अन-निसा · 82/176
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-निसा
أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ اللَّهِ لَوَجَدُوا فِيهِ اخْتِلَافًا كَثِيرًا ۝٨٢
Afalaa yatadabbaroonal Qur`aan; wa law kaana min `indi ghairil laahi la wajadoo fee hikh tilaafan kaseeraa
📖 हिंदी अर्थ
तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • يَتَدَبَّرُونَ – गहराई से सोचना, चिंतन करना, विचार-विमर्श करना।
  • اخْتِلَافًا – विरोधाभास, अंतर्विरोध, आपसी टकराव।
  • كَثِيرًا – बहुत अधिक, अनेक।

व्याख्या:

क्या ये लोग क़ुरआन पर गहराई से चिंतन और विचार नहीं करते? यदि वे ऐसा करते, तो उन्हें यह स्पष्ट हो जाता कि यह किताब अपनी एकरूपता, सुसंगतता और अद्भुत सामंजस्य के कारण किसी मानवीय रचना से कहीं बढ़कर है। इसकी आयतें, इसके आदेश, इसकी शिक्षाएँ और इसके वादे-धमकी सभी में पूर्ण सामंजस्य है। कोई भी बात एक-दूसरे का खंडन नहीं करती, न ही इसमें कोई आपसी टकराव पाया जाता है।

यदि यह क़ुरआन अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की ओर से होता — चाहे वह कोई विद्वान हो, कवि हो, या कोई सामान्य व्यक्ति — तो उसमें अवश्य ही अनेक विरोधाभास और अंतर्विरोध पाए जाते। क्योंकि मानवीय ज्ञान सीमित है, विचार बदलते हैं, और परिस्थितियों के अनुसार बातें बदल जाती हैं। लेकिन यह क़ुरआन चौदह शताब्दियों से अपनी हर आयत, हर शब्द और हर आदेश में एक जैसा सुसंगत और अटल है। इसकी शिक्षाएँ कभी पुरानी नहीं होतीं, और इसके नियम कभी टकराते नहीं। यही इस बात का प्रमाण है कि यह अल्लाह की ओर से है।

लाभ एवं शिक्षाएँ:

  1. क़ुरआन पर चिंतन और विचार करना हर मुसलमान का कर्तव्य है, क्योंकि यही ईमान को मजबूत करता है और सच्चाई को उजागर करता है।
  2. क़ुरआन की एकरूपता और अंतर्विरोधों से मुक्त होना इसकी दिव्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है — यह एक ऐसा चमत्कार है जो हर युग में स्पष्ट है।
  3. यह आयत उन लोगों को भी सोचने की دعوت देती है जो क़ुरआन पर संदेह करते हैं — वे खुले दिल से इसका अध्ययन करें, तो उन्हें सत्य स्वयं प्रकट हो जाएगा।
  4. क़ुरआन का अध्ययन केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि समझने और उस पर अमल करने के लिए है। यही वह मार्ग है जो इंसान को दुनिया और आख़िरत की सफलता तक पहुँचाता है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य की पहचान के लिए तर्क और विचार का उपयोग करना चाहिए — और क़ुरआन ही वह सत्य है जो हर युग में अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करता है।


📜 आयत 80-84 — सूरा अन-निसा

80مَّن يُطِعِ الرَّسُولَ فَقَدْ أَطَاعَ اللَّهَ ۖ وَمَن تَوَلَّىٰ فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا
जिसने रसूल की इताअत की तो उसने ख़ुदा की इताअत की और जिसने रूगरदानी की तो तुम कुछ ख्याल न करो (क्योंकि) हमने तुम को पासबान (मुक़र्रर) करके तो भेजा नहीं है
81وَيَقُولُونَ طَاعَةٌ فَإِذَا بَرَزُوا مِنْ عِندِكَ بَيَّتَ طَائِفَةٌ مِّنْهُمْ غَيْرَ الَّذِي تَقُولُ ۖ وَاللَّهُ يَكْتُبُ مَا يُبَيِّتُونَ ۖ فَأَعْرِضْ عَنْهُمْ وَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ وَكِيلًا
(ये लोग तुम्हारे सामने) तो कह देते हैं कि हम (आपके) फ़रमाबरदार हैं लेकिन जब तुम्हारे पास से बाहर निकले तो उनमें से कुछ लोग जो कुछ तुमसे कह चुके थे उसके ख़िलाफ़ रातों को मशवरा करते हैं हालॉकि (ये नहीं समझते) ये लोग रातों को जो कुछ भी मशवरा करते हैं उसे ख़ुदा लिखता जाता है पास तुम उन लोगों की कुछ परवाह न करो और ख़ुदा पर भरोसा रखो और ख़ुदा कारसाज़ी के लिए काफ़ी है
82أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ ۚ وَلَوْ كَانَ مِنْ عِندِ غَيْرِ اللَّهِ لَوَجَدُوا فِيهِ اخْتِلَافًا كَثِيرًا
तो क्या ये लोग क़ुरान में भी ग़ौर नहीं करते और (ये नहीं ख्याल करते कि) अगर ख़ुदा के सिवा किसी और की तरफ़ से (आया) होता तो ज़रूर उसमें बड़ा इख्तेलाफ़ पाते
83وَإِذَا جَاءَهُمْ أَمْرٌ مِّنَ الْأَمْنِ أَوِ الْخَوْفِ أَذَاعُوا بِهِ ۖ وَلَوْ رَدُّوهُ إِلَى الرَّسُولِ وَإِلَىٰ أُولِي الْأَمْرِ مِنْهُمْ لَعَلِمَهُ الَّذِينَ يَسْتَنبِطُونَهُ مِنْهُمْ ۗ وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ لَاتَّبَعْتُمُ الشَّيْطَانَ إِلَّا قَلِيلًا
और जब उनके (मुसलमानों के) पास अमन या ख़ौफ़ की ख़बर आयी तो उसे फ़ौरन मशहूर कर देते हैं हालॉकि अगर वह उसकी ख़बर को रसूल (या) और ईमानदारो में से जो साहबाने हुकूमत तक पहुंचाते तो बेशक जो लोग उनमें से उसकी तहक़ीक़ करने वाले हैं (पैग़म्बर या वली) उसको समझ लेते कि (मशहूर करने की ज़रूरत है या नहीं) और (मुसलमानों) अगर तुमपर ख़ुदा का फ़ज़ल (व करम) और उसकी मेहरबानी न होती तो चन्द आदमियों के सिवा तुम सबके सब शैतान की पैरवी करने लगते
84فَقَاتِلْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ لَا تُكَلَّفُ إِلَّا نَفْسَكَ ۚ وَحَرِّضِ الْمُؤْمِنِينَ ۖ عَسَى اللَّهُ أَن يَكُفَّ بَأْسَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ وَاللَّهُ أَشَدُّ بَأْسًا وَأَشَدُّ تَنكِيلًا
पस (ऐ रसूल) तुम ख़ुदा की राह में जिहाद करो और तुम अपनी ज़ात के सिवा किसी और के ज़िम्मेदार नहीं हो और ईमानदारों को (जेहाद की) तरग़ीब दो और अनक़रीब ख़ुदा काफ़िरों की हैबत रोक देगा और ख़ुदा की हैबत सबसे ज्यादा है और उसकी सज़ा बहुत सख्त है
अन-निसाकुरान सूची
176आयत
मदनीअवतरण स्थान
82आयत

अनुवाद — अन-निसा 82

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Wednesday, September 30, 2026

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