मगर वैसा ही जैसा कि उससे पहले उसके मांजाए (भाई) के बारे में किया था तो ख़ुद उसका सबसे बेहतर हिफाज़त करने वाला है और वही सब से ज्यादा रहम करने वाला है
यूसुफकुरान सूची
111आयत
मक्कीअवतरण स्थान
62आयत

अनुवाद — यूसुफ 62

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Friday, October 2, 2026

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