यूसुफ · 63/111
अनुवाद उच्चारण — यूसुफ
فَلَمَّا رَجَعُوا إِلَىٰ أَبِيهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَا أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ ۝٦٣
Falammaa raja`ooo ilaaa abeehim qaaloo yaaa abaanaa muni`a minnal kailu fa arsil ma`anaaa akhaanaa naktal wa innaa lahoo lahaafizoon
📖 हिंदी अर्थ
(और इस लालच में) यायद फिर पलट के आएं ग़रज़ जब ये लोग अपने वालिद के पास पलट के आए तो सब ने मिलकर अर्ज़ की ऐ अब्बा हमें (आइन्दा) गल्ले मिलने की मुमानिअत (मना) कर दी गई है तो आप हमारे साथ हमारे भाई (बिन यामीन) को भेज दीजिए

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • الكَيْل – नापकर अनाज दिया जाना, यहाँ इसका अर्थ अनाज (खाद्यान्न) है।
  • نَكْتَلْ – हम अनाज नापकर लाएँ।
  • لَحَافِظُونَ – हम उसकी रक्षा करने वाले हैं, उसे सुरक्षित वापस लाने का वचन देते हैं।

व्याख्या:

जब ये भाई अपने पिता (हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम) के पास वापस लौटे, तो उन्होंने जाकर बताया कि मिस्र के अज़ीज़ (यूसुफ़ अलैहिस्सलाम) ने उनका बड़ा सम्मान किया और उन्हें खूब अनाज दिया। फिर उन्होंने कहा: "पिता जी! हमारे लिए अनाज लाना बंद कर दिया गया है, अर्थात् जब तक हम अपने भाई (बिन्यामीन) को साथ नहीं लाएँगे, हमें अनाज नहीं मिलेगा। इसलिए आप हमारे साथ हमारे भाई को भेज दीजिए, ताकि हम उसे साथ ले जाकर भरपूर अनाज ला सकें। और हम आपको वचन देते हैं कि हम उसकी पूरी रक्षा करेंगे और उसे सुरक्षित आपके पास वापस ले आएँगे।"

ये भाई अपने पिता से यह आग्रह इसलिए कर रहे थे क्योंकि मिस्र के अज़ीज़ ने उनसे कहा था कि यदि तुम अपने उस भाई को साथ नहीं लाओगे जिसका ज़िक्र तुमने किया है, तो तुम्हें अनाज नहीं दिया जाएगा। उन्होंने अपने पिता को यह भी बताया कि अज़ीज़ ने उनके साथ अच्छा व्यवहार किया और उन्हें सम्मान दिया। साथ ही, उन्होंने अपने भाई की सुरक्षा का ज़िम्मा भी लिया, हालाँकि उनके दिलों में पहले की तरह कोई बुरी नीयत नहीं थी, बल्कि वे सचमुच अनाज लाने के लिए उसे साथ ले जाना चाहते थे।

शिक्षाएँ और फ़ायदे:

  1. इस आयत से हमें सीख मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में परिवार के सदस्यों को आपसी सहयोग और भाईचारे से काम लेना चाहिए। भाई अपने पिता से विनम्रता और सम्मान के साथ बात कर रहे हैं, जो हमें सिखाता है कि माता-पिता से बात करने का अंदाज़ नरम और आदरपूर्ण होना चाहिए।
  2. वचन और ज़िम्मेदारी का पालन करना इस्लाम की महत्वपूर्ण शिक्षा है। भाइयों ने अपने पिता को वचन दिया कि वे बिन्यामीन की रक्षा करेंगे, और यह हमें सिखाता है कि जो वादा किया जाए, उसे निभाना चाहिए।
  3. जीवन में ज़रूरतें पूरी करने के लिए प्रयास करना और साधन जुटाना इस्लाम में मना नहीं है, बल्कि यह एक अच्छा काम है। भाई अनाज लाने के लिए प्रयास कर रहे थे, जो उनकी ज़िम्मेदारी और परिश्रम को दर्शाता है।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि मुसीबत और तंगी के समय में निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि हल निकालने की कोशिश करनी चाहिए। भाइयों ने अपने पिता को समझाकर समाधान निकाला, जो हमें सिखाता है कि समस्याओं का सामना धैर्य और समझदारी से करना चाहिए।


📜 आयत 61-65 — यूसुफ

61قَالُوا سَنُرَاوِدُ عَنْهُ أَبَاهُ وَإِنَّا لَفَاعِلُونَ
न तुम लोग मेरे क़रीब ही चढ़ने पाओगे वह लोग कहने लगे हम उसके वालिद से उसके बारे में जाते ही दरख्वास्त करेंगे
62وَقَالَ لِفِتْيَانِهِ اجْعَلُوا بِضَاعَتَهُمْ فِي رِحَالِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَعْرِفُونَهَا إِذَا انقَلَبُوا إِلَىٰ أَهْلِهِمْ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
और हम ज़रुर इस काम को पूरा करेंगें और यूसुफ ने अपने मुलाज़िमों (नौकरों) को हुक्म दिया कि उनकी (जमा) पूंजी उनके बोरो में (चूपके से) रख दो ताकि जब ये लोग अपने एहलो (अयाल) के पास लौट कर जाएं तो अपनी पूंजी को पहचान ले
63فَلَمَّا رَجَعُوا إِلَىٰ أَبِيهِمْ قَالُوا يَا أَبَانَا مُنِعَ مِنَّا الْكَيْلُ فَأَرْسِلْ مَعَنَا أَخَانَا نَكْتَلْ وَإِنَّا لَهُ لَحَافِظُونَ
(और इस लालच में) यायद फिर पलट के आएं ग़रज़ जब ये लोग अपने वालिद के पास पलट के आए तो सब ने मिलकर अर्ज़ की ऐ अब्बा हमें (आइन्दा) गल्ले मिलने की मुमानिअत (मना) कर दी गई है तो आप हमारे साथ हमारे भाई (बिन यामीन) को भेज दीजिए
64قَالَ هَلْ آمَنُكُمْ عَلَيْهِ إِلَّا كَمَا أَمِنتُكُمْ عَلَىٰ أَخِيهِ مِن قَبْلُ ۖ فَاللَّهُ خَيْرٌ حَافِظًا ۖ وَهُوَ أَرْحَمُ الرَّاحِمِينَ
ताकि हम (फिर) गल्ला लाए और हम उसकी पूरी हिफाज़त करेगें याक़ूब ने कहा मै उसके बारे में तुम्हारा ऐतबार नहीं करता मगर वैसा ही जैसा कि उससे पहले उसके मांजाए (भाई) के बारे में किया था तो ख़ुद उसका सबसे बेहतर हिफाज़त करने वाला है और वही सब से ज्यादा रहम करने वाला है
65وَلَمَّا فَتَحُوا مَتَاعَهُمْ وَجَدُوا بِضَاعَتَهُمْ رُدَّتْ إِلَيْهِمْ ۖ قَالُوا يَا أَبَانَا مَا نَبْغِي ۖ هَٰذِهِ بِضَاعَتُنَا رُدَّتْ إِلَيْنَا ۖ وَنَمِيرُ أَهْلَنَا وَنَحْفَظُ أَخَانَا وَنَزْدَادُ كَيْلَ بَعِيرٍ ۖ ذَٰلِكَ كَيْلٌ يَسِيرٌ
और जब उन लोगों ने अपने अपने असबाब खोले तो अपनी अपनी पूंजी को देखा कि (वैसे ही) वापस कर दी गई है तो (अपने बाप से) कहने लगे ऐ अब्बा हमें (और) क्या चाहिए (देखिए) यह हमारी जमा पूंजी हमें वापस दे दी गयी है और (ग़ल्ला मुफ्त मिला अब इब्ने यामीन को जाने दीजिए तो) हम अपने एहलो अयाल के वास्ते ग़ल्ला लादें और अपने भाई की पूरी हिफाज़त करेगें और एक बार यतर ग़ल्ला और बढ़वा लाएंगें
यूसुफकुरान सूची
111आयत
मक्कीRevelation
63आयत

अनुवाद — यूसुफ 63

सूरा यूसुफ आयत 63 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (और इस लालच में) यायद फिर पलट के आएं ग़रज़…

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Tuesday, August 18, 2026

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