अल-क़सस · 21/88
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-क़सस
فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ ۝٢١
Fakharaja minhaa khaaa `ifany-yataraqqab; qaala Rabbi najjinee minal qawmiz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
मै तुमसे ख़ैरख्वाहाना (भलाइ के लिए) कहता हूँ ग़रज़ मूसा वहाँ से उम्मीद व बीम की हालत में निकल खडे हुए और (बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की परवरदिगार मुझे ज़ालिम लोगों (के हाथ) से नजात दे

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَائِفًا (ख़ाइफ़न): डरा हुआ, भयभीत।
  • يَتَرَقَّبُ (यतरक़्क़बु): इंतज़ार करता हुआ, टोह लेता हुआ, यह देखता हुआ कि कब कोई पीछा करके आता है।
  • نَجِّنِي (नज्जिनी): मुझे बचा ले, मुझे नजात दे।
  • الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ (अल-क़ौमि अज़-ज़ालिमीन): अत्याचारी और ज़ालिम लोग, यहाँ अर्थ है फ़िरऔन और उसके सरदार।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने उस नेक इंसान की सलाह सुनी, जो शहर के दूर इलाक़े से दौड़ता हुआ आया और उन्हें फ़िरऔन की साज़िश से आगाह किया, तो वे तुरंत समझ गए कि अब यहाँ रुकना खतरे से खाली नहीं। चुनाँचे वे उस शहर से निकले, लेकिन उनका निकलना किसी आराम और इत्मिनान के साथ नहीं था, बल्कि वे डरे हुए थे और हर पल यह देख रहे थे कि कहीं पीछे से कोई आकर उन्हें पकड़ न ले। उनके दिल में ख़ौफ़ था, आँखों में इंतज़ार था, और कदमों में जल्दी थी।

इसी हालत में उन्होंने अपने रब की तरफ रुजू किया और यह दुआ माँगी: "ऐ मेरे रब! मुझे इन ज़ालिम लोगों से नजात दे।" यह दुआ सिर्फ दुश्मन के डर से नहीं थी, बल्कि यह एक नबी की गहरी आजिज़ी और अल्लाह पर भरोसे का इज़हार था। वे जानते थे कि असली बचाने वाला सिर्फ अल्लाह है, और इंसानी ताकतें चाहे कितनी भी बड़ी हों, अल्लाह की पनाह में आकर ही इंसान महफूज़ रह सकता है।

यहाँ से हमें यह सबक मिलता है कि जब इंसान किसी मुश्किल में फँसे, तो सबसे पहले उसे अल्लाह की तरफ रुजू करना चाहिए। मूसा (अलैहिस्सलाम) जैसे अज़ीम नबी ने भी जब खतरा देखा, तो फ़ौरन दुआ का सहारा लिया। यह दुआ हमें सिखाती है कि हर हाल में अल्लाह ही से मदद माँगनी चाहिए, चाहे हालात कितने ही भयानक क्यों न हों। अल्लाह ने उनकी यह दुआ क़ुबूल की और उन्हें फ़िरऔन के ज़ुल्म से बचा लिया, और आगे चलकर उन्हें नबुव्वत और किताब जैसी बड़ी नेमतें अता फ़रमाईं।

यह क़िस्सा हमें यह भी बताता है कि अल्लाह के नेक बंदों को जब दुश्मनों के ज़ुल्म से गुज़रना पड़ता है, तो अल्लाह उनके लिए रास्ता निकालता है। मूसा (अलैहिस्सलाम) अकेले थे, उनके पास कोई लश्कर नहीं था, कोई हथियार नहीं था, लेकिन उनके पास अल्लाह पर भरोसा था, और यही भरोसा उनके लिए काफी था। आज भी अगर कोई मुसलमान सच्चे दिल से अल्लाह की पनाह माँगे, तो अल्लाह उसे हर मुसीबत से निकालने का रास्ता दिखाता है। यह दुआ हमें याद रखनी चाहिए और मुश्किल वक़्त में पढ़नी चाहिए: "رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ" — "ऐ मेरे रब! मुझे ज़ालिम लोगों से बचा ले।"



📜 आयत 19-23 — सूरा अल-क़सस

19فَلَمَّا أَنْ أَرَادَ أَن يَبْطِشَ بِالَّذِي هُوَ عَدُوٌّ لَّهُمَا قَالَ يَا مُوسَىٰ أَتُرِيدُ أَن تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ ۖ إِن تُرِيدُ إِلَّا أَن تَكُونَ جَبَّارًا فِي الْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَن تَكُونَ مِنَ الْمُصْلِحِينَ
ग़रज़ जब मूसा ने चाहा कि उस शख्स पर जो दोनों का दुश्मन था (छुड़ाने के लिए) हाथ बढ़ाएँ तो क़िब्ती कहने लगा कि ऐ मूसा जिस तरह तुमने कल एक आदमी को मार डाला (उसी तरह) मुझे भी मार डालना चाहते हो तो तुम बस ये चाहते हो कि रुए ज़मीन में सरकश बन कर रहो और मसलह (क़ौम) बनकर रहना नहीं चाहते
20وَجَاءَ رَجُلٌ مِّنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنَّ الْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَاخْرُجْ إِنِّي لَكَ مِنَ النَّاصِحِينَ
और एक शख्स शहर के उस किनारे से डराता हुआ आया और (मूसा से) कहने लगा मूसा (तुम ये यक़ीन जानो कि शहर के) बड़े बड़े आदमी तुम्हारे आदमी तुम्हारे बारे में मशवरा कर रहे हैं कि तुमको कत्ल कर डालें तो तुम (शहर से) निकल भागो
21فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
मै तुमसे ख़ैरख्वाहाना (भलाइ के लिए) कहता हूँ ग़रज़ मूसा वहाँ से उम्मीद व बीम की हालत में निकल खडे हुए और (बारगाहे ख़ुदा में) अर्ज़ की परवरदिगार मुझे ज़ालिम लोगों (के हाथ) से नजात दे
22وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَاءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّي أَن يَهْدِيَنِي سَوَاءَ السَّبِيلِ
और जब मदियन की तरफ रुख़ किया (और रास्ता मालूम न था) तो आप ही आप बोले मुझे उम्मीद है कि मेरा परवरदिगार मुझे सीधे रास्ता दिखा दे
23وَلَمَّا وَرَدَ مَاءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِّنَ النَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِن دُونِهِمُ امْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِي حَتَّىٰ يُصْدِرَ الرِّعَاءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌ كَبِيرٌ
और (आठ दिन फाक़ा करते चले) जब शहर मदियन के कुओं पर (जो शहर के बाहर था) पहुँचें तो कुओं पर लोगों की भीड़ देखी कि वह (अपने जानवरों को) पानी पिला रहे हैं और उन सबके पीछे दो औरतो (हज़रत शुएब की बेटियों) को देखा कि वह (अपनी बकरियों को) रोके खड़ी है मूसा ने पूछा कि तुम्हारा क्या मतलब है वह बोली जब तक सब चरवाहे (अपने जानवरों को) ख़ूब छक के पानी पिला कर फिर न जाएँ हम नहीं पिला सकते और हमारे वालिद बहुत बूढे हैं
अल-क़ससकुरान सूची
88आयत
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21आयत

अनुवाद — अल-क़सस 21

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Saturday, October 3, 2026

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