अल-मोमिनुन · 34/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ ۝٣٤
Wa la`in at`atum basharam mislakum innakum izal lakhaasiroon
📖 हिंदी अर्थ
और अगर कहीं तुम लोगों ने अपने ही से आदमी की इताअत कर ली तो तुम ज़रुर घाटे में रहोगे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • بَشَرًا مِّثْلَكُمْ – तुम्हारे जैसा एक इंसान
  • لَخَاسِرُونَ – अवश्य ही घाटे में रहोगे / नुकसान उठाओगे

तफ़सीर:

यह आयत उन लोगों की बात बयान कर रही है जिन्होंने अपने नबी को झुठलाया और अपनी क़ौम से कहा: "अगर तुमने अपने जैसे एक इंसान की बात मान ली, जो न तो कोई फ़रिश्ता है और न ही उसमें कोई ऐसी ख़ासियत है जो तुमसे बढ़कर हो, तो समझ लो कि तुम बड़े घाटे में रहोगे।" उनका कहना यह था कि तुम अपने देवताओं को छोड़कर एक साधारण इंसान के पीछे क्यों चलते हो? यह तो सरासर नुकसान की बात है।

लेकिन असल में घाटे में वही लोग थे जो इस तर्क से धोखा खा गए। उन्होंने यह नहीं समझा कि नबी कोई फ़रिश्ता नहीं होता, बल्कि एक इंसान ही होता है ताकि लोग उससे सीधे सीख सकें और उसकी ज़िंदगी को देखकर अमल कर सकें। अल्लाह ने हमेशा इंसानों में से ही रसूल भेजे हैं, क्योंकि इंसान ही इंसानों की हालत को बेहतर समझ सकता है और उनके बीच रहकर उन्हें राह दिखा सकता है।

इस आयत से हमें सबक मिलता है कि हमें नबी की पैरवी करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। नबी ﷺ भी हमारे जैसे इंसान थे, लेकिन उन पर वह़ी उतरी और उन्हें अल्लाह की तरफ से सच्चा ज्ञान मिला। उनकी पैरवी करना ही असली कामयाबी है, और उन्हें ठुकराना ही असली घाटा है। जो लोग नबी की रिसालत को सिर्फ इसलिए नकार देते हैं कि वह एक इंसान हैं, वही लोग दुनिया और आख़िरत दोनों में नुकसान उठाते हैं।

आज भी अगर हम अल्लाह के दीन को अपनाने में हिचकिचाते हैं, या नबी ﷺ की सुन्नत को छोड़कर अपनी सोच को आगे रखते हैं, तो हम भी उसी घाटे का शिकार होते हैं। अल्लाह ने हमें अक्ल दी है, और अक्ल यही कहती है कि जिस रास्ते पर चलकर इंसान कामयाब होता है, उसे अपनाना चाहिए। नबी ﷺ की पैरवी ही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाता है। इसलिए हमें उन लोगों की बातों में नहीं आना चाहिए जो हमें दीन से दूर करना चाहते हैं, बल्कि हमें सच्चे दिल से अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करनी चाहिए। यही हमारी सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 32-36 — अल-मोमिनुन

32فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًا مِّنْهُمْ أَنِ اعْبُدُوا اللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
और हमने उनही में से (एक आदमी सालेह को) रसूल बनाकर उन लोगों में भेजा (और उन्होंने अपनी क़ौम से कहा) कि खुदा की इबादत करो उसके सिवा कोई तुम्हारा माबूद नहीं तो क्या तुम (उससे डरते नही हो)
33وَقَالَ الْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ الَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِلِقَاءِ الْآخِرَةِ وَأَتْرَفْنَاهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا مَا هَٰذَا إِلَّا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ
और उनकी क़ौम के चन्द सरदारों ने जो काफिर थे और (रोज़) आख़िरत की हाज़िरी को भी झुठलाते थे और दुनिया की (चन्द रोज़ा) ज़िन्दगी में हमने उन्हें शहवत भी दे रखी थी आपस में कहने लगे (अरे) ये तो बस तुम्हारा ही सा आदमी है जो चीज़े तुम खाते वही ये भी खाता है और जो चीज़े तुम पीते हो उन्हीं में से ये भी पीता है
34وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًا لَّخَاسِرُونَ
और अगर कहीं तुम लोगों ने अपने ही से आदमी की इताअत कर ली तो तुम ज़रुर घाटे में रहोगे
35أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًا وَعِظَامًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ
क्या ये शख्स तुमसे वायदा करता है कि जब तुम मर जाओगे और (मर कर) सिर्फ मिट्टी और हड्डियाँ (बनकर) रह जाओगे तो तुम दुबारा ज़िन्दा करके कब्रों से निकाले जाओगे (है है अरे) जिसका तुमसे वायदा किया जाता है
36۞ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ
बिल्कुल (अक्ल से) दूर और क़यास से बईद है (दो बार ज़िन्दा होना कैसा) बस यही तुम्हारी दुनिया की ज़िन्दगी है
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अनुवाद — अल-मोमिनुन 34

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Tuesday, August 18, 2026

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