अन-नहल · 52/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَلَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَتَّقُونَ ۝٥٢
Wa lahoo maa fis samaawaati wal ardi wa lahud deenu waasibaa; afaghairal laahi tattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में हैं (ग़रज़) सब कुछ उसी का है और ख़ालिस फरमाबरदारी हमेशा उसी को लाज़िम (जरूरी) है तो क्या तुम लोग ख़ुदा के सिवा (किसी और से भी) डरते हो
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا: अल्लाह ही के लिए है दीन (आज्ञाकारिता, इबादत और एकाग्रता), हमेशा और स्थायी रूप से।
  • تَتَّقُونَ: तुम डरते हो या उससे बचाव चाहते हो (अर्थात भय और आदर के साथ उसकी पूजा करते हो)।

तफ़सीर:

आकाशों और धरती में जो कुछ भी है—चाहे वह सृष्टि हो, स्वामित्व हो या प्रबंधन—सब कुछ अकेले अल्लाह ही का है। वही इन सबका रचयिता, स्वामी और संचालक है। इसी प्रकार, पूर्ण आज्ञाकारिता, विनम्रता, इबादत और एकाग्रता (दीन) भी अकेले उसी के लिए है, और यह हमेशा और स्थायी रूप से उसी पर लागू होती है—किसी भी समय या परिस्थिति में यह किसी और के लिए उचित नहीं है।

फिर अल्लाह तआला इस पर एक प्रश्नवाचक अंदाज़ में डाँटते हुए फरमाता है: "क्या तुम अल्लाह के अलावा किसी और से डरते हो?" यह एक इन्कारी प्रश्न है, जिसका अर्थ है: यह कैसे संभव है कि जब सब कुछ अल्लाह का है और उसी की आज्ञाकारिता और इबादत स्थायी रूप से उसी के लिए है, तो तुम उसके अलावा किसी और का भय रखते हो और उसकी इबादत करते हो? यह बिल्कुल गलत और अनुचित है। तुम्हें केवल अल्लाह से डरना चाहिए और उसी की इबादत करनी चाहिए, क्योंकि वही सब कुछ का मालिक है और उसी का दीन (आज्ञाकारिता) हमेशा के लिए है।

फ़ायदे:

  1. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की एकता (तौहीद) का अर्थ सिर्फ यह नहीं है कि हम उसे एक मानें, बल्कि यह भी है कि हम उसी की इबादत करें, उसी से डरें और उसी की आज्ञाकारिता को अपने जीवन में स्थायी रूप से अपनाएँ।
  2. हमें किसी इंसान, ताकत, या वस्तु से उस तरह नहीं डरना चाहिए जैसे अल्लाह से डरते हैं। सारा अधिकार और नियंत्रण अल्लाह के हाथ में है, इसलिए हमारा भय और आशा भी उसी से जुड़ी होनी चाहिए।
  3. यह आयत हमें यह भी बताती है कि दीन (धर्म) कोई मौसमी या अस्थायी चीज़ नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन का स्थायी हिस्सा होना चाहिए—हर समय, हर हालत में अल्लाह की आज्ञाकारिता और उसकी इबादत जारी रहनी चाहिए।
  4. जब हम यह समझ लेते हैं कि सब कुछ अल्लाह का है और उसी का दीन है, तो हमारा दिल सिर्फ उसी से जुड़ जाता है, और हमें किसी और से डरने या किसी और की उम्मीद रखने की ज़रूरत नहीं रहती। यही सच्ची आज़ादी और सुकून है।
🎧 सुनें

📜 आयत 50-54 — अन-नहल

50يَخَافُونَ رَبَّهُم مِّن فَوْقِهِمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ۩
और अपने परवरदिगार से जो उनसे (कहीं) बरतर (बड़ा) व आला है डरते हैं और जो हुक्में दिया जाता है फौरन बजा लाते हैं
51۞ وَقَالَ اللَّهُ لَا تَتَّخِذُوا إِلَٰهَيْنِ اثْنَيْنِ ۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ فَإِيَّايَ فَارْهَبُونِ
और ख़ुदा ने फरमाया था कि दो दो माबूद न बनाओ माबूद तो बस वही यकता ख़ुदा है सिर्फ मुझी से डरते रहो
52وَلَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَتَّقُونَ
और जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में हैं (ग़रज़) सब कुछ उसी का है और ख़ालिस फरमाबरदारी हमेशा उसी को लाज़िम (जरूरी) है तो क्या तुम लोग ख़ुदा के सिवा (किसी और से भी) डरते हो
53وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ
और जितनी नेअमतें तुम्हारे साथ हैं (सब ही की तरफ से हैं) फिर जब तुमको तकलीफ छू भी गई तो तुम उसी के आगे फरियाद करने लगते हो
54ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब वह तुमसे तकलीफ को दूर कर देता है तो बस फौरन तुममें से कुछ लोग अपने परवरदिगार को शरीक ठहराते हैं
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अनुवाद — अन-नहल 52

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Tuesday, August 18, 2026

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