अज़-ज़ुमर · 2/75
अनुवाद उच्चारण — सूरा अज़-ज़ुमर
إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ ۝٢
Innaaa anzalnaaa ilaikal Kitaaba bilhaqqi fa`budil laaha mukhlisal lahud deen
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) हमने किताब (कुरान) को बिल्कुल ठीक नाज़िल किया है तो तुम इबादत को उसी के लिए निरा खुरा करके खुदा की बन्दगी किया करो

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْكِتَابَ (अल-किताब): कुरआन।
  • بِالْحَقِّ (बिल-हक़): सत्य के साथ, अर्थात जो सत्य और न्याय पर आधारित हो।
  • مُخْلِصًا (मुख़्लिसन): ख़ालिस करते हुए, केवल अल्लाह के लिए।
  • الدِّينَ (अद-दीन): इबादत, आज्ञाकारिता और भक्ति।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! हमने आपकी ओर यह किताब (कुरआन) सत्य के साथ उतारी है। इसका हर ख़बर सच्ची है और इसके हर हुक्म में न्याय और इंसाफ़ है। यह किताब अंधेरों से निकालकर रोशनी की ओर ले जाने वाली है, और यही वह रास्ता है जो इंसान को उसके रब तक पहुँचाता है।

इसलिए ऐ नबी! आप अल्लाह की इबादत करें, और उसकी इबादत को पूरी तरह से उसी के लिए ख़ालिस कर दें। अपनी नमाज़, अपनी दुआ, अपनी क़ुर्बानी, अपना जीवन और अपनी मौत — सब कुछ केवल अल्लाह के लिए हो। उसमें किसी को शरीक न करें, न किसी बुत को, न किसी इंसान को, न किसी ताक़त को। दीन को ख़ालिस करने का मतलब यह है कि इबादत सिर्फ़ अल्लाह की हो, और उसकी इबादत में किसी तरह का कोई शिर्क (साझेदारी) न हो।

यह आयत हमें सिखाती है कि इबादत की रूह (आत्मा) इख़लास (निष्ठा) है। जिस तरह शरीर के बिना रूह ज़िंदा नहीं रह सकती, उसी तरह इख़लास के बिना इबादत क़ुबूल नहीं होती। अल्लाह तआला उसी अमल को क़ुबूल करता है जो सिर्फ उसकी रज़ा (खुशी) के लिए किया जाए।

ऐ इंसान! तू अपने दिल में देख — तेरी इबादत किसके लिए है? क्या तू सिर्फ अल्लाह के लिए करता है, या लोगों की तारीफ़ के लिए? क्या तू अल्लाह से डरता है, या किसी और से? याद रख, अल्लाह उसी दिल को क़ुबूल करता है जो उसके लिए ख़ालिस हो। जब तू अपनी इबादत को ख़ालिस कर लेगा, तो अल्लाह तेरे कामों में बरकत देगा, तेरे दिल को सुकून देगा, और तुझे वह मंज़िल देगा जो उसके नेक बंदों को मिलती है — यानी जन्नत और उसकी रज़ा।

यह आयत हर मुसलमान के लिए एक नुस्ख़ा है: अपने अमल को सिर्फ अल्लाह के लिए करो, और देखो कि अल्लाह कैसे तुम्हारे हालात बदल देता है। जो लोग अपने दीन को ख़ालिस कर लेते हैं, अल्लाह उन्हें दुनिया में इज़्ज़त देता है और आख़िरत में जन्नत। यही सबसे बड़ी कामयाबी है।



📜 आयत 1-4 — सूरा अज़-ज़ुमर

1تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
(इस) किताब (क़ुरान) का नाज़िल करना उस खुदा की बारगाह से है जो (सब पर) ग़ालिब हिकमत वाला है
2إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
(ऐ रसूल) हमने किताब (कुरान) को बिल्कुल ठीक नाज़िल किया है तो तुम इबादत को उसी के लिए निरा खुरा करके खुदा की बन्दगी किया करो
3أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ ۚ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ
आगाह रहो कि इबादत तो ख़ास खुदा ही के लिए है और जिन लोगों ने खुदा के सिवा (औरों को अपना) सरपरस्त बना रखा है और कहते हैं कि हम तो उनकी परसतिश सिर्फ़ इसलिए करते हैं कि ये लोग खुदा की बारगाह में हमारा तक़र्रब बढ़ा देगें इसमें शक नहीं कि जिस बात में ये लोग झगड़ते हैं (क़यामत के दिन) खुदा उनके दरमियान इसमें फैसला कर देगा बेशक खुदा झूठे नाशुक्रे को मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुँचाया करता
4لَّوْ أَرَادَ اللَّهُ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا لَّاصْطَفَىٰ مِمَّا يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ سُبْحَانَهُ ۖ هُوَ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
अगर खुदा किसी को (अपना) बेटा बनाना चाहता तो अपने मख़लूक़ात में से जिसे चाहता मुन्तखिब कर लेता (मगर) वह तो उससे पाक व पाकीज़ा है वह तो यकता बड़ा ज़बरदस्त अल्लाह है
अज़-ज़ुमरकुरान सूची
75आयत
मक्कीअवतरण स्थान
2आयत

अनुवाद — अज़-ज़ुमर 2

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Monday, September 28, 2026

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