अल-बकरा · 176/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ نَزَّلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ ۗ وَإِنَّ الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِي الْكِتَابِ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ ۝١٧٦
Zaalika bi annal laaha nazzalal kitaaba bilhaqq; wa innal lazeenakh talafoo fil kitaabi lafee shiqaaqim ba`eed
📖 हिंदी अर्थ
ये इसलिए कि ख़ुदा ने बरहक़ किताब नाज़िल की और बेशक जिन लोगों ने किताबे ख़ुदा में रद्दो बदल की वह लोग बड़े पल्ले दरजे की मुख़ालेफत में हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • شِقَاقٍ: विरोध, झगड़ा, मतभेद
  • بَعِيدٍ: बहुत दूर (सत्य से कोसों दूर)

व्याख्या:

यह आयत उन लोगों के भयानक अंजाम की ओर इशारा करती है जो अल्लाह की आयतों को छिपाते हैं और उन्हें बदलते हैं। यह यातना और दंड जो उनके लिए तैयार किया गया है, वह इसलिए है क्योंकि अल्लाह ने अपनी किताबें (तौरात, इंजील, कुरआन) सत्य के साथ उतारीं, जिसमें कोई संदेह नहीं और कोई विरोधाभास नहीं। ये किताबें मार्गदर्शन और स्पष्ट सत्य लेकर आईं, ताकि लोग उन पर ईमान लाएँ और उनके अनुसार चलें।

लेकिन जिन लोगों ने इन किताबों में मतभेद किया—कुछ पर ईमान लाया और कुछ को झुठलाया, कुछ को माना और कुछ को छिपाया—वे वास्तव में सत्य से बहुत दूर हो गए। उन्होंने अपनी मनमानी से अल्लाह की किताब को तोड़-मरोड़कर पेश किया, जिससे वे हिदायत से भटक गए और अपने झगड़े और विरोध में डूब गए। यह विरोध और मतभेद उन्हें सीधे रास्ते से इतना दूर ले गया कि उनके और सत्य के बीच कोई संबंध नहीं रहा।

यह आयत उन यहूदियों और ईसाइयों के बारे में भी है जिन्होंने अपनी किताबों में आए अंतिम रसूल ﷺ के आगमन की खबरों को छिपाया और उन पर ईमान नहीं लाए। उन्होंने अपने धार्मिक नेताओं की बातों को अल्लाह की किताब पर प्राथमिकता दी और सत्य को छोड़कर अपनी मनगढ़ंत बातों पर चल पड़े।

शिक्षाएँ और लाभ:

  1. अल्लाह की हर किताब सत्य के साथ उतारी गई है, इसलिए उनमें कोई विरोधाभास नहीं हो सकता। जो लोग इनमें मतभेद पैदा करते हैं, वे वास्तव में सत्य से दूर हैं।
  2. अल्लाह की आयतों को छिपाना और उन्हें बदलना बहुत बड़ा पाप है, जिसकी सज़ा बहुत कठोर है।
  3. किताबों में मतभेद करने का मतलब है—कुछ मानना और कुछ न मानना। यही वह रास्ता है जो इंसान को हिदायत से भटका देता है।
  4. सच्चा मुसलमान वही है जो अल्लाह की सभी किताबों और सभी रसूलों पर बिना किसी भेदभाव के ईमान रखे।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि हमें अल्लाह की किताब को पूरी तरह अपनाना चाहिए, न कि उसमें से अपनी इच्छा के अनुसार चुन-चुनकर मानना। कुरआन हमारे लिए पूरा मार्गदर्शन है, और इसे पूर्ण रूप से अपनाना ही हमारी सफलता की कुंजी है।


📜 आयत 174-178 — सूरा अल-बकरा

174إِنَّ الَّذِينَ يَكْتُمُونَ مَا أَنزَلَ اللَّهُ مِنَ الْكِتَابِ وَيَشْتَرُونَ بِهِ ثَمَنًا قَلِيلًا ۙ أُولَٰئِكَ مَا يَأْكُلُونَ فِي بُطُونِهِمْ إِلَّا النَّارَ وَلَا يُكَلِّمُهُمُ اللَّهُ يَوْمَ الْقِيَامَةِ وَلَا يُزَكِّيهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
बेशक जो लोग इन बातों को जो ख़ुदा ने किताब में नाज़िल की है छिपाते हैं और उसके बदले थोड़ी सी क़ीमत (दुनयावी नफ़ा) ले लेतें है ये लोग बस अंगारों से अपने पेट भरते हैं और क़यामत के दिन ख़ुदा उन से बात तक तो करेगा नहीं और न उन्हें (गुनाहों से) पाक करेगा और उन्हीं के लिए दर्दनाक अज़ाब है
175أُولَٰئِكَ الَّذِينَ اشْتَرَوُا الضَّلَالَةَ بِالْهُدَىٰ وَالْعَذَابَ بِالْمَغْفِرَةِ ۚ فَمَا أَصْبَرَهُمْ عَلَى النَّارِ
यही लोग वह हैं जिन्होंने हिदायत के बदले गुमराही मोल ली और बख्यिय (ख़ुदा) के बदले अज़ाब पस वह लोग दोज़ख़ की आग के क्योंकर बरदाश्त करेंगे
176ذَٰلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ نَزَّلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ ۗ وَإِنَّ الَّذِينَ اخْتَلَفُوا فِي الْكِتَابِ لَفِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
ये इसलिए कि ख़ुदा ने बरहक़ किताब नाज़िल की और बेशक जिन लोगों ने किताबे ख़ुदा में रद्दो बदल की वह लोग बड़े पल्ले दरजे की मुख़ालेफत में हैं
177۞ لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ وَابْنَ السَّبِيلِ وَالسَّائِلِينَ وَفِي الرِّقَابِ وَأَقَامَ الصَّلَاةَ وَآتَى الزَّكَاةَ وَالْمُوفُونَ بِعَهْدِهِمْ إِذَا عَاهَدُوا ۖ وَالصَّابِرِينَ فِي الْبَأْسَاءِ وَالضَّرَّاءِ وَحِينَ الْبَأْسِ ۗ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ صَدَقُوا ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُتَّقُونَ
नेकी कुछ यही थोड़ी है कि नमाज़ में अपने मुँह पूरब या पश्चिम की तरफ़ कर लो बल्कि नेकी तो उसकी है जो ख़ुदा और रोज़े आख़िरत और फ़रिश्तों और ख़ुदा की किताबों और पैग़म्बरों पर ईमान लाए और उसकी उलफ़त में अपना माल क़राबत दारों और यतीमों और मोहताजो और परदेसियों और माँगने वालों और लौन्डी ग़ुलाम (के गुलू खलासी) में सर्फ करे और पाबन्दी से नमाज़ पढे और ज़कात देता रहे और जब कोई एहद किया तो अपने क़ौल के पूरे हो और फ़क्र व फाक़ा रन्ज और घुटन के वक्त साबित क़दम रहे यही लोग वह हैं जो दावए ईमान में सच्चे निकले और यही लोग परहेज़गार है
178يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الْقِصَاصُ فِي الْقَتْلَى ۖ الْحُرُّ بِالْحُرِّ وَالْعَبْدُ بِالْعَبْدِ وَالْأُنثَىٰ بِالْأُنثَىٰ ۚ فَمَنْ عُفِيَ لَهُ مِنْ أَخِيهِ شَيْءٌ فَاتِّبَاعٌ بِالْمَعْرُوفِ وَأَدَاءٌ إِلَيْهِ بِإِحْسَانٍ ۗ ذَٰلِكَ تَخْفِيفٌ مِّن رَّبِّكُمْ وَرَحْمَةٌ ۗ فَمَنِ اعْتَدَىٰ بَعْدَ ذَٰلِكَ فَلَهُ عَذَابٌ أَلِيمٌ
ऐ मोमिनों जो लोग (नाहक़) मार डाले जाएँ उनके बदले में तुम को जान के बदले जान लेने का हुक्म दिया जाता है आज़ाद के बदले आज़ाद और ग़ुलाम के बदले ग़ुलाम और औरत के बदले औरत पस जिस (क़ातिल) को उसके ईमानी भाई तालिबे केसास की तरफ से कुछ माफ़ कर दिया जाये तो उसे भी उसके क़दम ब क़दम नेकी करना और ख़ुश मआमलती से (ख़ून बहा) अदा कर देना चाहिए ये तुम्हारे परवरदिगार की तरफ आसानी और मेहरबानी है फिर उसके बाद जो ज्यादती करे तो उस के लिए दर्दनाक अज़ाब है
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
176आयत

अनुवाद — अल-बकरा 176

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Monday, September 28, 2026

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