अल-इसरा · 11/111
अनुवाद उच्चारण — अल-इसरा
وَيَدْعُ الْإِنسَانُ بِالشَّرِّ دُعَاءَهُ بِالْخَيْرِ ۖ وَكَانَ الْإِنسَانُ عَجُولًا ۝١١
Wa yad`ul insaanu bishsharri du`aaa `ahoo bilkhayr; wa kaanal insaanu `ajoola
📖 हिंदी अर्थ
और आदमी कभी (आजिज़ होकर अपने हक़ में) बुराई (अज़ाब वग़ैरह की दुआ) इस तरह माँगता है जिस तरह अपने लिए भलाई की दुआ करता है और आदमी तो बड़ा जल्दबाज़ है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَدْعُ – पुकारता है, प्रार्थना करता है
  • بِالشَّرِّ – बुराई के साथ, अर्थात अपने लिए बुरा (नुकसानदेह) माँगना
  • دُعَاءَهُ – उसी प्रकार पुकारना जैसे वह पुकारता है
  • عَجُولًا – जल्दबाज़, बहुत जल्दी करने वाला

विस्तृत व्याख्या:

यह आयत मनुष्य की एक कमज़ोरी और जल्दबाज़ी की ओर इशारा करती है। मनुष्य जब क्रोध या निराशा की स्थिति में होता है, तो वह अपने ऊपर, अपनी संतान पर या अपने धन-संपत्ति पर बुराई की दुआ करने लगता है — जैसे कि वह कहता है कि "मुझ पर तो आफत आ जाए", "मेरा बच्चा नष्ट हो जाए", "मेरा धन बर्बाद हो जाए" — और यह सब वह उसी तरह से कहता है जिस तरह वह भलाई के लिए दुआ करता है। अर्थात जिस प्रकार वह अपने लिए अच्छाई माँगते समय दुआ करता है, उसी प्रकार बुराई के समय भी वही अंदाज़ अपनाता है। यह उसकी अज्ञानता और जल्दबाज़ी का परिणाम है।

यदि अल्लाह उसकी इस दुआ को स्वीकार कर लेता, तो वह स्वयं, उसकी संतान और उसका धन सब नष्ट हो जाता। लेकिन अल्लाह की रहमत और कृपा से वह मनुष्य की इस बुरी दुआ को स्वीकार नहीं करता, क्योंकि अल्लाह जानता है कि मनुष्य वास्तव में यह नहीं चाहता, बल्कि वह क्रोध या निराशा में ऐसा कह बैठता है। अल्लाह उसकी भलाई वाली दुआ को तो स्वीकार करता है, लेकिन बुराई वाली दुआ को उसकी भलाई के लिए टाल देता है।

मनुष्य स्वभावतः जल्दबाज़ है — वह सोचता-समझता नहीं, बल्कि भावनाओं में बहकर तुरंत कुछ भी कह देता है। वह धैर्य नहीं रखता, न सुख में न दुख में। यही उसकी कमज़ोरी है कि वह हर बात में जल्दी करता है, और इसी जल्दबाज़ी के कारण वह ऐसी बातें मुँह से निकाल देता है जो उसके लिए हानिकारक होती हैं।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. धैर्य का महत्व: यह आयत हमें सिखाती है कि जीवन के हर मामले में धैर्य रखना चाहिए। जल्दबाज़ी इंसान को ऐसे कदम उठाने पर मजबूर करती है जिनका अंजाम बुरा होता है।
  2. दुआ में सावधानी: हमें अपनी दुआओं में भी सावधानी बरतनी चाहिए। क्रोध या निराशा की स्थिति में अपने लिए या अपने परिवार के लिए बुराई की दुआ नहीं करनी चाहिए, क्योंकि यह हमारी अज्ञानता का प्रमाण है।
  3. अल्लाह की रहमत: यह आयत अल्लाह की असीम दया और कृपा को दर्शाती है कि वह अपने बंदों की ग़लत दुआओं को उनकी भलाई के लिए स्वीकार नहीं करता। यह हमारे लिए अल्लाह की मुहब्बत का सबूत है।
  4. आत्म-नियंत्रण: हमें अपने गुस्से पर काबू रखना सीखना चाहिए। गुस्से में कही गई बातें और की गई दुआएँ अक्सर पछतावे का कारण बनती हैं।
  5. अल्लाह की हिकमत: अल्लाह हर चीज़ को हिकमत (समझदारी) के साथ करता है। वह हमारी ज़रूरतों को हमसे बेहतर जानता है, इसलिए हमें उस पर भरोसा रखना चाहिए और उसी से भलाई की उम्मीद करनी चाहिए।
🎧 सुनें

📜 आयत 9-13 — अल-इसरा

9إِنَّ هَٰذَا الْقُرْآنَ يَهْدِي لِلَّتِي هِيَ أَقْوَمُ وَيُبَشِّرُ الْمُؤْمِنِينَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ الصَّالِحَاتِ أَنَّ لَهُمْ أَجْرًا كَبِيرًا
इसमें शक़ नहीं कि ये क़ुरान उस राह की हिदायत करता है जो सबसे ज्यादा सीधी है और जो ईमानदार अच्छे अच्छे काम करते हैं उनको ये खुशख़बरी देता है कि उनके लिए बहुत बड़ा अज्र और सवाब (मौजूद) है
10وَأَنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ أَعْتَدْنَا لَهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
और ये भी कि बेशक जो लोग आख़िरत पर ईमान नहीं रखते हैं उनके लिए हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है
11وَيَدْعُ الْإِنسَانُ بِالشَّرِّ دُعَاءَهُ بِالْخَيْرِ ۖ وَكَانَ الْإِنسَانُ عَجُولًا
और आदमी कभी (आजिज़ होकर अपने हक़ में) बुराई (अज़ाब वग़ैरह की दुआ) इस तरह माँगता है जिस तरह अपने लिए भलाई की दुआ करता है और आदमी तो बड़ा जल्दबाज़ है
12وَجَعَلْنَا اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ آيَتَيْنِ ۖ فَمَحَوْنَا آيَةَ اللَّيْلِ وَجَعَلْنَا آيَةَ النَّهَارِ مُبْصِرَةً لِّتَبْتَغُوا فَضْلًا مِّن رَّبِّكُمْ وَلِتَعْلَمُوا عَدَدَ السِّنِينَ وَالْحِسَابَ ۚ وَكُلَّ شَيْءٍ فَصَّلْنَاهُ تَفْصِيلًا
और हमने रात और दिन को (अपनी क़ुदरत की) दो निशानियाँ क़रार दिया फिर हमने रात की निशानी (चाँद) को धुँधला बनाया और दिन की निशानी (सूरज) को रौशन बनाया (कि सब चीज़े दिखाई दें) ताकि तुम लोग अपने परवरदिगार का फज़ल ढूँढते फिरों और ताकि तुम बरसों की गिनती और हिसाब को जानो (बूझों) और हमने हर चीज़ को खूब अच्छी तरह तफसील से बयान कर दिया है
13وَكُلَّ إِنسَانٍ أَلْزَمْنَاهُ طَائِرَهُ فِي عُنُقِهِ ۖ وَنُخْرِجُ لَهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ كِتَابًا يَلْقَاهُ مَنشُورًا
और हमने हर आदमी के नामए अमल को उसके गले का हार बना दिया है (कि उसकी किस्मत उसके साथ रहे) और क़यामत के दिन हम उसे उसके सामने निकल के रख देगें कि वह उसको एक खुली हुई किताब अपने रुबरु पाएगा
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अनुवाद — अल-इसरा 11

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Tuesday, August 18, 2026

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