अज़-ज़ुमर · 1/75
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुमर
تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ ۝١
Tanzeelul Kitaabi minal laahil `Azeezil Hakeem
📖 हिंदी अर्थ
(इस) किताब (क़ुरान) का नाज़िल करना उस खुदा की बारगाह से है जो (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • تَنزِيلُ – उतारना, अवतरित करना
  • الْكِتَابِ – यहाँ पर क़ुरआन करीम से इबारत है
  • الْعَزِيزِ – वह अल्लाह जो सब पर ग़ालिब है, जिसे कोई हरा न सके, ज़बरदस्त क़ुदरत वाला
  • الْحَكِيمِ – वह अल्लाह जो हर काम में हिकमत (समझदारी और प्रबंधन) रखता है

तफ़सीर:

यह आयत क़ुरआन करीम की अज़मत और उसके अल्लाह की तरफ़ से होने की सच्चाई को बयान करती है। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह क़ुरआन, जो किताबे-हिदायत है, उसका नुज़ूल (अवतरण) अल्लाह की तरफ़ से है — न कि किसी इंसान, फ़रिश्ते या शैतान की तरफ़ से। यह ख़ुद अल्लाह का कलाम है, जो उसने अपने नबी ﷺ पर उतारा।

अल्लाह यहाँ अपने दो सिफ़ात (गुण) बयान करता है:

पहला: अल-अज़ीज़ — यानी वह ज़बरदस्त क़ुदरत वाला है, जिसके आगे कोई ताक़त नहीं चल सकती। वह हर चीज़ पर ग़ालिब है, और उसके हुक्म को कोई टाल नहीं सकता। जब यह क़िताब ऐसे ज़बरदस्त और ग़ालिब अल्लाह की तरफ़ से आई है, तो उसमें कोई कमी, कोई ग़लती या कोई विरोधाभास नहीं हो सकता।

दूसरा: अल-हकीम — यानी वह हर काम में हिकमत रखता है। उसका हर हुक्म, हर फ़रमान, हर तदबीर अत्यंत समझदारी और प्रबंधन पर आधारित है। यह क़ुरआन जो कुछ भी सिखाता है — चाहे अक़ीदा हो, इबादत हो, अख़लाक़ हो या मुआमलात (व्यवहार) — सब कुछ हिकमत से भरा हुआ है।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि क़ुरआन कोई साधारण किताब नहीं, बल्कि अल्लाह का वह ख़िताब है जो हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई के लिए उतारा गया है। जिस इंसान ने इस किताब को पकड़ लिया, उसने अल्लाह की रस्सी को पकड़ लिया। यह किताब हर उस शख्स के लिए रहनुमा है जो सच्चाई की तलाश में है, और हर उस इंसान के लिए रोशनी है जो अंधेरों से निकलना चाहता है।

प्यारे भाइयो और बहनो! यह आयत हमें बताती है कि क़ुरआन से जुड़ाव ही हमारी कामयाबी की कुंजी है। जो शख्स इस किताब को पढ़ता है, समझता है और उस पर अमल करता है, अल्लाह उसे दुनिया में इज़्ज़त देता है और आख़िरत में जन्नत अता करता है। आइए, हम इस किताब को सिर्फ़ पढ़ने तक ही सीमित न रखें, बल्कि इस पर ग़ौर करें, इसे समझें और अपनी ज़िंदगी को इसके अनुसार ढालें। यही वह रास्ता है जो हमें अल्लाह की मुहब्बत और उसकी रज़ा तक पहुँचाता है।



📜 आयत 1-3 — सूरा अज़-ज़ुमर

1تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
(इस) किताब (क़ुरान) का नाज़िल करना उस खुदा की बारगाह से है जो (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है
2إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
(ऐ रसूल) हमने किताब (कुरान) को बिल्कुल ठीक नाज़िल किया है तो तुम इबादत को उसी के लिए निरा खुरा करके खुदा की बन्दगी किया करो
3أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ ۚ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ
आगाह रहो कि इबादत तो ख़ास खुदा ही के लिए है और जिन लोगों ने खुदा के सिवा (औरों को अपना) सरपरस्त बना रखा है और कहते हैं कि हम तो उनकी परसतिश सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि ये लोग खुदा की बारगाह में हमारा तक़र्रब बढ़ा देगें इसमें शक नहीं कि जिस बात में ये लोग झगड़ते हैं (क़यामत के दिन) खुदा उनके दरमियान इसमें फैसला कर देगा बेशक खुदा झूठे नाशुक्रे को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीअवतरण स्थान
1आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 1

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Thursday, October 1, 2026

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