अल-अहज़ाब · 31/73
अनुवाद उच्चारण — अल-अहज़ाब
۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُّؤْتِهَا أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَرِيمًا ۝٣١
Wa mai yaqnut minkunna lillaahi wa Rasoolihee wa ta`mal saalihan nu`tihaaa ajrahaa marratayni wa a`tadnaa lahaa rizqan kareema
📖 हिंदी अर्थ
और तुममें से जो (बीवी) खुदा और उसके रसूल की ताबेदारी अच्छे (अच्छे) काम करेगी उसको हम उसका सवाब भी दोहरा अता करेगें और हमने उसके लिए (जन्नत में) इज्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • य़क़्नुत (يَقْنُتْ) – अर्थात आज्ञाकारी रहे, निरंतर आज्ञा का पालन करे।
  • क़ुनूत (قُنُوت) – अर्थात दीर्घकालिक आज्ञाकारिता और विनम्रता।
  • नु'तिहा (نُؤْتِهَا) – अर्थात हम उसे प्रदान करेंगे।
  • अ'तदना (أَعْتَدْنَا) – अर्थात हमने तैयार कर रखा है।
  • रिज़्क़न करीमन (رِزْقًا كَرِيمًا) – अर्थात सम्मानजनक और उत्तम आजीविका, जो स्वर्ग है।

व्याख्या:

अल्लाह तआला इस पवित्र आयत में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पाक बीवियों को सम्बोधित करते हुए फ़रमाता है कि जो कोई भी तुममें से अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगी, और अच्छे कर्म करेगी – यानी जो आदेश अल्लाह ने दिए हैं उन पर अमल करेगी और जिन चीज़ों से रोका है उनसे बचेगी – तो अल्लाह उसे दोहरा प्रतिफल प्रदान करेगा। अर्थात उसे अन्य सामान्य महिलाओं के बराबर नहीं, बल्कि दोगुना अज्र मिलेगा, क्योंकि उसकी ज़िम्मेदारी अधिक है और उसका दर्जा भी ऊँचा है। यह अल्लाह की ओर से विशेष कृपा है।

फिर अल्लाह फ़रमाता है कि हमने उसके लिए एक उत्तम और सम्मानजनक आजीविका तैयार कर रखी है – और वह है जन्नत। यह जन्नत ऐसी जगह है जहाँ हर प्रकार की नेमतें, सुख-शांति और आनन्द है, जिसका कोई अंत नहीं। यह अल्लाह का वादा है जो कभी टूटता नहीं।

इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति जितना अधिक ज़िम्मेदार होता है, उसकी परीक्षा भी उतनी ही कठिन होती है, लेकिन उसका प्रतिफल भी उतना ही अधिक होता है। अल्लाह किसी के अच्छे कर्म को व्यर्थ नहीं करता। चाहे वह कर्म छोटा हो या बड़ा, अल्लाह उसका पूरा-पूरा बदला देता है। यह अल्लाह की रहमत और करम है कि वह अपने बन्दों को उनके अच्छे कर्मों का प्रतिफल कई गुना बढ़ाकर देता है।

इस आयत में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि अल्लाह ने "क़ुनूत" (निरंतर आज्ञाकारिता) का ज़िक्र किया – यानी केवल एक बार या कभी-कभार आज्ञा मानना काफी नहीं, बल्कि निरंतर और स्थिर रूप से आज्ञाकारी रहना चाहिए। यही सच्ची ईमानदारी है। साथ ही "अच्छे कर्म" का ज़िक्र भी किया – यानी केवल आज्ञाकारिता का दावा ही नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों का होना भी आवश्यक है। दोनों का संगम ही सच्ची सफलता की कुंजी है।

यह आयत हर मुसलमान महिला और पुरुष के लिए प्रेरणा का स्रोत है कि वे अल्लाह की आज्ञा का पालन करें और अच्छे कर्म करें, क्योंकि अल्लाह का वादा है कि वह उन्हें दोगुना प्रतिफल देगा और उनके लिए सम्मानजनक आजीविका तैयार करेगा। यह अल्लाह की ओर से एक महान उपहार है, जो उसके वफादार बन्दों की प्रतीक्षा कर रहा है।



📜 आयत 29-33 — अल-अहज़ाब

29وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْآخِرَةَ فَإِنَّ اللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًا
और अगर तुम लोग खुदा और उसके रसूल और आखेरत के घर की ख्वाहॉ हो तो (अच्छी तरह ख्याल रखो कि) तुम लोगों में से नेकोकार औरतों के लिए खुदा ने यक़ीनन् बड़ा (बड़ा) अज्र व (सवाब) मुहय्या कर रखा है
30يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
ऐ पैग़म्बर की बीबियों तुममें से जो कोई किसी सरीही ना शाइस्ता हरकत की का मुरतिब हुई तो (याद रहे कि) उसका अज़ाब भी दुगना बढ़ा दिया जाएगा और खुदा के वास्ते (निहायत) आसान है
31۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُّؤْتِهَا أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَرِيمًا
और तुममें से जो (बीवी) खुदा और उसके रसूल की ताबेदारी अच्छे (अच्छे) काम करेगी उसको हम उसका सवाब भी दोहरा अता करेगें और हमने उसके लिए (जन्नत में) इज्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है
32يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍ مِّنَ النِّسَاءِ ۚ إِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
ऐ नबी की बीवियों तुम और मामूली औरतों की सी तो हो वही (बस) अगर तुम को परहेज़गारी मंजूर रहे तो (अजनबी आदमी से) बात करने में नरम नरम (लगी लिपटी) बात न करो ताकि जिसके दिल में (शहवते ज़िना का) मर्ज़ है वह (कुछ और) इरादा (न) करे
33وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ الصَّلَاةَ وَآتِينَ الزَّكَاةَ وَأَطِعْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
और (साफ-साफ) उनवाने शाइस्ता से बात किया करो और अपने घरों में निचली बैठी रहो और अगले ज़माने जाहिलियत की तरह अपना बनाव सिंगार न दिखाती फिरो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ा करो और (बराबर) ज़कात दिया करो और खुदा और उसके रसूल की इताअत करो ऐ (पैग़म्बर के) अहले बैत खुदा तो बस ये चाहता है कि तुमको (हर तरह की) बुराई से दूर रखे और जो पाक व पाकीज़ा दिखने का हक़ है वैसा पाक व पाकीज़ा रखे
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अनुवाद — अल-अहज़ाब 31

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Tuesday, August 18, 2026

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