आल-इमरान · 147/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
وَمَا كَانَ قَوْلَهُمْ إِلَّا أَن قَالُوا رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ ۝١٤٧
Wa maa kaana qawlahum illaa an qaaloo Rabbanagh fir lanaa zunoobanaa wa israafanaa feee amirnaa wa sabbit aqdaamanaa wansurnaa `alal qawmil kaafireen
📖 हिंदी अर्थ
और लुत्फ़ ये है कि उनका क़ौल इसके सिवा कुछ न था कि दुआएं मॉगने लगें कि ऐ हमारे पालने वाले हमारे गुनाह और अपने कामों में हमारी ज्यादतियॉ माफ़ कर और दुश्मनों के मुक़ाबले में हमको साबित क़दम रख और काफ़िरों के गिरोह पर हमको फ़तेह दे
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • إِسْرَافَنَا: हद से आगे बढ़ना, अत्यधिकता करना।
  • ثَبِّتْ أَقْدَامَنَا: हमारे पैरों को जमाए रख, अर्थात हमें दृढ़ और स्थिर रख।
  • الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ: वे लोग जो अल्लाह की एकता और उसके रसूलों की नबुव्वत को नहीं मानते।

तफसीर (व्याख्या):

इन सब्र करने वाले मोमिनों का कथन, जब वे मुश्किलों और जंग के मैदान में मुसीबतों का सामना कर रहे थे, यही था कि उन्होंने अपने रब से यह दुआ मांगी: "ऐ हमारे रब! हमारे छोटे-बड़े सभी गुनाहों को माफ़ कर दे, और हमारी उन ज़्यादतियों को भी माफ़ कर जो हमने अपने दीन के मामले में की हैं। हमें मजबूती और स्थिरता प्रदान कर ताकि दुश्मन के मुकाबले में हमारे कदम न डगमगाएं और हम पीछे न हटें। और हमें उन काफिरों पर फतह और मदद अता फरमा जिन्होंने तेरी वहदानियत और तेरे नबियों की नबुव्वत का इनकार किया है।"

यह दुआ उनके सब्र, अल्लाह पर भरोसे और उसकी रहमत की ओर रुजू का प्रतीक है। उन्होंने अपनी कमज़ोरियों का इक़रार किया, अपने गुनाहों की माफ़ी मांगी, और अल्लाह से साबित क़दमी और नुसरत की दरख्वास्त की।

फ़ायदे (सीख):

  1. मुसीबत के वक़्त मोमिन का अंदाज़ शिकायत नहीं, बल्कि दुआ और अल्लाह की तरफ रुजू होना चाहिए।
  2. गुनाहों की माफ़ी मांगना, चाहे वे छोटे हों या बड़े, अल्लाह की रहमत का दरवाज़ा खटखटाना है।
  3. जंग और मुश्किलों में अल्लाह से साबित क़दमी की दुआ मांगना सिखाया गया है, क्योंकि दृढ़ता अल्लाह ही की तरफ से आती है।
  4. यह दुआ हमें सिखाती है कि काफिरों के मुकाबले में अल्लाह से मदद मांगना जायज़ और मुस्तहब है, और यही मोमिन की पहचान है।
  5. इस आयत से मुहब्बत पैदा होती है कि अल्लाह अपने बंदों की दुआओं को सुनता है और उन्हें नुसरत देता है, बशर्ते वे सब्र और इख़लास के साथ उसकी तरफ रुजू करें।
🎧 सुनें

📜 आयत 145-149 — आल-इमरान

145وَمَا كَانَ لِنَفْسٍ أَن تَمُوتَ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ كِتَابًا مُّؤَجَّلًا ۗ وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَن يُرِدْ ثَوَابَ الْآخِرَةِ نُؤْتِهِ مِنْهَا ۚ وَسَنَجْزِي الشَّاكِرِينَ
और बगैर हुक्मे ख़ुदा के तो कोई शख्स मर ही नहीं सकता वक्ते मुअय्यन तक हर एक की मौत लिखी हुई है और जो शख्स (अपने किए का) बदला दुनिया में चाहे तो हम उसको इसमें से दे देते हैं और जो शख्स आख़ेरत का बदला चाहे उसे उसी में से देंगे और (नेअमत ईमान के) शुक्र करने वालों को बहुत जल्द हम जज़ाए खैर देंगे
146وَكَأَيِّن مِّن نَّبِيٍّ قَاتَلَ مَعَهُ رِبِّيُّونَ كَثِيرٌ فَمَا وَهَنُوا لِمَا أَصَابَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَمَا ضَعُفُوا وَمَا اسْتَكَانُوا ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الصَّابِرِينَ
और (मुसलमानों तुम ही नहीं) ऐसे पैग़म्बर बहुत से गुज़र चुके हैं जिनके साथ बहुतेरे अल्लाह वालों ने (राहे खुदा में) जेहाद किया और फिर उनको ख़ुदा की राह में जो मुसीबत पड़ी है न तो उन्होंने हिम्मत हारी न बोदापन किया (और न दुशमन के सामने) गिड़गिड़ाने लगे और साबित क़दम रहने वालों से ख़ुदा उलफ़त रखता है
147وَمَا كَانَ قَوْلَهُمْ إِلَّا أَن قَالُوا رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا ذُنُوبَنَا وَإِسْرَافَنَا فِي أَمْرِنَا وَثَبِّتْ أَقْدَامَنَا وَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ
और लुत्फ़ ये है कि उनका क़ौल इसके सिवा कुछ न था कि दुआएं मॉगने लगें कि ऐ हमारे पालने वाले हमारे गुनाह और अपने कामों में हमारी ज्यादतियॉ माफ़ कर और दुश्मनों के मुक़ाबले में हमको साबित क़दम रख और काफ़िरों के गिरोह पर हमको फ़तेह दे
148فَآتَاهُمُ اللَّهُ ثَوَابَ الدُّنْيَا وَحُسْنَ ثَوَابِ الْآخِرَةِ ۗ وَاللَّهُ يُحِبُّ الْمُحْسِنِينَ
तो ख़ुदा ने उनको दुनिया में बदला (दिया) और आख़िरत में अच्छा बदला ईनायत फ़रमाया और ख़ुदा नेकी करने वालों को दोस्त रखता (ही) है
149يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تُطِيعُوا الَّذِينَ كَفَرُوا يَرُدُّوكُمْ عَلَىٰ أَعْقَابِكُمْ فَتَنقَلِبُوا خَاسِرِينَ
ऐ ईमानदारों अगर तुम लोगों ने काफ़िरों की पैरवी कर ली तो (याद रखो) वह तुमको उलटे पॉव (कुफ़्र की तरफ़) फेर कर ले जाऐंगे फिर उलटे तुम ही घाटे में आ जाओगे
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अनुवाद — आल-इमरान 147

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Tuesday, August 18, 2026

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