अल-जिन्न · 19/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
وَأَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا ۝١٩
Wa annahoo lammaa qaama `adul laahi yad`oohu kaadoo yakoonoona `alaihi libadaa
📖 हिंदी अर्थ
और ये कि जब उसका बन्दा (मोहम्मद) उसकी इबादत को खड़ा होता है तो लोग उसके गिर्द हुजूम करके गिर पड़ते हैं
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • عَبْدُ اللَّهِ (अब्दुल्लाह): अल्लाह के बंदे, यानी हज़रत मुहम्मद ﷺ।
  • يَدْعُوهُ (यद्ऊहु): उसे पुकारता है, यानी अल्लाह की इबादत करता है और उसकी तरफ बुलाता है।
  • لِبَدًا (लिबदन): एक दूसरे के ऊपर जमा हुए, गुच्छेदार, भीड़ की वजह से इकट्ठे हुए लोग।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब अल्लाह के बंदे हज़रत मुहम्मद ﷺ ने "नख़ला" (मक्का के पास एक घाटी) में रात के समय खड़े होकर अल्लाह की इबादत की और क़ुरआन की तिलावत शुरू की, तो जिन्नों का एक गिरोह (जो नसीबीन के इलाके से आया था) उनकी क़ुरआन की तिलावत सुनने के लिए इस कदर बेताब हो गया कि वे एक दूसरे पर चढ़ते-गिरते हुए, इकट्ठे होकर उनके पास आ खड़े हुए। उनकी भीड़ इतनी ज़्यादा थी कि वे एक-दूसरे के ऊपर लदे हुए थे, ताकि क़ुरआन का एक शब्द भी उनके कानों से न छूटे। यह मंज़र उस वक़्त का है जब अल्लाह के रसूल ﷺ ने सुबह की नमाज़ में क़ुरआन पढ़ा और जिन्नों ने उसे सुनकर अपनी क़ौम की तरफ लौटकर कहा: "हमने एक अजीब क़ुरआन सुना है जो सीधे रास्ते की तरफ हिदायत करता है, हम उस पर ईमान ले आए।"

यह आयत उस वक़्त की तस्वीर पेश करती है जब अल्लाह के नबी ﷺ ने अकेले रात के सन्नाटे में अल्लाह की इबादत की और क़ुरआन की तिलावत की। यह इबादत सिर्फ इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जिन्नात के लिए भी हिदायत का ज़रिया बनी। जिन्नों का इस तरह इकट्ठा होना और क़ुरआन सुनने के लिए बेताब होना इस बात का सबूत है कि क़ुरआन में ऐसी कशिश है जो इंसानों और जिन्नों दोनों को अपनी तरफ खींच लेती है। यह हमारे लिए एक सबक़ है कि जब हम अल्लाह की इबादत करें और क़ुरआन पढ़ें, तो उसे सच्चे दिल से पढ़ें, क्योंकि अल्लाह की बात में वो नूर है जो दिलों को रोशन कर देता है।

अल्लाह तआला ने इस आयत में हमें बताया कि उसका बंदा जब उसे पुकारता है, तो सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि जिन्नात भी उसकी तरफ रुख करते हैं। यह हमारे नबी ﷺ की शान है कि उनकी इबादत और तिलावत का असर पूरी कायनात पर पड़ता है। हमें भी चाहिए कि हम अपनी नमाज़ों और क़ुरआन की तिलावत को सिर्फ रस्म न बनाएं, बल्कि उसे दिल से समझें और उस पर अमल करें। जब हम अल्लाह की तरफ सच्चे दिल से रुख करेंगे, तो अल्लाह हमारी मदद करेगा और हमें सीधा रास्ता दिखाएगा। यही इस आयत का पैग़ाम है कि अल्लाह की इबादत में इतनी बरकत है कि उसके फरिश्ते, जिन्न और इंसान सब उसकी तरफ खिंचे चले आते हैं।

🎧 सुनें

📜 आयत 17-21 — अल-जिन्न

17لِّنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَمَن يُعْرِضْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِ يَسْلُكْهُ عَذَابًا صَعَدًا
ताकि उससे उनकी आज़माईश करें और जो शख़्श अपने परवरदिगार की याद से मुँह मोड़ेगा तो वह उसको सख्त अज़ाब में झोंक देगा
18وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا
और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न करना
19وَأَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا
और ये कि जब उसका बन्दा (मोहम्मद) उसकी इबादत को खड़ा होता है तो लोग उसके गिर्द हुजूम करके गिर पड़ते हैं
20قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो अपने परवरदिगार की इबादत करता हूँ और उसका किसी को शरीक नहीं बनाता
21قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا
(ये भी) कह दो कि मैं तुम्हारे हक़ में न बुराई ही का एख्तेयार रखता हूँ और न भलाई का
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अनुवाद — अल-जिन्न 19

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Tuesday, August 18, 2026

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