अज़-ज़ारियात · 56/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ ۝٥٦
Wa maa khalaqtul jinna wal insa illaa liya`budoon
📖 हिंदी अर्थ
और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مَا خَلَقْتُ – मैंने पैदा नहीं किया
  • الْجِنَّ – जिन्नात (जिन)
  • الْإِنسَ – इंसान (मनुष्य)
  • إِلَّا لِيَعْبُدُونِ – सिवाय इसके कि वे मेरी इबादत करें

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में अपनी सृष्टि का उद्देश्य बयान किया है। वह फ़रमाता है: "और मैंने जिन्न और इंसान को पैदा नहीं किया, सिवाय इसके कि वे मेरी इबादत करें।"

यह आयत पूरी कायनात के अंदर इंसान और जिन की पैदाइश का असली मक़सद बयान करती है। अल्लाह ने हमें इस दुनिया में महज़ मौज-मस्ती के लिए, या सिर्फ़ खाने-पीने और सोने के लिए पैदा नहीं किया। हमारी पैदाइश का एक उच्च और पवित्र उद्देश्य है — और वह है अल्लाह की इबादत, उसकी बंदगी और उसके प्रति समर्पण।

इस आयत में "इबादत" का मतलब सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात ही नहीं है, बल्कि पूरी ज़िंदगी को अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ ढालना है। यानी हर काम में अल्लाह की रज़ा का ख़्याल रखना, उसके दिए हुए हुक्मों को मानना और उसकी मनाही से बचना — यही असली इबादत है।

ग़ौरतलब है कि अल्लाह ने यह नहीं कहा कि "मैंने उन्हें पैदा किया ताकि वे मुझसे फ़ायदा उठाएँ" या "ताकि वे मेरी ज़रूरत पूरी करें"। अल्लाह किसी भी चीज़ का मोहताज नहीं है। वह तो चाहता है कि उसके बंदे उसकी इबादत करके ख़ुद ही फ़ायदा उठाएँ, अपने दर्जे बुलंद करें और अपनी आख़िरत संवारें। इबादत अल्लाह की ज़रूरत नहीं, बल्कि हमारी अपनी ज़रूरत है।

यह भी समझना ज़रूरी है कि यहाँ "इबादत" का हुक्म शरीअत की रू से है, न कि क़िस्मत के फ़ैसले की रू से। यानी अल्लाह ने हमें आज़ादी दी है कि हम चाहें तो उसकी इबादत करें और चाहें तो न करें। लेकिन उसने हमें साफ़ बता दिया है कि हमारी पैदाइश का असली मक़सद इबादत है, और इसी मक़सद को पूरा करने में ही हमारी कामयाबी है।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बड़ी सीख देती है। जब हम जान लेते हैं कि हमारी ज़िंदगी का मक़सद अल्लाह की इबादत है, तो हमारी पूरी ज़िंदगी बदल जाती है। हम हर काम को इबादत बना सकते हैं — नेक कमाई करना, माँ-बाप की ख़िदमत करना, बच्चों की परवरिश करना, लोगों की मदद करना — बशर्ते नीयत सही हो और काम अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ हो।

अल्लाह तआला हम सबको अपनी इबादत की तौफ़ीक़ दे, और हमारी ज़िंदगी को अपनी रज़ा के मुताबिक़ बनाने की हिम्मत अता फ़रमाए। आमीन।



📜 आयत 54-58 — अज़-ज़ारियात

54فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَا أَنتَ بِمَلُومٍ
तो (ऐ रसूल) तुम इनसे मुँह फेर लो तुम पर तो कुछ इल्ज़ाम नहीं है
55وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَىٰ تَنفَعُ الْمُؤْمِنِينَ
और नसीहत किए जाओ क्योंकि नसीहत मोमिनीन को फायदा देती है
56وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें
57مَا أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ
न तो मैं उनसे रोज़ी का तालिब हूँ और न ये चाहता हूँ कि मुझे खाना खिलाएँ
58إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ
ख़ुदा ख़ुद बड़ा रोज़ी देने वाला ज़ोरावर (और) ज़बरदस्त है
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अनुवाद — अज़-ज़ारियात 56

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Tuesday, August 18, 2026

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