अल-मोमिनुन · 32/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ ۝٣٢
Fa arsalnaa feehim Rasoolam minhum ani`budul laaha maa lakum min ilaahin ghairuhoo afalaa tattaqoon
📖 हिंदी अर्थ
और हमने उनही में से (एक आदमी सालेह को) रसूल बनाकर उन लोगों में भेजा (और उन्होंने अपनी क़ौम से कहा) कि खुदा की इबादत करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं तो क्या तुम (उससे डरते नही हो)
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • رَسُولًا مِّنْهُمْ: उन्हीं में से एक रसूल (संदेशवाहक)।
  • أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ: यानी यह आदेश दिया गया कि केवल अल्लाह की इबादत करो।
  • مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ: तुम्हारे लिए उसके अलावा कोई सच्चा पूज्य नहीं है।
  • أَفَلَا تَتَّقُونَ: क्या तुम अल्लाह के अज़ाब से नहीं डरते?

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने अपनी रहमत और हिकमत से हर क़ौम की ओर उन्हीं में से एक रसूल भेजा, ताकि वह उनकी भाषा और उनके हालात को समझ सके और उन्हें सीधे रास्ते की ओर बुला सके। इस आयत में हज़रत हूद (अलैहिस्सलाम) का ज़िक्र है, जिन्हें आद क़ौम की ओर भेजा गया। उन्होंने अपनी क़ौम से कहा: "अल्लाह की इबादत करो, उसके सिवा तुम्हारा कोई सच्चा माबूद नहीं है।" यही तौहीद का पैग़ाम है जो हर नबी लेकर आया। उन्होंने अपनी क़ौम को डराया कि क्या तुम अल्लाह के अज़ाब से नहीं डरते? क्या तुम उसकी नाफ़रमानी से बाज़ नहीं आओगे? यह नसीहत थी, जो उनके दिलों को नर्म करने और उन्हें हक़ की तरफ लाने के लिए थी।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह तआला ने हर ज़माने में अपने बंदों की हिदायत के लिए रसूल भेजे, और हर रसूल का पैग़ाम एक ही था—अल्लाह की इबादत और उसके अज़ाब से डरना। यह हमारे लिए बहुत बड़ी रहमत है कि अल्लाह ने हमें किताब और सुन्नत के ज़रिए राह दिखाई। हमें चाहिए कि हम अपनी ज़िंदगी में तौहीद को मज़बूत करें, सिर्फ़ अल्लाह से डरें और उसी से उम्मीद रखें। यही सच्ची कामयाबी का रास्ता है। अल्लाह का डर हमें गुनाहों से रोकता है और नेकी की तरफ ले जाता है। आओ, हम अपने दिलों को अल्लाह की इबादत से रौशन करें और उसकी रहमत के तलबगार बनें।

🎧 सुनें

📜 आयत 30-34 — अल-मोमिनुन

30إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ
इसमें शक नहीं कि हसमें (हमारी क़ुदरत की) बहुत सी निशानियाँ हैं और हमको तो बस उनका इम्तिहान लेना मंज़ूर था
31ثُمَّ أَنشَأْنَا مِن بَعْدِهِمْ قَرْنًا آخَرِينَ
फिर हमने उनके बाद एक और क़ौम को (समूद) को पैदा किया
32فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
और हमने उनही में से (एक आदमी सालेह को) रसूल बनाकर उन लोगों में भेजा (और उन्होंने अपनी क़ौम से कहा) कि खुदा की इबादत करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं तो क्या तुम (उससे डरते नही हो)
33وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ الَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَاءِ الْآخِرَةِ وَأَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ
और उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने जो काफिर थे और (रोज़) आख़िरत की हाज़िरी को भी झुठलाते थे और दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में हमने उन्हें शहवत भी दे रखी थी आपस में कहने लगे (अरे) ये तो बस तुम्हारा ही सा आदमी है जो चीज़े तुम खाते वही ये भी खाता है और जो चीज़े तुम पीते हो उन्हीं में से ये भी पीता है
34وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ
और अगर कहीं तुम लोगों ने अपने ही से आदमी की इताअत कर ली तो तुम ज़रुर घाटे में रहोगे
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 32

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Tuesday, August 18, 2026

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