अल-इसरा · 12/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ آيَتَيْنِ ۖ فَمَحَوْنَا آيَةَ اللَّيْلِ وَجَعَلْنَا آيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِّتَبْتَغُوا فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا ۝١٢
Wa ja`alnal laila wannahaara Aayatayni famahawnaaa Aayatal laili wa ja`alnaaa Aayatan nahaari mubsiratal litabtaghoo fadlam mir Rabbikum wa lita`lamoo `adadas sineena walhisaab; wa kulla shai`in fassalnaahu tafseelaa
📖 हिंदी अर्थ
और हमने रात और दिन को (अपनी क़ुदरत की) दो निशानियाँ क़रार दिया फिर हमने रात की निशानी (चाँद) को धुँधला बनाया और दिन की निशानी (सूरज) को रौशन बनाया (कि सब चीज़े दिखाई दें) ताकि तुम लोग अपने परवरदिगार का फज़ल ढूँढते फिरों और ताकि तुम बरसों की गिनती और हिसाब को जानो (बूझों) और हमने हर चीज़ को खूब अच्छी तरह तफसील से बयान कर दिया है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • آيَتَيْنِ: दो निशानियाँ (अल्लाह की कुदरत और वहदानियत की दो स्पष्ट निशानियाँ)।
  • فَمَحَوْنَا: हमने मिटा दिया (यानी रात की रोशनी को खत्म कर दिया)।
  • مُبْصِرَةً: रोशन और चमकदार (जिससे चीज़ें देखी जा सकें)।
  • لِتَبْتَغُوا: ताकि तुम तलाश करो (यानी कमाओ और कोशिश करो)।
  • فَضْلًا: अल्लाह की रिज़्क़ और दया (रोज़ी और भलाई)।
  • عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ: सालों की गिनती और (महीनों, दिनों, घंटों का) हिसाब।
  • فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا: हमने हर चीज़ को स्पष्ट और विस्तार से बयान कर दिया।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने रात और दिन को अपनी कुदरत की दो बड़ी निशानियाँ बनाया है, जो उसकी वहदानियत (एकता) और ताक़त पर दलील देती हैं। उसने रात की निशानी को मिटा दिया, यानी उसे अंधेरा बना दिया, ताकि लोग उसमें आराम और सुकून पाएँ। और दिन की निशानी को रोशन और चमकदार बनाया, ताकि लोग उसकी रोशनी में अपने काम-काज कर सकें, रिज़्क़ की तलाश कर सकें और अपनी ज़िंदगी के मुआमलात (लेन-देन) को अंजाम दे सकें।

इसी तरह, रात और दिन के बदलते रहने से लोग सालों की गिनती और महीनों-दिनों का हिसाब जान सकते हैं, जिससे वे अपने धार्मिक और दुनियावी मामलों को व्यवस्थित कर सकें — जैसे रोज़े, हज, ज़कात, उधार के मुआमलात, और दूसरे काम। अगर रात और दिन एक जैसे रहते, तो न तो समय का पता चलता और न ही इबादतों के औक़ात (समय) मालूम होते।

अल्लाह ने यह भी फ़रमाया कि उसने हर चीज़ को साफ-साफ और पूरे विस्तार से बयान कर दिया है, ताकि सच और झूठ, हक़ और बातिल में फ़र्क़ साफ़ हो जाए और लोगों के लिए कोई बहाना न बचे।

फ़ायदे (सीख):

  1. रात और दिन का बदलना अल्लाह की कुदरत की ज़िंदा निशानी है, जो हमें उसकी याद दिलाती है और उसकी वहदानियत पर ईमान लाने की तरफ़ बुलाती है।
  2. दिन को रोशन और रात को अंधेरा बनाना अल्लाह की रहमत है — रात आराम के लिए और दिन कमाई और ज़रूरतें पूरी करने के लिए। इससे हमें अपनी ज़िंदगी में संतुलन रखना सीखना चाहिए।
  3. समय का हिसाब और सालों की गिनती सिर्फ़ दुनियावी मुआमलात के लिए नहीं, बल्कि इबादतों (जैसे रोज़ा, हज, नमाज़ के औक़ात) के लिए भी ज़रूरी है — यह अल्लाह की तरफ़ से एक बड़ी नेमत है।
  4. अल्लाह ने हर चीज़ को स्पष्ट कर दिया है, इसलिए हमें कुरान और उसकी तालीमात पर अमल करना चाहिए, क्योंकि इसमें हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि कुदरत के नज़ारों पर ग़ौर करना इबादत है — जो इंसान इन निशानियों पर सोचता है, वह अल्लाह के और करीब हो जाता है।
🎧 सुनें

📜 आयत 10-14 — अल-इसरा

10وَأَنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
और ये भी कि बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते हैं उनके लिए हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है
11وَيَدْعُ الْإِنسَانُ بِالشَّرِّ دُعَاءَهُ بِالْخَيْرِ ۖ وَكَانَ الْإِنسَانُ عَجُولًا
और आदमी कभी (आजिज़ होकर अपने हक़ में) बुराई (अज़ाब वग़ैरह की दुआ) इस तरह माँगता है जिस तरह अपने लिए भलाई की दुआ करता है और आदमी तो बड़ा जल्दबाज़ है
12وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ آيَتَيْنِ ۖ فَمَحَوْنَا آيَةَ اللَّيْلِ وَجَعَلْنَا آيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِّتَبْتَغُوا فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا
और हमने रात और दिन को (अपनी क़ुदरत की) दो निशानियाँ क़रार दिया फिर हमने रात की निशानी (चाँद) को धुँधला बनाया और दिन की निशानी (सूरज) को रौशन बनाया (कि सब चीज़े दिखाई दें) ताकि तुम लोग अपने परवरदिगार का फज़ल ढूँढते फिरों और ताकि तुम बरसों की गिनती और हिसाब को जानो (बूझों) और हमने हर चीज़ को खूब अच्छी तरह तफसील से बयान कर दिया है
13وَكُلَّ إِنسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ ۖ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كِتَابًا يَلْقَاهُ مَنشُورًا
और हमने हर आदमी के नामए अमल को उसके गले का हार बना दिया है (कि उसकी किस्मत उसके साथ रहे) और क़यामत के दिन हम उसे उसके सामने निकल के रख देगें कि वह उसको एक खुली हुई किताब अपने रुबरु पाएगा
14اقْرَأْ كِتَابَكَ كَفَىٰ بِنَفْسِكَ الْيَوْمَ عَلَيْكَ حَسِيبًا
और हम उससे कहेंगें कि अपना नामए अमल पढ़ले और आज अपने हिसाब के लिए तू आप ही काफी हैं
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अनुवाद — अल-इसरा 12

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Tuesday, August 18, 2026

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