अर-राद · 24/43
अनुवाद उच्चारण — अर-राद
سَلَامٌ عَلَيْكُم بِمَا صَبَرْتُمْ ۚ فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ ۝٢٤
Salaamun `alaikum bimaa sabartum; fani`ma `uqbad daar
📖 हिंदी अर्थ
और सलाम अलैकुम (के बाद कहेगें) कि (दुनिया में) तुमने सब्र किया (ये उसी का सिला है देखो) तो आख़िरत का घर कैसा अच्छा है
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سَلَامٌ عَلَيْكُمْ: तुम पर सलामती हो, तुम हर बुराई से सुरक्षित रहे।
  • بِمَا صَبَرْتُمْ: उस सब्र के बदले में जो तुमने किया।
  • فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ: तो कितना अच्छा बदला है इस आख़िरत के घर का।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मोमिन लोग जन्नत में दाख़िल होंगे, तो फ़रिश्ते उनका स्वागत करते हुए कहेंगे: "तुम पर सलामती हो, तुम हर तकलीफ़, हर ग़म और हर बुराई से महफ़ूज़ रहे। यह सब कुछ उस सब्र की बदौलत है जो तुमने दुनिया में किया।"

यानी उन्होंने अल्लाह की इताअत (आज्ञापालन) पर सब्र किया, गुनाहों से बचने पर सब्र किया, और अल्लाह की तरफ़ से आने वाली मुसीबतों और तकलीफ़ों पर भी सब्र किया। उन्होंने दुनिया की आसानियों और ख़्वाहिशों को छोड़कर आख़िरत की भलाई को तरजीह दी। इसी सब्र की वजह से आज उन्हें यह शानदार इनाम मिला है।

फिर अल्लाह तआला फ़रमाता है: "तो कितना अच्छा बदला है इस आख़िरत के घर का!" यानी जन्नत का अंजाम कितना खूबसूरत और बेहतरीन है। दुनिया में जो मेहनत और मुश्किलें उठाईं, उनका बदला यहाँ इतनी बड़ी नेअमतों और आराम की शक्ल में मिला कि वह सारी तकलीफ़ें भूल गए। जैसे कहा जाता है: "वहाँ तकलीफ़ उठाई, तो यहाँ आराम मिला।"

फ़ायदे (सबक):

  1. सब्र की अज़ीमुल-शान फज़ीलत है — यह जन्नत तक पहुँचाने वाला ज़रिया है। जो इंसान दुनिया में सब्र करता है, अल्लाह उसे आख़िरत में ऐसा मुक़ाम अता करता है जहाँ फ़रिश्ते उसका स्वागत करते हैं।
  2. जन्नत की नेअमतें सिर्फ़ अमल का नतीजा नहीं, बल्कि अल्लाह का फ़ज़ल और करम हैं, जो वह अपने सब्र करने वाले बंदों को देता है।
  3. दुनिया की मुश्किलें और तकलीफ़ें अस्थायी हैं, और आख़िरत का इनाम उन सब से बेहतर और पाइदार है। इसलिए मोमिन को चाहिए कि वह दुनिया की आरामतलबी पर आख़िरत की भलाई को तरजीह दे।
  4. फ़रिश्तों का मोमिनों के लिए सलाम और दुआएँ करना इस बात की दलील है कि अल्लाह के नेक बंदे उसकी रहमत और मुहब्बत से घिरे हुए हैं — यह बात दिल को सुकून और इत्मीनान देती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 22-26 — अर-राद

22وَالَّذِينَ صَبَرُوا ابْتِغَاءَ وَجْهِ رَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَنفَقُوا مِمَّا رَزَقْنَاهُمْ سِرًّا وَعَلَانِيَةً وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عُقْبَى الدَّارِ
और (ये) वह लोग हैं जो अपने परवरदिगार की खुशनूदी हासिल करने की ग़रज़ से (जो मुसीबत उन पर पड़ी है) झेल गए और पाबन्दी से नमाज़ अदा की और जो कुछ हमने उन्हें रोज़ी दी थी उसमें से छिपाकर और खुल कर ख़ुदा की राह में खर्च किया और ये लोग बुराई को भी भलाई स दफा करते हैं -यही लोग हैं जिनके लिए आख़िरत की खूबी मख़सूस है
23جَنَّاتُ عَدْنٍ يَدْخُلُونَهَا وَمَن صَلَحَ مِنْ آبَائِهِمْ وَأَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ ۖ وَالْمَلَائِكَةُ يَدْخُلُونَ عَلَيْهِم مِّن كُلِّ بَابٍ
(यानि) हमेशा रहने के बाग़ जिनमें वह आप जाएॅगे और उनके बाप, दादाओं, बीवियों और उनकी औलाद में से जो लोग नेको कार है (वह सब भी) और फरिश्ते बेहश्त के हर दरवाजे से उनके पास आएगें
24سَلَامٌ عَلَيْكُم بِمَا صَبَرْتُمْ ۚ فَنِعْمَ عُقْبَى الدَّارِ
और सलाम अलैकुम (के बाद कहेगें) कि (दुनिया में) तुमने सब्र किया (ये उसी का सिला है देखो) तो आख़िरत का घर कैसा अच्छा है
25وَالَّذِينَ يَنقُضُونَ عَهْدَ اللَّهِ مِن بَعْدِ مِيثَاقِهِ وَيَقْطَعُونَ مَا أَمَرَ اللَّهُ بِهِ أَن يُوصَلَ وَيُفْسِدُونَ فِي الْأَرْضِ ۙ أُولَٰئِكَ لَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوءُ الدَّارِ
और जो लोग ख़ुदा से एहद व पैमान को पक्का करने के बाद तोड़ डालते हैं और जिन (तालुकात बाहमी) के क़ायम रखने का ख़ुदा ने हुक्म दिया है उन्हें क़तआ (तोड़ते) करते हैं और रुए ज़मीन पर फ़साद फैलाते फिरते हैं ऐसे ही लोग हैं जिनके लिए लानत है और ऐसे ही लोगों के वास्ते बड़ा घर (जहन्नुम) है
26اللَّهُ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ وَفَرِحُوا بِالْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا فِي الْآخِرَةِ إِلَّا مَتَاعٌ
और ख़ुदा ही जिसके लिए चाहता है रोज़ी को बढ़ा देता है और जिसके लिए चाहता है तंग करता है और ये लोग दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी पर बहुत निहाल हैं हालॉकि दुनियावी ज़िन्दगी (नईम) आख़िरत के मुक़ाबिल में बिल्कुल बेहकीक़त चीज़ है
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अनुवाद — अर-राद 24

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Tuesday, August 18, 2026

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