अल-अंकबूत · 3/69
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-अंकबूत
وَلَقَدْ فَتَنَّا الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۖ فَلَيَعْلَمَنَّ اللَّهُ الَّذِينَ صَدَقُوا وَلَيَعْلَمَنَّ الْكَاذِبِينَ ۝٣
Wa laqad fatannal lazeena min qablihim fala ya`lamannal laahul lazeena sadaqoo wa la ya`lamannal kaazibeen
📖 हिंदी अर्थ
और हमने तो उन लोगों का भी इम्तिहान लिया जो उनसे पहले गुज़र गए ग़रज़ ख़ुदा उन लोगों को जो सच्चे (दिल से ईमान लाए) हैं यक़ीनन अलहाएदा देखेगा और झूठों को भी (अलहाएदा) ज़रुर देखेगा

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • فَتَنَّا: हमने परीक्षण किया, आज़माया।
  • صَدَقُوا: सच्चाई पर स्थिर रहे, अपने ईमान में सच्चे रहे।
  • الْكَاذِبِينَ: झूठे, जो ईमान के दावे में झूठे हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला इस आयत में अपने नबी ﷺ और उनके साथियों को तसल्ली देते हुए फ़रमाते हैं कि हमने उन लोगों को भी परीक्षण में डाला था जो तुमसे पहले गुज़रे हैं। हर ज़माने में अल्लाह ने अपने नबियों और उनकी उम्मतों को मुश्किलों, तकलीफ़ों और सख्त इम्तिहानों से गुज़ारा है। यह कोई नई बात नहीं कि ईमान लाने वालों को परेशानियों का सामना करना पड़े। हज़रत याहया (अलैहिस्सलाम) को आरी से चीरा गया, हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) के साथियों को सख्त अज़ाब दिए गए, और हर नबी की उम्मत को उसके दुश्मनों की तरफ से तकलीफ़ें पहुँचाई गईं। मगर जो लोग सच्चे दिल से ईमान लाए थे, उन्होंने हर मुश्किल को सहन किया और अपने दीन पर क़ायम रहे।

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह परीक्षण इसलिए है ताकि अल्लाह के इल्म के मुताबिक़ सामने आ जाए कि कौन अपने ईमान के दावे में सच्चा है और कौन झूठा। अल्लाह को तो सब कुछ पहले से मालूम है, लेकिन यह इम्तिहान इसलिए है ताकि लोगों के सामने सच्चे और झूठे का फ़र्क़ साफ़ हो जाए, और हर इंसान अपने अमल से यह साबित करे कि उसका ईमान कितना सच्चा है। जो लोग सिर्फ़ ज़ुबान से ईमान का दावा करते हैं, वे जब मुश्किलें आती हैं तो पलट जाते हैं, जबकि सच्चे मोमिन हर हालत में अल्लाह पर भरोसा रखते हैं और साबित क़दम रहते हैं।

यह आयत हमें सिखाती है कि मुसीबतें और आज़माइशें अल्लाह की राह में आने वाले हर इंसान के लिए एक सुन्नत (क़ानून) हैं। यह कोई अजीब बात नहीं कि एक मुसलमान को अपने ईमान की वजह से तकलीफ़ उठानी पड़े। बल्कि यही तो सच्चे ईमान की पहचान है। जब हम मुश्किलों में सब्र करते हैं और अल्लाह पर भरोसा रखते हैं, तो हम साबित करते हैं कि हमारा ईमान सिर्फ़ ज़ुबानी नहीं, बल्कि दिली है। अल्लाह अपने सच्चे बंदों को कभी अकेला नहीं छोड़ता, और जो लोग उसकी राह में सब्र करते हैं, उनके लिए अल्लाह के पास बड़ा अज्र और इनाम है। यह इम्तिहान हमारे लिए रहमत है, क्योंकि इसी के ज़रिए हमारा दर्जा बुलंद होता है और हमारा ईमान मज़बूत होता है।



📜 आयत 1-5 — सूरा अल-अंकबूत

1الم
अलिफ़ लाम मीम
2أَحَسِبَ النَّاسُ أَن يُتْرَكُوا أَن يَقُولُوا آمَنَّا وَهُمْ لَا يُفْتَنُونَ
क्या लोगों ने ये समझ लिया है कि (सिर्फ) इतना कह देने से कि हम ईमान लाए छोड़ दिए जाएँगे और उनका इम्तेहान न लिया जाएगा
3وَلَقَدْ فَتَنَّا الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۖ فَلَيَعْلَمَنَّ اللَّهُ الَّذِينَ صَدَقُوا وَلَيَعْلَمَنَّ الْكَاذِبِينَ
और हमने तो उन लोगों का भी इम्तिहान लिया जो उनसे पहले गुज़र गए ग़रज़ ख़ुदा उन लोगों को जो सच्चे (दिल से ईमान लाए) हैं यक़ीनन अलहाएदा देखेगा और झूठों को भी (अलहाएदा) ज़रुर देखेगा
4أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ يَعْمَلُونَ السَّيِّئَاتِ أَن يَسْبِقُونَا ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ
क्या जो लोग बुरे बुरे काम करते हैं उन्होंने ये समझ लिया है कि वह हमसे (बचकर) निकल जाएँगे (अगर ऐसा है तो) ये लोग क्या ही बुरे हुक्म लगाते हैं
5مَن كَانَ يَرْجُو لِقَاءَ اللَّهِ فَإِنَّ أَجَلَ اللَّهِ لَآتٍ ۚ وَهُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
जो शख्स ख़ुदा से मिलने (क़यामत के आने) की उम्मीद रखता है तो (समझ रखे कि) ख़ुदा की (मुक़र्रर की हुई) मीयाद ज़रुर आने वाली है और वह (सबकी) सुनता (और) जानता है
अल-अंकबूतकुरान सूची
69आयत
मक्कीअवतरण स्थान
3आयत

अनुवाद — अल-अंकबूत 3

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Wednesday, September 30, 2026

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