आल-इमरान · 88/200
अनुवाद उच्चारण — आल-इमरान
خَالِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ ۝٨٨
Khaalideena feehaa laa yukhaffafu `anhumul `azaabu wa laa hum yunzaroon
📖 हिंदी अर्थ
और वह हमेशा उसी फिटकार में रहेंगे न तो उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ की जाएगी और न उनको मोहलत दी जाएगी

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَالِدِينَ: हमेशा रहने वाले, स्थायी रूप से ठहरने वाले।
  • لَا يُخَفَّفُ: हल्का नहीं किया जाएगा, कम नहीं किया जाएगा।
  • الْعَذَابُ: यातना, दंड।
  • يُنظَرُونَ: उन्हें मोहलत दी जाएगी, देर की जाएगी, या उन पर दया की दृष्टि डाली जाएगी।

तफ़सीर (व्याख्या):

ये आयत उन लोगों के बारे में है जिन्होंने ईमान लाने के बाद कुफ़्र (अधर्म) अपनाया और अपने कुफ़्र पर ही मर गए। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह की लानत (फिटकार) है, और वे इस लानत में हमेशा रहने वाले हैं। वे जहन्नम (नरक) की आग में स्थायी रूप से रहेंगे, और वहाँ से निकलना उनके लिए संभव नहीं होगा। उनकी यातना में कोई कमी नहीं की जाएगी, न तो थोड़ी देर के लिए ही सही, ताकि उन्हें कुछ राहत मिल सके। उन्हें कोई मोहलत भी नहीं दी जाएगी, न तो तौबा (पश्चाताप) करने के लिए और न ही कोई बहाना पेश करने के लिए। उनके लिए न तो यातना में कमी है और न ही उसमें देरी — दोनों ही चीज़ें उनसे छीन ली गई हैं। यानी उनकी सज़ा पूरी तरह से स्थायी और बिना किसी राहत के होगी, जो उनके कुफ़्र और अल्लाह के साथ धोखेबाज़ी के कारण उनका हक़ बन गई है।

फ़ायदे (सबक):

  1. यह आयत हमें यह गंभीर चेतावनी देती है कि ईमान लाने के बाद कुफ़्र की ओर लौटना अत्यंत गंभीर अपराध है, जिसका अंजाम हमेशा की यातना है।
  2. अल्लाह की रहमत और माफ़ी का दरवाज़ा जीवन भर खुला रहता है, लेकिन मौत के बाद कोई मौका नहीं मिलता। इसलिए हमें जीते जी तौबा कर लेनी चाहिए और अल्लाह की ओर लौट आना चाहिए।
  3. यह आयत हमें यह भी सिखाती है कि अल्लाह का इंसाफ़ (न्याय) बिल्कुल सटीक है — जो लोग सच्चाई जानने के बाद उसे ठुकरा दें, उनके लिए कोई बहाना या राहत नहीं होगी।
  4. इससे हमें अपने दीन (धर्म) पर स्थिर रहने की प्रेरणा मिलती है, क्योंकि सच्चा ईमान ही वह चीज़ है जो हमें इस स्थायी यातना से बचा सकता है।
  5. यह आयत हमें अल्लाह के साथ अपने रिश्ते की अहमियत समझाती है — जो अल्लाह से सच्चे दिल से जुड़ा रहता है, वह कभी इस तरह के अंजाम से नहीं डरता, क्योंकि अल्लाह की रहमत उसके ग़ुस्से से कहीं बढ़कर है।


📜 आयत 86-90 — आल-इमरान

86كَيْفَ يَهْدِي اللَّهُ قَوْمًا كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ وَشَهِدُوا أَنَّ الرَّسُولَ حَقٌّ وَجَاءَهُمُ الْبَيِّنَاتُ ۚ وَاللَّهُ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ
भला ख़ुदा ऐसे लोगों की क्योंकर हिदायत करेगा जो इमाने लाने के बाद फिर काफ़िर हो गए हालॉकि वह इक़रार कर चुके थे कि पैग़म्बर (आख़िरूज़ज़मा) बरहक़ हैं और उनके पास वाजेए व रौशन मौजिज़े भी आ चुके थे और ख़ुदा ऐसी हठधर्मी करने वाले लोगों की हिदायत नहीं करता
87أُولَٰئِكَ جَزَاؤُهُمْ أَنَّ عَلَيْهِمْ لَعْنَةَ اللَّهِ وَالْمَلَائِكَةِ وَالنَّاسِ أَجْمَعِينَ
ऐसे लोगों की सज़ा यह है कि उनपर ख़ुदा और फ़रिश्तों और (दुनिया जहॉन के) सब लोगों की फिटकार हैं
88خَالِدِينَ فِيهَا لَا يُخَفَّفُ عَنْهُمُ الْعَذَابُ وَلَا هُمْ يُنظَرُونَ
और वह हमेशा उसी फिटकार में रहेंगे न तो उनके अज़ाब ही में तख्फ़ीफ़ की जाएगी और न उनको मोहलत दी जाएगी
89إِلَّا الَّذِينَ تَابُوا مِن بَعْدِ ذَٰلِكَ وَأَصْلَحُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
मगर (हॉ) जिन लोगों ने इसके बाद तौबा कर ली और अपनी (ख़राबी की) इस्लाह कर ली तो अलबत्ता ख़ुदा बड़ा बख्शने वाला मेहरबान है
90إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بَعْدَ إِيمَانِهِمْ ثُمَّ ازْدَادُوا كُفْرًا لَّن تُقْبَلَ تَوْبَتُهُمْ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الضَّالُّونَ
जो अपने ईमान के बाद काफ़िर हो बैठे फ़िर (रोज़ बरोज़ अपना) कुफ़्र बढ़ाते चले गये तो उनकी तौबा हरगिज़ न कुबूल की जाएगी और यही लोग (पल्ले दरजे के) गुमराह हैं
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अनुवाद — आल-इमरान 88

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Tuesday, August 18, 2026

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