Wa maa lakum laa tuqaatiloona fee sabeelil laahi walmustad`afeena minar rijaali wannisaaa`i walwildaanil lazeena yaqooloona Rabbanaaa akhrijnaa min haazihil qaryatiz zaalimi ahluhaa waj`al lanaa mil ladunka waliyanw waj`al lanaa mil ladunka naseeraa
📖 अनुवाद (हिंदी अर्थ)
📖 हिंदी अर्थ
(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना
🌐 Additional reference in اردو
🌐 اردو
اور تم کو کیا ہوا ہے کہ خدا کی راہ میں اور اُن بےبس مردوں اور عورتوں اور بچوں کی خاطر نہیں لڑتے جو دعائیں کیا کرتے ہیں کہ اے پروردگار ہم کو اس شہر سے جس کے رہنے والے ظالم ہیں نکال کر کہیں اور لے جا۔ اور اپنی طرف سے کسی کو ہمارا حامی بنا۔ اور اپنی ہی طرف سے کسی کو ہمارا مددگار مقرر فرما
(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना
📜
अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
وَالْمُسْتَضْعَفِينَ: उन कमज़ोर और असहाय लोगों के लिए जिन पर अत्याचार किया गया हो।
الْوِلْدَانِ: बच्चे (जो अभी बालिग़ नहीं हुए)।
الْقَرْيَةِ الظَّالِمِ أَهْلُهَا: उस बस्ती (मक्का) के निवासी जिन्होंने अल्लाह के साथ कुफ़्र किया और मुसलमानों पर ज़ुल्म किया।
وَلِيًّا: संरक्षक और कार्य-संचालक।
نَصِيرًا: सहायक और मददगार।
तफ़सीर (व्याख्या):
अल्लाह तआला इस आयत में ईमानवालों से पूछ रहा है कि आख़िर तुम्हें क्या हो गया है कि तुम अल्लाह के रास्ते में जिहाद नहीं करते? यह एक तोबीख़ (फटकार) है जो जिहाद छोड़ने पर की गई है। अल्लाह के रास्ते में लड़ने का मतलब है उसके दीन की मदद करना, उसका कलिमा बुलंद करना, और उन कमज़ोर मुसलमानों को आज़ाद कराना जो मक्का में फँसे हुए थे। ये कमज़ोर लोग तीन श्रेणियों में थे — पुरुष, स्त्रियाँ और बच्चे — जिन पर मक्का के काफ़िरों ने ज़ुल्म किया, उन्हें हिजरत करने से रोका और उन्हें तकलीफ़ें दीं। इन मज़लूमों की हालत यह थी कि वे दुआ करते थे: "ऐ हमारे रब! हमें इस बस्ती (मक्का) से निकाल ले, जिसके रहने वाले ज़ालिम हैं, और हमें अपनी तरफ़ से कोई वली (संरक्षक) दे दे जो हमारे मामलों को संभाले, और हमें अपनी तरफ़ से कोई नसीर (सहायक) दे दे जो हमारी मदद करे।" अल्लाह ने इनकी दुआ क़ुबूल की और जब मक्का फ़तह हुआ तो नबी ﷺ ने अत्ताब बिन असीद को वहाँ का हाकिम बनाया, जो कमज़ोरों के हक़ दिलाते थे और ज़ालिमों से इंसाफ़ करते थे। यह आयत मुसलमानों को जिहाद पर उभारती है और बताती है कि जिहाद सिर्फ़ अपने बचाव के लिए नहीं, बल्कि मज़लूमों की मदद के लिए भी है।
फ़ायदे (उपदेश):
इस आयत से पता चलता है कि जिहाद का एक बड़ा मक़सद कमज़ोर और मज़लूम लोगों की मदद करना है, चाहे वे पुरुष हों, स्त्रियाँ हों या बच्चे। इस्लाम कमज़ोरों के हक़ की रक्षा का दीन है।
मुसलमानों को चाहिए कि वे दुनिया के किसी भी कोने में मुसलमानों पर ज़ुल्म होते देखें तो उनकी मदद के लिए आगे आएँ, क्योंकि यही ईमान का तक़ाज़ा है।
जब इंसान अपनी कमज़ोरी और लाचारी के साथ अल्लाह से दुआ करता है, तो अल्लाह उसकी दुआ ज़रूर सुनता है और उसके लिए रास्ता निकालता है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह अल्लाह पर भरोसा रखे और उसी से मदद माँगे।
यह आयत हमें सिखाती है कि ज़ालिम हुकूमतों और ज़ालिम लोगों के सामने ख़ामोश नहीं रहना चाहिए, बल्कि हक़ की आवाज़ उठानी चाहिए और मज़लूमों का साथ देना चाहिए।
और अगर तुमपर ख़ुदा ने फ़ज़ल किया (और दुश्मन पर ग़ालिब आए) तो इस तरह अजनबी बनके कि गोया तुममें उसमें कभी मोहब्बत ही न थी यूं कहने लगा कि ऐ काश उनके साथ होता तो मैं भी बड़ी कामयाबी हासिल करता
पस जो लोग दुनिया की ज़िन्दगी (जान तक) आख़ेरत के वास्ते दे डालने को मौजूद हैं उनको ख़ुदा की राह में जेहाद करना चाहिए और जिसने ख़ुदा की राह में जेहाद किया फिर शहीद हुआ तो गोया ग़ालिब आया तो (बहरहाल) हम तो अनक़रीब ही उसको बड़ा अज्र अता फ़रमायेंगे
(और मुसलमानों) तुमको क्या हो गया है कि ख़ुदा की राह में उन कमज़ोर और बेबस मर्दो और औरतों और बच्चों (को कुफ्फ़ार के पंजे से छुड़ाने) के वास्ते जेहाद नहीं करते जो (हालते मजबूरी में) ख़ुदा से दुआएं मॉग रहे हैं कि ऐ हमारे पालने वाले किसी तरह इस बस्ती (मक्का) से जिसके बाशिन्दे बड़े ज़ालिम हैं हमें निकाल और अपनी तरफ़ से किसी को हमारा सरपरस्त बना और तू ख़ुद ही किसी को अपनी तरफ़ से हमारा मददगार बना
(पस देखो) ईमानवाले तो ख़ुदा की राह में लड़ते हैं और कुफ्फ़ार शैतान की राह में लड़ते मरते हैं पस (मुसलमानों) तुम शैतान के हवा ख़ाहों से लड़ो और (कुछ परवाह न करो) क्योंकि शैतान का दाओ तो बहुत ही बोदा है
(ऐ रसूल) क्या तुमने उन लोगों (के हाल) पर नज़र नहीं की जिनको (जेहाद की आरज़ू थी) और उनको हुक्म दिया गया था कि (अभी) अपने हाथ रोके रहो और पाबन्दी से नमाज़ पढ़ो और ज़कात दिए जाओ मगर जब जिहाद (उनपर वाजिब किया गया तो) उनमें से कुछ लोग (बोदेपन में) लोगों से इस तरह डरने लगे जैसे कोई ख़ुदा से डरे बल्कि उससे कहीं ज्यादा और (घबराकर) कहने लगे ख़ुदाया तूने हमपर जेहाद क्यों वाजिब कर दिया हमको कुछ दिनों की और मोहलत क्यों न दी (ऐ रसूल) उनसे कह दो कि दुनिया की आसाइश बहुत थोड़ा सा है और जो (ख़ुदा से) डरता है उसकी आख़ेरत उससे कहीं बेहतर है
सूराकुरान वेबसाइट की स्थापना पवित्र किताब और पाक सुन्नत की सेवा, अल्लाह की ओर बुलावा, और कुरान व सुन्नत के मार्ग पर धार्मिक विज्ञान को सुगम बनाने के एक विनम्र प्रयास के रूप में की गई थी। हम अल्लाह की प्रशंसा और उसके अनुग्रह के लिए धन्यवाद करते हैं, और उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हमारे कार्यों को स्वीकार करे और उन्हें केवल उसके महान चेहरे के लिए विशुद्ध बनाए।