Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- خَائِفًا (ख़ाइफ़न): डरा हुआ, भयभीत।
- يَتَرَقَّبُ (यतरक़्क़बु): इंतज़ार करता हुआ, टोह लेता हुआ, यह देखता हुआ कि कब कोई पीछा करके आता है।
- نَجِّنِي (नज्जिनी): मुझे बचा ले, मुझे नजात दे।
- الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (अल-क़ौमि अज़-ज़ालिमीन): अत्याचारी और ज़ालिम लोग, यहाँ अर्थ है फ़िरऔन और उसके सरदार।
तफ़सीर (व्याख्या):
जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उस नेक इंसान की सलाह सुनी, जो शहर के दूर इलाक़े से दौड़ता हुआ आया और उन्हें फ़िरऔन की साज़िश से आगाह किया, तो वे तुरंत समझ गए कि अब यहाँ रुकना खतरे से खाली नहीं। चुनाँचे वे उस शहर से निकले, लेकिन उनका निकलना किसी आराम और इत्मिनान के साथ नहीं था, बल्कि वे डरे हुए थे और हर पल यह देख रहे थे कि कहीं पीछे से कोई आकर उन्हें पकड़ न ले। उनके दिल में ख़ौफ़ था, आँखों में इंतज़ार था, और कदमों में जल्दी थी।
इसी हालत में उन्होंने अपने रब की तरफ रुजू किया और यह दुआ माँगी: "ऐ मेरे रब! मुझे इन ज़ालिम लोगों से नजात दे।" यह दुआ सिर्फ दुश्मन के डर से नहीं थी, बल्कि यह एक नबी की गहरी आजिज़ी और अल्लाह पर भरोसे का इज़हार था। वे जानते थे कि असली बचाने वाला सिर्फ अल्लाह है, और इंसानी ताकतें चाहे कितनी भी बड़ी हों, अल्लाह की पनाह में आकर ही इंसान महफूज़ रह सकता है।
यहाँ से हमें यह सबक मिलता है कि जब इंसान किसी मुश्किल में फँसे, तो सबसे पहले उसे अल्लाह की तरफ रुजू करना चाहिए। मूसा (अलैहिस्सलाम) जैसे अज़ीम नबी ने भी जब खतरा देखा, तो फ़ौरन दुआ का सहारा लिया। यह दुआ हमें सिखाती है कि हर हाल में अल्लाह ही से मदद माँगनी चाहिए, चाहे हालात कितने ही भयानक क्यों न हों। अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़ुबूल की और उन्हें फ़िरऔन के ज़ुल्म से बचा लिया, और आगे चलकर उन्हें नबुव्वत और किताब जैसी बड़ी नेमतें अता फ़रमाईं।
यह क़िस्सा हमें यह भी बताता है कि अल्लाह के नेक बंदों को जब दुश्मनों के ज़ुल्म से गुज़रना पड़ता है, तो अल्लाह उनके लिए रास्ता निकालता है। मूसा (अलैहिस्सलाम) अकेले थे, उनके पास कोई लश्कर नहीं था, कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनके पास अल्लाह पर भरोसा था, और यही भरोसा उनके लिए काफी था। आज भी अगर कोई मुसलमान सच्चे दिल से अल्लाह की पनाह माँगे, तो अल्लाह उसे हर मुसीबत से निकालने का रास्ता दिखाता है। यह दुआ हमें याद रखनी चाहिए और मुश्किल वक़्त में पढ़नी चाहिए: "رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ" — "ऐ मेरे रब! मुझे ज़ालिम लोगों से बचा ले।"
📜 आयत 19-23 — सूरा अल-क़सस
अनुवाद — अल-क़सस 21
सूरा अल-क़सस आयत 21 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : मै तुमसे ख़ैरख्वाहाना (भलाइ के लिए) कहता हूँ ग़रज़ मूसा…सूरा आयत 21/88 — सूरा अल-क़सस القصص (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-क़सस सुनें, सूरा अल-क़सस अनुवाद, सूरा अल-क़सस mp3, सूरा अल-क़सस pdf. आयत 19–23. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Saturday, October 3, 2026
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