अल-जिन्न · 20/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا ۝٢٠
Qul innamaaa ad`oo rabbee wa laaa ushriku biheee ahadaa
📖 हिंदी अर्थ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो अपने परवरदिगार की इबादत करता हूँ और उसका किसी को शरीक नहीं बनाता

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • أَدْعُو — मैं पुकारता हूँ, अर्थात् अपनी इबादत और प्रार्थना में एकमात्र उसे ही सम्बोधित करता हूँ।
  • رَبِّي — मेरा पालनहार, जो मेरा सृष्टिकर्ता, पालन-पोषण करने वाला और स्वामी है।
  • أُشْرِكُ — मैं साझी ठहराता हूँ, किसी और को उसके साथ इबादत में शामिल करता हूँ।
  • أَحَدًا — किसी को भी, चाहे वह कोई भी प्राणी, देवता या वस्तु हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

ऐ नबी! आप इन मुशरिकों से साफ़ और दृढ़ शब्दों में कह दीजिए कि मैं केवल अपने रब को पुकारता हूँ और उसी की इबादत करता हूँ। मेरी दुआ, मेरी नमाज़, मेरी क़ुर्बानी, मेरा जीवन और मेरी मृत्यु — सब कुछ केवल उसी के लिए है। मैं उसके साथ किसी को भी साझी नहीं ठहराता — न किसी फ़रिश्ते को, न किसी नबी को, न किसी इंसान को, न किसी जिन्न को और न ही किसी मूर्ति या तस्वीर को। मेरी इबादत ख़ालिस और एकमात्र उसी के लिए है, और यही मेरा दीन है, यही मेरा रास्ता है।

यह आयत तौहीद (एकेश्वरवाद) की वह बुनियाद है जिस पर पूरा इस्लाम खड़ा है। यह सिखाती है कि इबादत केवल अल्लाह के लिए है, और उसके साथ किसी भी प्रकार का शिर्क (साझीदारी) सबसे बड़ा ज़ुल्म और सबसे बड़ा पाप है। जब एक इंसान अपने दिल को शिर्क से पाक कर लेता है और अपनी पूरी ज़िंदगी को अल्लाह की रज़ा के लिए समर्पित कर देता है, तो उसे एक अजीब सुकून, इत्मिनान और आज़ादी मिलती है — वह किसी इंसान, किसी ताक़त या किसी हालात का ग़ुलाम नहीं रहता, बल्कि सिर्फ़ अल्लाह का बंदा बन जाता है, और यही सबसे बड़ी इज़्ज़त है।

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें बताती है कि जीवन की हर मुश्किल में, हर ज़रूरत में, हर दर्द में हमें सीधे अपने रब से जुड़ना चाहिए। उसी से माँगना चाहिए, उसी से उम्मीद रखनी चाहिए। जब दिल में यह यक़ीन पक्का हो जाए कि अल्लाह ही सब कुछ कर सकता है और वही सुनता है, तो इंसान कभी निराश नहीं होता। यही तौहीद हमें ज़िंदगी की हर परेशानी में सहारा देती है और हमें उस ताक़त से जोड़ती है जो हर चीज़ पर क़ादिर है। आइए, हम अपने दिलों को शिर्क की हर मैल से पाक करें और अपनी ज़िंदगी को इसी पवित्र कलिमा पर क़ायम करें — "ला इलाहा इल्लल्लाह" — कोई इबादत के लायक़ नहीं, सिवाय अल्लाह के।



📜 आयत 18-22 — अल-जिन्न

18وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا
और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न करना
19وَأَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا
और ये कि जब उसका बन्दा (मोहम्मद) उसकी इबादत को खड़ा होता है तो लोग उसके गिर्द हुजूम करके गिर पड़ते हैं
20قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो अपने परवरदिगार की इबादत करता हूँ और उसका किसी को शरीक नहीं बनाता
21قُلْ إِنِّي لَا أَمْلِكُ لَكُمْ ضَرًّا وَلَا رَشَدًا
(ये भी) कह दो कि मैं तुम्हारे हक़ में न बुराई ही का एख्तेयार रखता हूँ और न भलाई का
22قُلْ إِنِّي لَن يُجِيرَنِي مِنَ اللَّهِ أَحَدٌ وَلَنْ أَجِدَ مِن دُونِهِ مُلْتَحَدًا
(ये भी) कह दो कि मुझे ख़ुदा (के अज़ाब) से कोई भी पनाह नहीं दे सकता और न मैं उसके सिवा कहीं पनाह की जगह देखता हूँ
अल-जिन्नकुरान सूची
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अनुवाद — अल-जिन्न 20

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Tuesday, August 18, 2026

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