अज़-ज़ुखरुफ · 23/89
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ुखरुफ
وَكَذَٰلِكَ مَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَىٰ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰ آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ ۝٢٣
Wa kazaalika maaa arsalnaa min qablika fee qaryatim min nazeerin illaa qaala mutrafoohaaa innaa wajadnaaa aabaaa`anaa `alaaa ummatinw wa innaa `alaaa aasaarihim muqtadoon
📖 हिंदी अर्थ
और (ऐ रसूल) इसी तरह हमने तुमसे पहले किसी बस्ती में कोई डराने वाला (पैग़म्बर) नहीं भेजा मगर वहाँ के ख़ुशहाल लोगों ने यही कहा कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके पर पाया, और हम यक़ीनी उनके क़दम ब क़दम चले जा रहे हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُتْرَفُوهَا (मुतरफ़ूहा): उस बस्ती के अमीर, सुख-समृद्धि में डूबे हुए सरदार और बड़े लोग।
  • أُمَّةٍ (उम्मतिन): यहाँ इसका अर्थ है धर्म, मार्ग और तरीका।
  • آثَارِهِم (आसारिहिम): उनके नक्शे-क़दम, उनकी राह और उनका तरीका।
  • مُقْتَدُونَ (मुक़्तदून): पैरवी करने वाले, अनुसरण करने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! जिस तरह आपकी क़ौम के सरदार और अमीर लोग आपकी नबूवत को झुठला रहे हैं और अपने बुज़ुर्गों की राह पर चलने की दुहाई दे रहे हैं, बिल्कुल यही हाल इससे पहले गुज़री हुई उम्मतों का भी था। हमने आपसे पहले जब कभी किसी बस्ती में कोई डराने वाला पैग़म्बर भेजा, तो उस बस्ती के सुख-चैन वाले, अमीर और बड़े लोग ही सबसे पहले उसका विरोध करते हुए यही कहते थे: "हमने अपने बाप-दादाओं को एक धर्म और तरीके पर पाया है, और हम तो उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलने वाले हैं।"

यानी यह कोई नई बात नहीं है कि आपकी क़ौम के लोग आपको झुठला रहे हैं। यह तो पुरानी आदत है जो हर ज़माने के अमीरों और ठाठ-बाठ वालों की रही है। वे हक़ की आवाज़ को दबाने के लिए हमेशा अपने पुरखों के धर्म की आड़ लेते रहे हैं। उनका यह तर्क न तो अक़्ल पर आधारित था और न ही किसी सच्चाई पर, बल्कि महज़ अंधी पैरवी और रस्म-रिवाज़ की दास्तान थी।

दावत और नसीहत का पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बड़ी सीख देती है कि हम अपने दीन और ईमान को सिर्फ़ इसलिए नहीं छोड़ सकते कि हमारे बुज़ुर्ग किसी और राह पर थे। हक़ की पहचान अक़्ल, दलील और क़ुरआन-ओ-सुन्नत से होती है, न कि अंधी परंपरा से। अल्लाह तआला ने हमें अक़्ल दी है ताकि हम सोचें-समझें और सच्चाई को कुबूल करें। जो लोग अपने बुज़ुर्गों की राह पर इसलिए चलते रहे कि बुज़ुर्ग उसी पर थे, उन्होंने कभी हक़ को नहीं पहचाना। आज भी बहुत से लोग इसी ग़लतफ़हमी में हैं कि हमारे बाप-दादा जिस तरीके पर थे, वही सही है। लेकिन क़यामत के दिन अल्लाह से मुलाक़ात के वक़्त यह बहाना काम नहीं आएगा। हमें चाहिए कि हम ख़ुद क़ुरआन और सही हदीस से रोशनी हासिल करें, अपने दीन को समझें और उस पर अमल करें। यही वह रास्ता है जो हमें दुनिया और आख़िरत की कामयाबी तक पहुँचाएगा। अल्लाह हम सबको हक़ समझने और उस पर साबित क़दम रहने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।



📜 आयत 21-25 — अज़-ज़ुखरुफ

21أَمْ آتَيْنَاهُمْ كِتَابًا مِّن قَبْلِهِ فَهُم بِهِ مُسْتَمْسِكُونَ
या हमने उनको उससे पहले कोई किताब दी थी कि ये लोग उसे मज़बूत थामें हुए हैं
22بَلْ قَالُوا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَىٰ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰ آثَارِهِم مُّهْتَدُونَ
बल्कि ये लोग तो ये कहते हैं कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके पर पाया और हम उनको क़दम ब क़दम ठीक रास्ते पर चले जा रहें हैं
23وَكَذَٰلِكَ مَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَىٰ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰ آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ
और (ऐ रसूल) इसी तरह हमने तुमसे पहले किसी बस्ती में कोई डराने वाला (पैग़म्बर) नहीं भेजा मगर वहाँ के ख़ुशहाल लोगों ने यही कहा कि हमने अपने बाप दादाओं को एक तरीके पर पाया, और हम यक़ीनी उनके क़दम ब क़दम चले जा रहे हैं
24۞ قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكُم بِأَهْدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمْ عَلَيْهِ آبَاءَكُمْ ۖ قَالُوا إِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
(इस पर) उनके पैग़म्बर ने कहा भी जिस तरीक़े पर तुमने अपने बाप दादाओं को पाया अगरचे मैं तुम्हारे पास इससे बेहतर राहे रास्त पर लाने वाला दीन लेकर आया हूँ (तो भी न मानोगे) वह बोले (कुछ हो मगर) हम तो उस दीन को जो तुम देकर भेजे गए हो मानने वाले नहीं
25فَانتَقَمْنَا مِنْهُمْ ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ
तो हमने उनसे बदला लिया (तो ज़रा) देखो तो कि झुठलाने वालों का क्या अन्जाम हुआ
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अनुवाद — अज़-ज़ुखरुफ 23

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Tuesday, August 18, 2026

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