अल-अनआम · 33/165
अनुवाद उच्चारण — अल-अनआम
قَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذِي يَقُولُونَ ۖ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَٰكِنَّ الظَّالِمِينَ بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ ۝٣٣
Qad na`lamu innahoo layahzunukal lazee yaqooloona fa innahum laa yukazziboonaka wa laakinnaz zaalimeena bi Aayaatil laahi yajhadoon
📖 हिंदी अर्थ
हम खूब जानते हैं कि उन लोगों की बकबक तुम को सदमा पहुँचाती है तो (तुम को समझना चाहिए कि) ये लोग तुम को नहीं झुठलाते बल्कि (ये) ज़ालिम (हक़ीक़तन) ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • لَيَحْزُنُكَ — यह तुम्हें दुखी करता है।
  • لَا يُكَذِّبُونَكَ — वे तुम्हें झुठलाते नहीं हैं (अर्थात तुम्हारे सच्चे होने को वे जानते हैं)।
  • يَجْحَدُونَ — वे इनकार करते हैं, मानने से मुकर जाते हैं।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला अपने नबी ﷺ को दिलासा देते हुए फ़रमाता है: हम भली-भाँति जानते हैं कि जो बातें ये लोग कहते हैं—आपको झुठलाना, आप पर आरोप लगाना, और आपके लाए हुए संदेश का मज़ाक उड़ाना—यह सब आपके दिल को दुखी करता है। लेकिन आप जान लें कि ये लोग वास्तव में आपको झुठलाते नहीं हैं। उनके दिलों में यह बात जमी हुई है कि आप सच्चे हैं, आप अमानतदार हैं, और आपने कभी झूठ नहीं बोला। वे आपके सच्चे होने को भली-भाँति पहचानते हैं।

फिर भी वे आपकी नबुव्वत का इनकार करते हैं। यह इनकार इसलिए नहीं है कि उन्हें आप पर यक़ीन नहीं, बल्कि इसलिए है कि वे ज़ालिम हैं। उनका ज़ुल्म उन्हें अंधा कर चुका है। वे अल्लाह की उन आयतों (निशानियों और प्रमाणों) को जानबूझकर नकारते हैं जो आपकी सच्चाई पर गवाह हैं। उनका यह जुर्माना और हठधर्मिता ही उन्हें सत्य स्वीकार करने से रोकती है, वरना उन्हें आपकी सच्चाई पर कोई संदेह नहीं।


फ़ायदे (लाभ):

  1. इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि नबी ﷺ को भी लोगों की बातों से दुख होता था, और अल्लाह ने उन्हें दिलासा दिया। इससे हमें पता चलता है कि सच्चाई पर क़ायम रहने वालों को मुख़ालिफ़ों की बातों से दुख होना स्वाभाविक है, लेकिन अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए।
  2. यह आयत हमें सिखाती है कि कुछ लोग सच्चाई जानते हुए भी उसे नहीं मानते। उनका इनकार ज्ञान की कमी से नहीं, बल्कि ज़ुल्म और हठधर्मिता से होता है। इसलिए हमें अपने दीन पर दृढ़ रहना चाहिए और लोगों की राय से मायूस नहीं होना चाहिए।
  3. अल्लाह तआला अपने नबी की हर परेशानी से वाक़िफ़ है और उन्हें सांत्वना देता है। यह हमारे लिए भी बड़ी खुशखबरी है कि हमारा रब हमारे दर्द को जानता है और वह हमें हिम्मत देता है।
  4. इस आयत से यह भी पता चलता है कि सच्चाई की पहचान के बावजूद इनकार करना एक बड़ा ज़ुल्म है। इसलिए हमें हमेशा सच्चाई को स्वीकार करने के लिए तैयार रहना चाहिए और हठधर्मी से बचना चाहिए, क्योंकि हठधर्मी इंसान को अल्लाह की आयतों से दूर कर देती है।


📜 आयत 31-35 — अल-अनआम

31قَدْ خَسِرَ الَّذِينَ كَذَّبُوا بِلِقَاءِ اللَّهِ ۖ حَتَّىٰ إِذَا جَاءَتْهُمُ السَّاعَةُ بَغْتَةً قَالُوا يَا حَسْرَتَنَا عَلَىٰ مَا فَرَّطْنَا فِيهَا وَهُمْ يَحْمِلُونَ أَوْزَارَهُمْ عَلَىٰ ظُهُورِهِمْ ۚ أَلَا سَاءَ مَا يَزِرُونَ
उसकी सज़ा में अज़ाब (के मजे) चखो बेशक जिन लोगों ने क़यामत के दिन ख़ुदा की हुज़ूरी को झुठलाया वह बड़े घाटे में हैं यहाँ तक कि जब उनके सर पर क़यामत नागहा (एक दम आ) पहँचेगी तो कहने लगेगें ऐ है अफसोस हम ने तो इसमें बड़ी कोताही की (ये कहते जाएगे) और अपने गुनाहों का पुश्तारा अपनी अपनी पीठ पर लादते जाएंगे देखो तो (ये) क्या बुरा बोझ है जिसको ये लादे (लादे फिर रहे) हैं
32وَمَا الْحَيَاةُ الدُّنْيَا إِلَّا لَعِبٌ وَلَهْوٌ ۖ وَلَلدَّارُ الْآخِرَةُ خَيْرٌ لِّلَّذِينَ يَتَّقُونَ ۗ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
और (ये) दुनियावी ज़िन्दगी तो खेल तमाशे के सिवा कुछ भी नहीं और ये तो ज़ाहिर है कि आख़िरत का घर (बेहिश्त) परहेज़गारो के लिए उसके बदर वहॉ (कई गुना) बेहतर है तो क्या तुम (इतना भी) नहीं समझते
33قَدْ نَعْلَمُ إِنَّهُ لَيَحْزُنُكَ الَّذِي يَقُولُونَ ۖ فَإِنَّهُمْ لَا يُكَذِّبُونَكَ وَلَٰكِنَّ الظَّالِمِينَ بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ
हम खूब जानते हैं कि उन लोगों की बकबक तुम को सदमा पहुँचाती है तो (तुम को समझना चाहिए कि) ये लोग तुम को नहीं झुठलाते बल्कि (ये) ज़ालिम (हक़ीक़तन) ख़ुदा की आयतों से इन्कार करते हैं
34وَلَقَدْ كُذِّبَتْ رُسُلٌ مِّن قَبْلِكَ فَصَبَرُوا عَلَىٰ مَا كُذِّبُوا وَأُوذُوا حَتَّىٰ أَتَاهُمْ نَصْرُنَا ۚ وَلَا مُبَدِّلَ لِكَلِمَاتِ اللَّهِ ۚ وَلَقَدْ جَاءَكَ مِن نَّبَإِ الْمُرْسَلِينَ
और (कुछ तुम ही पर नहीं) तुमसे पहले भी बहुतेरे रसूल झुठलाए जा चुके हैं तो उन्होनें अपने झुठलाए जाने और अज़ीयत (व तकलीफ) पर सब्र किया यहाँ तक कि हमारी मदद उनके पास आयी और (क्यों न आती) ख़ुदा की बातों का कोई बदलने वाला नहीं है और पैग़म्बर के हालात तो तुम्हारे पास पहुँच ही चुके हैं
35وَإِن كَانَ كَبُرَ عَلَيْكَ إِعْرَاضُهُمْ فَإِنِ اسْتَطَعْتَ أَن تَبْتَغِيَ نَفَقًا فِي الْأَرْضِ أَوْ سُلَّمًا فِي السَّمَاءِ فَتَأْتِيَهُم بِآيَةٍ ۚ وَلَوْ شَاءَ اللَّهُ لَجَمَعَهُمْ عَلَى الْهُدَىٰ ۚ فَلَا تَكُونَنَّ مِنَ الْجَاهِلِينَ
अगरचे उन लोगों की रदगिरदानी (मुँह फेरना) तुम पर शाक़ ज़रुर है (लेकिन) अगर तुम्हारा बस चले तो ज़मीन के अन्दर कोई सुरगं ढँढ निकालो या आसमान में सीढ़ी लगाओ और उन्हें कोई मौजिज़ा ला दिखाओ (तो ये भी कर देखो) अगर ख़ुदा चाहता तो उन सब को राहे रास्त पर इकट्ठा कर देता (मगर वह तो इम्तिहान करता है) बस (देखो) तुम हरगिज़ ज़ालिमों में (शामिल) न होना
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अनुवाद — अल-अनआम 33

सूरा अल-अनआम आयत 33 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : हम खूब जानते हैं कि उन लोगों की बकबक तुम…

सूरा आयत 33/165 — अल-अनआम الأنعام (मक्की). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अल-अनआम सुनें, अल-अनआम अनुवाद, अल-अनआम mp3, अल-अनआम pdf. आयत 31–35. हिंदी अर्थ: اردو.




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Tuesday, August 18, 2026

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