सबा · 30/54
अनुवाद उच्चारण — सूरा सबा
قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ ۝٣٠
Qul lakum mee`aadu Yawmil laa tastaakhiroona `anhu saa`atanw wa la tastaqdimoon
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि तुम लोगों के वास्ते एक ख़ास दिन की मीयाद मुक़र्रर है कि न तुम उससे एक घड़ी पीछे रह सकते हो और न आगे ही बड़ सकते हो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मी'आद – वादा किया गया समय, नियत घड़ी
  • ला तस्तक़्दिमून – तुम उससे पहले नहीं आ सकते

तफ़सीर:

ऐ नबी! आप इन मुस्त'जिल (जल्दबाज़ी करने वालों) से कह दीजिए जो अज़ाब को जल्दी माँगते हैं और उसका मज़ाक़ उड़ाते हैं: "तुम्हारे लिए एक नियत समय और एक मुक़र्रर दिन है, जो तुम्हें आकर रहेगा। वह दिन क़ियामत का दिन है। उस दिन से तुम एक घड़ी भर पीछे नहीं हट सकते और न ही एक घड़ी भर पहले आ सकते हो।"

यानी जब वह दिन आ जाएगा, तो न तो तुम उसे टाल सकोगे और न ही उसे जल्दी ला सकोगे। यह अल्लाह तआला का फ़ैसला है जो उसके हुक्म से ही वक़ू' में आएगा। यह दिन उन लोगों के लिए बहुत भयानक होगा जिन्होंने आज उसे झुठलाया और उसका मज़ाक़ उड़ाया।

यह आयत उन लोगों के लिए एक सख़्त तनबीह (चेतावनी) है जो अज़ाब को जल्दी माँगते हैं। वे समझते हैं कि यह कभी आएगा ही नहीं, लेकिन अल्लाह का वादा सच्चा है। जिस दिन वह आ जाएगा, उस दिन किसी को मोहलत नहीं मिलेगी।

इस आयत से हमें यह सबक़ मिलता है कि अल्लाह का वादा अटल है। क़ियामत का दिन ज़रूर आएगा, चाहे लोग उसे झुठलाएँ या उसका मज़ाक़ उड़ाएँ। इसलिए हमें चाहिए कि हम उस दिन के लिए तैयारी करें, अपने आ'माल (कर्मों) को सुधारें, और अल्लाह की इबादत और उसके रसूल की पैरवी में अपनी ज़िंदगी गुज़ारें।

यह भी याद रखें कि अल्लाह की रहमत बहुत वसी' (विस्तृत) है। उसने हमें तौबा का दरवाज़ा खुला रखा है। जब तक हमारी मौत नहीं आ जाती, हम तौबा कर सकते हैं और अल्लाह की रहमत के हक़दार बन सकते हैं। लेकिन जब क़ियामत आ जाएगी, तो कोई तौबा क़बूल नहीं होगी। इसलिए आज ही का दिन है, आज ही की घड़ी है – अल्लाह की तरफ़ पलटने का, उसकी रहमत और मग़फ़िरत हासिल करने का।



📜 आयत 28-32 — सूरा सबा

28وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
(ऐ रसूल) हमने तुमको तमाम (दुनिया के) लोगों के लिए (नेकों को बेहश्त की) खुशखबरी देने वाला और (बन्दों को अज़ाब से) डराने वाला (पैग़म्बर) बनाकर भेजा मगर बहुतेरे लोग (इतना भी) नहीं जानते
29وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
और (उलटे) कहते हैं कि अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो तो (आख़िर) ये क़यामत का वायदा कब पूरा होगा
30قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ
(ऐ रसूल) तुम उनसे कह दो कि तुम लोगों के वास्ते एक ख़ास दिन की मीयाद मुक़र्रर है कि न तुम उससे एक घड़ी पीछे रह सकते हो और न आगे ही बड़ सकते हो
31وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
और जो लोग काफिर हों बैठे कहते हैं कि हम तो न इस क़ुरान पर हरगिज़ ईमान लाएँगे और न उस (किताब) पर जो इससे पहले नाज़िल हो चुकी और (ऐ रसूल तुमको बहुत ताज्जुब हो) अगर तुम देखो कि जब ये ज़ालिम क़यामत के दिन अपने परवरदिगार के सामने खड़े किए जायेंगे (और) उनमें का एक दूसरे की तरफ (अपनी) बात को फेरता होगा कि कमज़ोर अदना (दरजे के) लोग बड़े (सरकश) लोगों से कहते होगें कि अगर तुम (हमें) न (बहकाए) होते तो हम ज़रूर ईमानवाले होते (इस मुसीबत में न पड़ते)
32قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
तो सरकश लोग कमज़ोरों से (मुख़ातिब होकर) कहेंगे कि जब तुम्हारे पास (खुदा की तरफ़ से) हिदायत आयी तो थी तो क्या उसके आने के बाद हमने तुमको (ज़बरदस्ती अम्ल करने से) रोका था (हरगिज़ नहीं) बल्कि तुम तो खुद मुजरिम थे
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अनुवाद — सबा 30

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Thursday, October 1, 2026

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