Mishary Rashid Alafasy
✓
Mahmoud Khalil Al-Husary
✓
Abdurrahman As-Sudais
✓
Mohamed Siddiq Al-Minshawi
✓
Abdul Basit Abdul Samad
✓
Ali Al-Hudhaify
✓
Ahmed ibn Ali al-Ajamy
✓
Abu Bakr Ash-Shaatree
✓
Muhammad Ayyoub
✓
Abdullah Basfar
✓
Abdullah Al-Juhani
✓
Maher Al Muaiqly
✓
अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- هَلْ عَلِمْتُمْ: क्या तुम जानते हो / क्या तुम्हें पता है
- مَا فَعَلْتُم: जो कुछ तुमने किया
- بِيُوسُفَ وَأَخِيهِ: यूसुफ़ और उसके भाई के साथ
- إِذْ أَنتُمْ جَاهِلُونَ: जब तुम अज्ञानी थे (अर्थात् तुम्हें अपने किए की बुराई का ज्ञान नहीं था)
तफ़सीर:
जब यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों की यह बात सुनी कि वे अपने छोटे भाई (बिन्यामीन) के लिए कितने दुखी और व्याकुल हैं, और वे कह रहे हैं कि हमें उसके बिना रहा नहीं जाता, तो उनका दिल पिघल गया और उन्होंने अपने भाइयों पर दया की। उन्होंने अपनी पहचान प्रकट करने का निर्णय लिया और उनसे कहा: "क्या तुम्हें याद है कि तुमने यूसुफ़ और उसके भाई के साथ क्या किया था?" उन्होंने उन्हें उस समय की याद दिलाई जब उन्होंने यूसुफ़ को कुएँ में डाला था और उसके भाई को उससे अलग कर दिया था, और यह सब उन्होंने उस समय किया जब वे अज्ञानता में थे — अर्थात् उन्हें अपने इस कृत्य की बुराई और उसके दुष्परिणाम का ज्ञान नहीं था। यह कहकर यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने उन्हें उनके अतीत के कुकर्म की याद दिलाई, लेकिन उन्हें बुरा भला नहीं कहा, बल्कि उनकी अज्ञानता का हवाला देकर उनके बहाने को स्वीकार किया और उन्हें उनके किए पर शर्मिंदा किया, ताकि वे स्वयं अपनी गलती का एहसास करें और तौबा करें।
फ़ायदे:
- इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि क्षमा और दया का भाव रखना चाहिए। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों के साथ हुए अत्याचार के बावजूद उन्हें अपमानित नहीं किया, बल्कि नर्मी और दया से उन्हें उनकी गलती का एहसास कराया।
- अज्ञानता को एक बहाना बनाया जा सकता है, और यह सिखाता है कि इंसान को अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और दूसरों की गलतियों पर विचार करते समय उनकी परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए।
- यह आयत हमें सिखाती है कि जब हम किसी को उसकी गलती याद दिलाएँ, तो उसे शर्मिंदा करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुधारने और उसकी भलाई के लिए याद दिलाएँ।
- इस्लाम में रिश्तों की अहमियत है — चाहे कितनी ही बड़ी नाराज़गी क्यों न हो, रिश्तों को जोड़ने और माफ़ करने की कोशिश करनी चाहिए। यूसुफ़ (अलैहिस्सलाम) ने अपने भाइयों को माफ़ कर दिया और उनके साथ भलाई की, जो हमारे लिए एक आदर्श है।
- यह आयत यह भी बताती है कि अल्लाह तआला अपने नबी को ऐसा उच्च चरित्र प्रदान करता है जो दुश्मनों के साथ भी नेकी करता है, और यही इस्लाम की रूह है — माफ़ करना, दया करना और भलाई करना।
📜 आयत 87-91 — सूरा यूसुफ
अनुवाद — यूसुफ 89
सूरा यूसुफ आयत 89 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (अब तो यूसुफ से न रहा गया) कहा तुम्हें कुछ…सूरा आयत 89/111 — सूरा यूसुफ يوسف (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा यूसुफ सुनें, सूरा यूसुफ अनुवाद, सूरा यूसुफ mp3, सूरा यूसुफ pdf. आयत 87–91. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
अपनी नेक दुआओं में हमें मत भूलिए


