यूसुफ · 61/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ ۝٦١
Qaaloo sanuraawidu `anhu abaahu wa innaa lafaa`iloon
📖 हिंदी अर्थ
न तुम लोग मेरे क़रीब ही चढ़ने पाओगे वह लोग कहने लगे हम उसके वालिद से उसके बारे में जाते ही दरख्वास्त करेंगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَنُرَاوِدُ: हम प्रयास करेंगे, कोशिश करेंगे, माँगेंगे।
  • عَنْهُ: उसके बारे में (बिन्यामीन के बारे में)।
  • أَبَاهُ: उसके पिता (हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम) से।
  • وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ: और हम निश्चित रूप से करने वाले हैं (अपना वादा पूरा करेंगे)।

तफ़सीर:

जब हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम ने अपने भाइयों से कहा कि अगली बार जब तुम आओ तो अपने सौतेले भाई (बिन्यामीन) को भी साथ लेकर आना, और यदि ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारे लिए मेरे पास कोई अनाज नहीं होगा, तो भाइयों ने जवाब में यह वादा किया। उन्होंने कहा: "हम अपने पिता से उसे (बिन्यामीन को) माँगने का पूरा प्रयास करेंगे। हम उन्हें मनाने की हर संभव कोशिश करेंगे, चाहे जिस तरह से भी हो। हम इस मामले में किसी भी कमी को नहीं छोड़ेंगे और जो आपने हमें आदेश दिया है, उसे हम पूरा करेंगे।"

यह उनका उत्तर था, जिसमें उन्होंने अपनी सामर्थ्य और इरादे का भरोसा दिलाया। हालाँकि, वे जानते थे कि उनके पिता बिन्यामीन को उनके साथ भेजने में बहुत सावधानी बरतेंगे, क्योंकि पहले यूसुफ़ के बारे में उन्होंने जो कुछ खोया था, उसका दर्द अभी भी उनके दिल में था। फिर भी, उन्होंने यूसुफ़ को आश्वस्त किया कि वे इस काम में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि वादे को पूरा करने का इरादा और उसके लिए प्रयास करना बहुत बड़ी नेकी है। भाइयों ने भले ही बाद में अपने वादे में कमी की, लेकिन उन्होंने पहले पूरे इरादे से वादा किया था।
  2. यह हमें सिखाता है कि किसी कठिन काम को करने के लिए हमें पूरी कोशिश और मेहनत करनी चाहिए, और अगर कोई बाधा आए तो उसे दूर करने के लिए हर संभव उपाय अपनाने चाहिए।
  3. इस आयत में पिता (हज़रत याक़ूब) के प्रति सम्मान और उनसे बात करने का अच्छा तरीका भी दिखाया गया है। भाइयों ने कहा कि हम "अपने पिता से" माँगेंगे, जो उनके सम्मान को दर्शाता है।
  4. यह हमें सिखाता है कि जब किसी ज़िम्मेदारी को लिया जाए, तो उसे पूरी गंभीरता से लेना चाहिए और कहा गया काम करके ही दम लेना चाहिए।


📜 आयत 59-63 — यूसुफ

59وَلَمَّا جَهَّزَهُم بِجَهَازِهِمْ قَالَ ائْتُونِي بِأَخٍ لَّكُم مِّنْ أَبِيكُمْ ۚ أَلَا تَرَوْنَ أَنِّي أُوفِي الْكَيْلَ وَأَنَا خَيْرُ الْمُنزِلِينَ
और जब यूसुफ ने उनके (ग़ल्ले का) सामान दुरूस्त कर दिया और वह जाने लगे तो यूसुफ़ ने (उनसे कहा) कि (अबकी आना तो) अपने सौतेले भाई को (जिसे घर छोड़ आए हो) मेरे पास लेते आना क्या तुम नहीं देखते कि मै यक़ीनन नाप भी पूरी देता हूं और बहुत अच्छा मेहमान नवाज़ भी हूँ
60فَإِن لَّمْ تَأْتُونِي بِهِ فَلَا كَيْلَ لَكُمْ عِندِي وَلَا تَقْرَبُونِ
पस अगर तुम उसको मेरे पास न लाओगे तो तुम्हारे लिए न मेरे पास कुछ न कुछ (ग़ल्ला वग़ैरह) होगा
61قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ
न तुम लोग मेरे क़रीब ही चढ़ने पाओगे वह लोग कहने लगे हम उसके वालिद से उसके बारे में जाते ही दरख्वास्त करेंगे
62وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ فِي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَا إِذَا انقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और हम ज़रुर इस काम को पूरा करेंगें और यूसुफ ने अपने मुलाज़िमों (नौकरों) को हुक्म दिया कि उनकी (जमा) पूंजी उनके बोरो में (चूपके से) रख दो ताकि जब ये लोग अपने एहलो (अयाल) के पास लौट कर जाएं तो अपनी पूंजी को पहचान ले
63فَلَمَّا رَجَعُوا إِلَىٰ أَبِيهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَا أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
(और इस लालच में) यायद फिर पलट के आएं ग़रज़ जब ये लोग अपने वालिद के पास पलट के आए तो सब ने मिलकर अर्ज़ की ऐ अब्बा हमें (आइन्दा) गल्ले मिलने की मुमानिअत (मना) कर दी गई है तो आप हमारे साथ हमारे भाई (बिन यामीन) को भेज दीजिए
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अनुवाद — यूसुफ 61

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Tuesday, August 18, 2026

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