अज़-ज़ारियात · 57/60
अनुवाद उच्चारण — अज़-ज़ारियात
مَا أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ ۝٥٧
Maaa ureedu minhum mir rizqinw wa maaa ureedu anyyut`imoon
📖 हिंदी अर्थ
न तो मैं उनसे रोज़ी का तालिब हूँ और न ये चाहता हूँ कि मुझे खाना खिलाएँ

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मा उरीदु – मैं नहीं चाहता
  • मिन रिज़्क़िन – कोई रोज़ी या आजीविका
  • युत्इमून – वे मुझे खाना खिलाएँ

तफ़सीर:

अल्लाह तआला फ़रमाता है कि मैंने जिन्न और इंसानों को पैदा किया है, उनसे मुझे कोई रोज़ी या आजीविका नहीं चाहिए, और न ही मैं यह चाहता हूँ कि वे मुझे खाना खिलाएँ। यानी अल्लाह तआला किसी भी प्रकार से अपने बंदों का मुहताज नहीं है। वह स्वयं सब कुछ देने वाला है, सबका रिज़्क़ देने वाला है। वह न तो किसी की किसी चीज़ का मोहताज है और न ही उसे किसी की इबादत या आज्ञाकारिता से कोई लाभ पहुँचता है। बल्कि वह तो अपने बंदों पर अपनी रहमत और करम से रिज़्क़ बरसाता है, उनकी परवरिश करता है, और उन्हें जीवन की सभी आवश्यकताएँ प्रदान करता है।

अल्लाह तआला ने यह बात इसलिए बयान की ताकि बंदे यह समझें कि उनकी इबादत का फ़ायदा अल्लाह को नहीं बल्कि खुद उन्हीं को पहुँचता है। जब बंदा अल्लाह की इबादत करता है, उसके आगे सिर झुकाता है, तो यह उसके अपने लिए ही बेहतरी है। अल्लाह तआला किसी भी चीज़ से बेनियाज़ है, वह अपनी ज़ात में पूर्ण है। यही वजह है कि वह अपने बंदों से केवल यह चाहता है कि वे उसकी इबादत करें, उसका शुक्र अदा करें और उसके आगे अपनी आज्ञाकारिता प्रस्तुत करें — और यह सब उन्हीं के भले के लिए है।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमारे अंदर अल्लाह के प्रति प्रेम और समर्पण का जज़्बा होना चाहिए। हमें यह समझना चाहिए कि हमारी इबादत, हमारी दुआएँ, हमारा रोज़ा, हमारी नमाज़ — यह सब हमारे अपने लिए ही नफ़ा है। अल्लाह तआला तो पहले से ही बेनियाज़ है। जब हम यह समझ लेंगे कि अल्लाह हमसे किसी चीज़ का मोहताज नहीं, बल्कि हम उसके मोहताज हैं, तो हमारी इबादत में इख़लास (शुद्धता) आएगी, हमारा दिल अल्लाह की तरफ़ झुकेगा और हम अपनी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के मुताबिक़ ढालने की कोशिश करेंगे। यही हमारी कामयाबी है — कि हम उस मालिक की इबादत करें जो सब कुछ देने वाला है, और हमें किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।



📜 आयत 55-59 — अज़-ज़ारियात

55وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَىٰ تَنفَعُ الْمُؤْمِنِينَ
और नसीहत किए जाओ क्योंकि नसीहत मोमिनीन को फायदा देती है
56وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
और मैने जिनों और आदमियों को इसी ग़रज़ से पैदा किया कि वह मेरी इबादत करें
57مَا أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ
न तो मैं उनसे रोज़ी का तालिब हूँ और न ये चाहता हूँ कि मुझे खाना खिलाएँ
58إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ
ख़ुदा ख़ुद बड़ा रोज़ी देने वाला ज़ोरावर (और) ज़बरदस्त है
59فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذَنُوبًا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَابِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ
तो (इन) ज़ालिमों के वास्ते भी अज़ाब का कुछ हिस्सा है जिस तरह उनके साथियों के लिए हिस्सा था तो इनको हम से जल्दी न करनी चाहिए
अज़-ज़ारियातकुरान सूची
60आयत
मक्कीRevelation
57आयत

अनुवाद — अज़-ज़ारियात 57

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Tuesday, August 18, 2026

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