Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- يَدْعُ – पुकारता है, प्रार्थना करता है
- بِالشَّرِّ – बुराई के साथ, अर्थात अपने लिए बुरा (नुकसानदेह) माँगना
- دُعَاءَهُ – उसी प्रकार पुकारना जैसे वह पुकारता है
- عَجُولًا – जल्दबाज़, बहुत जल्दी करने वाला
विस्तृत व्याख्या:
यह आयत मनुष्य की एक कमज़ोरी और जल्दबाज़ी की ओर इशारा करती है। मनुष्य जब क्रोध या निराशा की स्थिति में होता है, तो वह अपने ऊपर, अपनी संतान पर या अपने धन-संपत्ति पर बुराई की दुआ करने लगता है — जैसे कि वह कहता है कि "मुझ पर तो आफत आ जाए", "मेरा बच्चा नष्ट हो जाए", "मेरा धन बर्बाद हो जाए" — और यह सब वह उसी तरह से कहता है जिस तरह वह भलाई के लिए दुआ करता है। अर्थात जिस प्रकार वह अपने लिए अच्छाई माँगते समय दुआ करता है, उसी प्रकार बुराई के समय भी वही अंदाज़ अपनाता है। यह उसकी अज्ञानता और जल्दबाज़ी का परिणाम है।
यदि अल्लाह उसकी इस दुआ को स्वीकार कर लेता, तो वह स्वयं, उसकी संतान और उसका धन सब नष्ट हो जाता। लेकिन अल्लाह की रहमत और कृपा से वह मनुष्य की इस बुरी दुआ को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि अल्लाह जानता है कि मनुष्य वास्तव में यह नहीं चाहता, बल्कि वह क्रोध या निराशा में ऐसा कह बैठता है। अल्लाह उसकी भलाई वाली दुआ को तो स्वीकार करता है, लेकिन बुराई वाली दुआ को उसकी भलाई के लिए टाल देता है।
मनुष्य स्वभावतः जल्दबाज़ है — वह सोचता-समझता नहीं, बल्कि भावनाओं में बहकर तुरंत कुछ भी कह देता है। वह धैर्य नहीं रखता, न सुख में न दुख में। यही उसकी कमज़ोरी है कि वह हर बात में जल्दी करता है, और इसी जल्दबाज़ी के कारण वह ऐसी बातें मुँह से निकाल देता है जो उसके लिए हानिकारक होती हैं।
शिक्षाएँ और लाभ:
- धैर्य का महत्व: यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन के हर मामले में धैर्य रखना चाहिए। जल्दबाज़ी इंसान को ऐसे कदम उठाने पर मजबूर करती है जिनका अंजाम बुरा होता है।
- दुआ में सावधानी: हमें अपनी दुआओं में भी सावधानी बरतनी चाहिए। क्रोध या निराशा की स्थिति में अपने लिए या अपने परिवार के लिए बुराई की दुआ नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह हमारी अज्ञानता का प्रमाण है।
- अल्लाह की रहमत: यह आयत अल्लाह की असीम दया और कृपा को दर्शाती है कि वह अपने बंदों की ग़लत दुआओं को उनकी भलाई के लिए स्वीकार नहीं करता। यह हमारे लिए अल्लाह की मुहब्बत का सबूत है।
- आत्म-नियंत्रण: हमें अपने गुस्से पर काबू रखना सीखना चाहिए। गुस्से में कही गई बातें और की गई दुआएँ अक्सर पछतावे का कारण बनती हैं।
- अल्लाह की हिकमत: अल्लाह हर चीज़ को हिकमत (समझदारी) के साथ करता है। वह हमारी ज़रूरतों को हमसे बेहतर जानता है, इसलिए हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए और उसी से भलाई की उम्मीद करनी चाहिए।
📜 आयत 9-13 — सूरा अल-इसरा
अनुवाद — अल-इसरा 11
सूरा अल-इसरा आयत 11 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और आदमी कभी (आजिज़ होकर अपने हक़ में) बुराई (अज़ाब…सूरा आयत 11/111 — सूरा अल-इसरा الإسراء (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-इसरा सुनें, सूरा अल-इसरा अनुवाद, सूरा अल-इसरा mp3, सूरा अल-इसरा pdf. आयत 9–13. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Friday, October 2, 2026
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