अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- الْمَلَأُ – समुदाय के प्रतिष्ठित लोग, सरदार और बड़े-बड़े लोग।
- كَذَّبُوا بِلِقَاءِ الْآخِرَةِ – उन्होंने आख़िरत (परलोक) के मिलन को झुठलाया, यानी पुनरुत्थान और प्रतिफल के दिन को नहीं माना।
- أَتْرَفْنَاهُمْ – हमने उन्हें सुख-समृद्धि और ऐश्वर्य में डाल दिया, यानी धन-दौलत और आराम की प्रचुरता दी।
- يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ – वह उसी चीज़ से खाता है जो तुम खाते हो।
- وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ – और उसी चीज़ से पीता है जो तुम पीते हो।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब अल्लाह ने अपने नबी (हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम) को उनकी क़ौम की ओर भेजा, तो उनकी क़ौम के जो बड़े-बड़े सरदार और प्रतिष्ठित लोग थे, उन्होंने ईमान लाने से इनकार कर दिया। ये वही लोग थे जिन्होंने अल्लाह पर ईमान नहीं रखा और आख़िरत के दिन को भी झुठलाया। उन्हें दुनिया में बहुत सुख-सुविधाएँ, धन-दौलत और ऐश्वर्य मिला था, जिसकी वजह से उनके दिलों में घमंड और अकड़ आ गई थी। उन्होंने अपने अनुयायियों और आम लोगों से कहा: "यह व्यक्ति (सालेह) तो बस तुम्हारे जैसा ही एक इंसान है। यह वही खाता है जो तुम खाते हो, और वही पीता है जो तुम पीते हो। इसमें कोई ऐसी विशेषता या श्रेष्ठता नहीं है जो इसे तुमसे अलग करे, ताकि यह अल्लाह का रसूल बनकर तुम्हारे पास आए।"
उन्होंने यह बात इसलिए कही क्योंकि उनकी समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि अल्लाह किसी इंसान को ही अपना पैग़म्बर क्यों बनाता है। उनका यह तर्क वास्तव में बहुत कमज़ोर था, क्योंकि अल्लाह ने हमेशा इंसानों को ही अपना रसूल बनाकर भेजा है, ताकि वे लोगों से सीधे बात कर सकें और लोग उनसे सीख सकें। रसूल का इंसान होना ही उसकी रहमत और हिकमत है, न कि कोई कमी।
दावती पहलू (शिक्षाप्रद संदेश):
इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि दुनिया का ऐश्वर्य और धन-दौलत किसी को भी सत्य को स्वीकार करने से नहीं रोकना चाहिए। ये लोग अपनी समृद्धि के कारण घमंड में आ गए थे और उन्होंने सच्चाई को ठुकरा दिया। हमें चाहिए कि हम दुनिया की चमक-दमक से धोखा न खाएँ और अल्लाह के भेजे हुए रसूलों की शिक्षाओं को खुले दिल से स्वीकार करें। सच्ची इज़्ज़त और बड़ाई तो अल्लाह के पास है, और वही उसे देता है जो उसके दीन को अपनाता है। याद रखें, अल्लाह ने हर युग में इंसानों को ही रसूल बनाकर भेजा, क्योंकि वह हमारी हालत को अच्छी तरह जानता है और चाहता है कि हम उसके रसूलों से सीधे सीखें और सीधे रास्ते पर चलें। इसलिए हमें अपने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शिक्षाओं पर अमल करना चाहिए और उनके बताए रास्ते पर चलकर दुनिया और आख़िरत दोनों की सफलता हासिल करनी चाहिए।
📜 आयत 31-35 — अल-मोमिनुन
अनुवाद — अल-मोमिनुन 33
सूरा अल-मोमिनुन आयत 33 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : और उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने जो काफिर थे…सूरा आयत 33/118 — अल-मोमिनुन المؤمنون (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-मोमिनुन सुनें, अल-मोमिनुन अनुवाद, अल-मोमिनुन mp3, अल-मोमिनुन pdf. आयत 31–35. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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