अन-नहल · 53/128
अनुवाद उच्चारण — अन-नहल
وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ ۝٥٣
Wa maa bikum minni`matin faminal laahi summa izaa massakumud durru fa ilaihi taj`aroon
📖 हिंदी अर्थ
और जितनी नेअमतें तुम्हारे साथ हैं (सब ही की तरफ से हैं) फिर जब तुमको तकलीफ छू भी गई तो तुम उसी के आगे फरियाद करने लगते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • निअ़मत: वह हर भलाई और सुख-सुविधा जो इंसान को प्राप्त हो, चाहे वह धार्मिक हो या सांसारिक।
  • अज़-ज़ुर्र: कष्ट, बीमारी, गरीबी, सूखा या कोई भी मुसीबत।
  • तज्अरून: तुम चीख-पुकार करते हो, गिड़गिड़ाते हो, और अत्यंत विनम्रता के साथ प्रार्थना करते हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ लोगों! तुम्हारे पास जो भी भलाई और नेमत है—चाहे वह ईमान और हिदायत की नेमत हो, या शारीरिक स्वास्थ्य, धन-दौलत, संतान, सुरक्षा, या कोई और सुख-साधन—वह सब अकेले अल्लाह ही की ओर से है। कोई दूसरा न तो उसे दे सकता है और न ही रोक सकता है। यह अल्लाह की दया और कृपा है जो उसने अपने बंदों पर की है।

फिर जब तुम पर कोई मुसीबत आती है—जैसे बीमारी, गरीबी, सूखा, भय या कोई और कष्ट—तो तुम स्वाभाविक रूप से अल्लाह ही की ओर रुख करते हो, उसी से फरियाद करते हो, उसी से दुआ माँगते हो और उसी से राहत की उम्मीद रखते हो। यहाँ तक कि वे लोग भी जो आम दिनों में अल्लाह के साथ दूसरों को साझीदार बनाते हैं, मुसीबत के समय अपने उन झूठे माबूदों को भूलकर सीधे अल्लाह ही को पुकारते हैं। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सच्चा मददगार और नेमत देने वाला केवल अल्लाह ही है।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. हर नेमत अल्लाह की ओर से है, इसलिए उसका शुक्र अदा करना चाहिए और उसे अल्लाह की राह में इस्तेमाल करना चाहिए। नेमतें अल्लाह की तरफ से इम्तिहान भी हैं कि हम उनका सही उपयोग करते हैं या नहीं।
  2. मुसीबत के समय अल्लाह ही की ओर रुख करना चाहिए, क्योंकि वही कष्ट को दूर करने की शक्ति रखता है। यह हमें सिखाता है कि हर हाल में अल्लाह पर भरोसा रखें और उसी से मदद माँगें।
  3. यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की सबसे बड़ी दलील है—जब इंसान मुसीबत में होता है तो उसकी फितरत (स्वाभाविक प्रवृत्ति) उसे अल्लाह की ओर ही खींचती है, चाहे वह कितना ही गुमराह क्यों न हो। इससे साबित होता है कि सच्चा माबूद सिर्फ अल्लाह है।
  4. अल्लाह की नेमतों को गिनना असंभव है, इसलिए हमें हर पल उसका शुक्रगुज़ार रहना चाहिए और अपनी ज़ुबान से अल्हम्दुलिल्लाह कहते रहना चाहिए। शुक्र अदा करने से नेमतें बढ़ती हैं, जैसा कि क़ुरआन में वादा किया गया है।
  5. यह आयत इंसान को अल्लाह की तरफ लौटने की तरग़ीब देती है—जिस तरह मुसीबत में हम उसे पुकारते हैं, उसी तरह सुख-चैन के समय भी उसे याद रखें और उसकी इबादत करें, ताकि हमारा रिश्ता अल्लाह से हर हाल में जुड़ा रहे।


📜 आयत 51-55 — अन-नहल

51۞ وَقَالَ اللَّهُ لَا تَتَّخِذُوا إِلَٰهَيْنِ اثْنَيْنِ ۖ إِنَّمَا هُوَ إِلَٰهٌ وَاحِدٌ ۖ فَإِيَّايَ فَارْهَبُونِ
और ख़ुदा ने फरमाया था कि दो दो माबूद न बनाओ माबूद तो बस वही यकता ख़ुदा है सिर्फ मुझी से डरते रहो
52وَلَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَلَهُ الدِّينُ وَاصِبًا ۚ أَفَغَيْرَ اللَّهِ تَتَّقُونَ
और जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में हैं (ग़रज़) सब कुछ उसी का है और ख़ालिस फरमाबरदारी हमेशा उसी को लाज़िम (जरूरी) है तो क्या तुम लोग ख़ुदा के सिवा (किसी और से भी) डरते हो
53وَمَا بِكُم مِّن نِّعْمَةٍ فَمِنَ اللَّهِ ۖ ثُمَّ إِذَا مَسَّكُمُ الضُّرُّ فَإِلَيْهِ تَجْأَرُونَ
और जितनी नेअमतें तुम्हारे साथ हैं (सब ही की तरफ से हैं) फिर जब तुमको तकलीफ छू भी गई तो तुम उसी के आगे फरियाद करने लगते हो
54ثُمَّ إِذَا كَشَفَ الضُّرَّ عَنكُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنكُم بِرَبِّهِمْ يُشْرِكُونَ
फिर जब वह तुमसे तकलीफ को दूर कर देता है तो बस फौरन तुममें से कुछ लोग अपने परवरदिगार को शरीक ठहराते हैं
55لِيَكْفُرُوا بِمَا آتَيْنَاهُمْ ۚ فَتَمَتَّعُوا ۖ فَسَوْفَ تَعْلَمُونَ
ताकि जो (नेअमतें) हमने उनको दी है उनकी नाशुक्री करें तो (ख़ैर दुनिया में चन्द रोज़ चैन कर लो फिर तो अनक़रीब तुमको मालूम हो जाएगा
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अनुवाद — अन-नहल 53

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Tuesday, August 18, 2026

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