अल-बकरा · 152/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ وَاشْكُرُوا لِي وَلَا تَكْفُرُونِ ۝١٥٢
Fazkurooneee azkurkum washkuroo lee wa laa takfuroon
📖 हिंदी अर्थ
पस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा ज़िक्र (खैर) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَاذْكُرُونِي: मुझे याद करो, मेरा ज़िक्र करो।
  • أَذْكُرْكُمْ: मैं तुम्हें याद करूँगा, तुम्हारा ज़िक्र करूँगा।
  • وَاشْكُرُوا لِي: मेरा शुक्र अदा करो।
  • وَلَا تَكْفُرُونِ: मेरी नेमतों का इनकार मत करो, मेरी अवज्ञा मत करो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने ईमानवाले बंदों को आदेश देता है कि वे उसे याद करें—अपने दिलों से, अपनी ज़ुबान से और अपने अंगों से। जब बंदा अल्लाह को याद करता है, तो अल्लाह उसे याद करता है, और अल्लाह का बंदे को याद करना उससे कहीं बेहतर और बड़ा है। यह अल्लाह की ओर से एक महान प्रतिफल है—वह अपने बंदे का ज़िक्र फ़रिश्तों की महफ़िल में करता है, उस पर रहमत भेजता है और उसकी हिफ़ाज़त करता है। यह बदला उसी के जैसा है—जैसे बंदा अल्लाह को याद करता है, अल्लाह उसे उससे बढ़कर याद करता है।

फिर अल्लाह आदेश देता है कि उसका शुक्र अदा करो—अपनी ज़ुबान से उसकी तारीफ़ करो, अपने दिल से उसकी नेमतों को पहचानो, और अपने अंगों से उसकी इबादत और आज्ञाकारिता में उन नेमतों का इस्तेमाल करो। शुक्र का अर्थ सिर्फ़ "शुक्रिया" कहना नहीं है, बल्कि अल्लाह की दी हुई हर नेमत को उसी की राह में खर्च करना है।

और "मेरा कुफ़्र मत करो" का मतलब है कि अल्लाह की नेमतों को न पहचानना, उन्हें जताना नहीं, और उन नेमतों का इस्तेमाल उन कामों में करना जो अल्लाह ने हराम किए हैं। कुफ़्रान-ए-नेमत यानी नेमत का इनकार करना और उसकी नाशुक्री करना।

फ़ायदे (सबक़):

  1. अल्लाह का ज़िक्र करना बहुत बड़ी इबादत है, और इसका इनाम यह है कि अल्लाह ख़ुद उस बंदे को याद करता है—यह किसी मुसलमान के लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
  2. अल्लाह की याद दिल को सुकून देती है, इंसान को गुनाहों से रोकती है और उसे अल्लाह के करीब लाती है।
  3. शुक्र अदा करने से नेमतें बढ़ती हैं, और नाशुक्री से नेमतें खत्म हो जाती हैं। इसलिए हर हाल में अल्लाह का शुक्र करना चाहिए।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह अपने बंदों से बहुत प्यार करता है—वह उनसे कहता है कि मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद करूँगा। यह अल्लाह की रहमत और करम की निशानी है।
  5. मुसलमान को चाहिए कि वह अपनी ज़ुबान को अल्लाह के ज़िक्र से, और अपने अंगों को उसकी इबादत से आबाद रखे, ताकि वह दुनिया और आख़िरत दोनों में कामयाब हो।
🎧 सुनें

📜 आयत 150-154 — अल-बकरा

150وَمِنْ حَيْثُ خَرَجْتَ فَوَلِّ وَجْهَكَ شَطْرَ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ ۚ وَحَيْثُ مَا كُنتُمْ فَوَلُّوا وُجُوهَكُمْ شَطْرَهُ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَيْكُمْ حُجَّةٌ إِلَّا الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْهُمْ فَلَا تَخْشَوْهُمْ وَاخْشَوْنِي وَلِأُتِمَّ نِعْمَتِي عَلَيْكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
और तुम्हारे कामों से ख़ुदा ग़ाफिल नही है और (ऐ रसूल) तुम जहाँ से जाओ (यहाँ तक के मक्का से तो भी) तुम (नमाज़ में) अपना मुँह मस्ज़िदे हराम की तरफ कर लिया करो और (ऐ रसूल) तुम जहाँ कही हुआ करो तो नमाज़ में अपना मुँह उसी काबा की तरफ़ कर लिया करो (बार बार हुक्म देने का एक फायदा ये है ताकि लोगों का इल्ज़ाम तुम पर न आने पाए मगर उन में से जो लोग नाहक़ हठधर्मी करते हैं वह तो ज़रुर इल्ज़ाम देगें) तो तुम लोग उनसे डरो नहीं और सिर्फ़ मुझसे डरो और (दूसरा फ़ायदा ये है) ताकि तुम पर अपनी नेअमत पूरी कर दूँ
151كَمَا أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًا مِّنكُمْ يَتْلُو عَلَيْكُمْ آيَاتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ الْكِتَابَ وَالْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا تَعْلَمُونَ
और तीसरा फायदा ये है ताकि तुम हिदायत पाओ मुसलमानों ये एहसान भी वैसा ही है जैसे हम ने तुम में तुम ही में का एक रसूल भेजा जो तुमको हमारी आयतें पढ़ कर सुनाए और तुम्हारे नफ्स को पाकीज़ा करे और तुम्हें किताब क़ुरान और अक्ल की बातें सिखाए और तुम को वह बातें बतांए जिन की तुम्हें पहले से खबर भी न थी
152فَاذْكُرُونِي أَذْكُرْكُمْ وَاشْكُرُوا لِي وَلَا تَكْفُرُونِ
पस तुम हमारी याद रखो तो मै भी तुम्हारा ज़िक्र (खैर) किया करुगाँ और मेरा शुक्रिया अदा करते रहो और नाशुक्री न करो
153يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ مَعَ الصَّابِرِينَ
ऐ ईमानदारों मुसीबत के वक्त सब्र और नमाज़ के ज़रिए से ख़ुदा की मदद माँगों बेशक ख़ुदा सब्र करने वालों ही का साथी है
154وَلَا تَقُولُوا لِمَن يُقْتَلُ فِي سَبِيلِ اللَّهِ أَمْوَاتٌ ۚ بَلْ أَحْيَاءٌ وَلَٰكِن لَّا تَشْعُرُونَ
और जो लोग ख़ुदा की राह में मारे गए उन्हें कभी मुर्दा न कहना बल्कि वह लोग ज़िन्दा हैं मगर तुम उनकी ज़िन्दगी की हक़ीकत का कुछ भी शऊर नहीं रखते
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अनुवाद — अल-बकरा 152

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सूरा आयत 152/286 — अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-बकरा सुनें, अल-बकरा अनुवाद, अल-बकरा mp3, अल-बकरा pdf. आयत 150–154. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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