अल-अहज़ाब · 30/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا ۝٣٠
Yaa nisaaa`an Nabiyyi mai yaati minkunna bifaa hishatim mubaiyinatiny yudaa`af lahal `azaabu di`fain wa kaana zaalika `alal laahi yaseera
📖 हिंदी अर्थ
ऐ पैग़म्बर की बीबियों तुममें से जो कोई किसी सरीही ना शाइस्ता हरकत की का मुरतिब हुई तो (याद रहे कि) उसका अज़ाब भी दुगना बढ़ा दिया जाएगा और खुदा के वास्ते (निहायत) आसान है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • फ़ाहिशah (فَاحِشَةٍ) — खुला अश्लील काम, स्पष्ट पाप, बड़ी बुराई।
  • मुबय्यिनah (مُبَيِّنَةٍ) — प्रकट, स्पष्ट, जो छिपी न हो।
  • युज़ाफ़ (يُضَاعَفْ) — दोगुना किया जाए, बढ़ा दिया जाए।
  • दिफ़्फ़ैन (ضِعْفَيْنِ) — दो गुना, दुगना।
  • यसीरन (يَسِيرًا) — आसान, सहज।

तफ़सीर:

ऐ नबी की पत्नियों! तुम सामान्य औरतों की तरह नहीं हो। तुम्हारा मर्तबा बहुत ऊँचा है, और इसी ऊँचाई के कारण तुम पर ज़िम्मेदारी भी बहुत बड़ी है। अगर तुममें से कोई खुली बुराई करे — जैसे बदचलनी, सुशीलता में कमी, या कोई ऐसा काम जो अल्लाह और उसके रसूल ﷺ को नापसंद हो — तो उसे दो गुना अज़ाब दिया जाएगा। यानी सामान्य औरतों की सज़ा से दुगनी सज़ा। यह इसलिए है कि तुम्हारा दर्जा ऊँचा है, और ऊँचे दर्जे वालों से उम्मीद भी बड़ी होती है। जिस तरह एक आज़ाद औरत की ग़लती पर उस लौंडी से ज़्यादा सख़्ती बरती जाती है, उसी तरह नबी की पत्नियों की ग़लती पर आम औरतों से ज़्यादा सख़्ती होगी।

यह अज़ाब अल्लाह पर बिल्कुल आसान है — यानी अल्लाह की क़ुदरत के लिए इसमें कोई मुश्किल नहीं। वह जिसे चाहे सज़ा दे, और जिसे चाहे माफ़ कर दे। यह बात उन्हें डराने के लिए कही गई है ताकि वे अपने आपको हर बुराई से बचाए रखें।

लेकिन साथ ही, अल्लाह ने उनके लिए यह भी बताया है कि जिस तरह बुराई पर दो गुना सज़ा है, उसी तरह अच्छाई पर भी दो गुना अज्र (सवाब) है। यह अल्लाह की रहमत है कि उसने उनके दर्जे के हिसाब से दोनों का हिसाब रखा है। यह बात उन्हें दोनों तरफ़ से सचेत करती है — डर भी और उम्मीद भी।

यह आयत हम सबके लिए सबक़ है कि जिसे अल्लाह ने जितना ऊँचा मर्तबा दिया है, उससे उतनी ही बड़ी ज़िम्मेदारी ली जाएगी। इसलिए हमें अपनी नेकियों पर नाज़ नहीं करना चाहिए, बल्कि हमेशा अल्लाह से डरते रहना चाहिए और अपने आपको बुराई से बचाते रहना चाहिए। अल्लाह इंसाफ़ करने वाला है, लेकिन वह रहम करने वाला भी है — जो कोई उसकी तरफ़ लौट आए, उसके लिए माफ़ी के दरवाज़े खुले हैं।



📜 आयत 28-32 — अल-अहज़ाब

28يَا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّأَزْوَاجِكَ إِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَزِينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ أُمَتِّعْكُنَّ وَأُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًا جَمِيلًا
ऐ रसूल अपनी बीवियों से कह दो कि अगर तुम (फक़त) दुनियावी ज़िन्दगी और उसकी आराइश व ज़ीनत की ख्वाहॉ हो तो उधर आओ मैं तुम लोगों को कुछ साज़ो सामान दे दूँ और उनवाने शाइस्ता से रूख़सत कर दूँ
29وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْآخِرَةَ فَإِنَّ اللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًا
और अगर तुम लोग खुदा और उसके रसूल और आखेरत के घर की ख्वाहॉ हो तो (अच्छी तरह ख्याल रखो कि) तुम लोगों में से नेकोकार औरतों के लिए खुदा ने यक़ीनन् बड़ा (बड़ा) अज्र व (सवाब) मुहय्या कर रखा है
30يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
ऐ पैग़म्बर की बीबियों तुममें से जो कोई किसी सरीही ना शाइस्ता हरकत की का मुरतिब हुई तो (याद रहे कि) उसका अज़ाब भी दुगना बढ़ा दिया जाएगा और खुदा के वास्ते (निहायत) आसान है
31۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُّؤْتِهَا أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَرِيمًا
और तुममें से जो (बीवी) खुदा और उसके रसूल की ताबेदारी अच्छे (अच्छे) काम करेगी उसको हम उसका सवाब भी दोहरा अता करेगें और हमने उसके लिए (जन्नत में) इज्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है
32يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍ مِّنَ النِّسَاءِ ۚ إِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
ऐ नबी की बीवियों तुम और मामूली औरतों की सी तो हो वही (बस) अगर तुम को परहेज़गारी मंजूर रहे तो (अजनबी आदमी से) बात करने में नरम नरम (लगी लिपटी) बात न करो ताकि जिसके दिल में (शहवते ज़िना का) मर्ज़ है वह (कुछ और) इरादा (न) करे
अल-अहज़ाबकुरान सूची
73आयत
मदनीRevelation
30आयत

अनुवाद — अल-अहज़ाब 30

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Tuesday, August 18, 2026

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