अल-जिन्न · 18/28
अनुवाद उच्चारण — अल-जिन्न
وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا ۝١٨
Wa annal masaajida lillaahi falaa tad`oo ma`al laahi ahadaa
📖 हिंदी अर्थ
और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न करना

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • المَسَاجِد: वे स्थान जो अल्लाह की इबादत के लिए बनाए गए हैं।
  • تَدْعُوا: पुकारना, प्रार्थना करना, इबादत करना।
  • أَحَدًا: किसी को भी।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत मुसलमानों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा देती है कि मस्जिदें केवल और केवल अल्लाह के लिए हैं। ये वे पवित्र स्थान हैं जो सिर्फ अल्लाह की इबादत, उसकी याद और उससे दुआ माँगने के लिए बनाए गए हैं। इसलिए जब हम मस्जिद में जाएँ, तो हमें अपने दिल को पूरी तरह से अल्लाह की तरफ लगाना चाहिए और किसी और को उसका साझी नहीं बनाना चाहिए।

इस आयत में अल्लाह तआला साफ़ फ़रमा रहे हैं कि मस्जिदों में किसी और की इबादत न करो, किसी और को न पुकारो, न किसी पैगंबर को, न किसी वली को, न किसी फरिश्ते को। यह सब शिर्क है, और शिर्क सबसे बड़ा गुनाह है। जिस तरह यहूदी और ईसाई अपने चर्चों और सिनेगॉग में अल्लाह के साथ दूसरों को शामिल करते हैं, मुसलमानों को ऐसा नहीं करना चाहिए।

मस्जिद की पवित्रता का ख्याल रखना हर मुसलमान का फर्ज़ है। मस्जिद वह जगह है जहाँ हम सजदा करते हैं, जहाँ हमारे आँसू अल्लाह की रहमत के लिए बहते हैं, और जहाँ हमें दुनिया की सारी चिंताओं को भुलाकर सिर्फ अल्लाह की तरफ रुजू करना चाहिए। यह आयत हमें सिखाती है कि हमारी नमाज़, हमारी दुआ, हमारी इबादत — सब कुछ सिर्फ अल्लाह के लिए होनी चाहिए।

यह भी याद रखें कि यह आयत सिर्फ मस्जिद की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे दिलों की सफाई का पैगाम है। जिस तरह मस्जिद सिर्फ अल्लाह के लिए है, उसी तरह हमारा दिल भी सिर्फ अल्लाह के लिए होना चाहिए। जब हमारा दिल अल्लाह से जुड़ जाता है, तो हर जगह हमारी इबादत होती है, और हर अच्छा काम हमारे लिए सवाब का ज़रिया बन जाता है।

आओ, हम अपने दिलों को शिर्क से पाक करें, अपनी मस्जिदों को हर उस चीज़ से बचाएँ जो अल्लाह की इबादत में खलल डालती है, और अपनी ज़िंदगी को सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए समर्पित कर दें। यही सच्ची कामयाबी है, और यही वह रास्ता है जो हमें जन्नत तक पहुँचाएगा। अल्लाह हम सबको इस तौफीक़ अता फरमाए। आमीन।



📜 आयत 16-20 — अल-जिन्न

16وَأَن لَّوِ اسْتَقَامُوا عَلَى الطَّرِيقَةِ لَأَسْقَيْنَاهُم مَّاءً غَدَقًا
और (ऐ रसूल तुम कह दो) कि अगर ये लोग सीधी राह पर क़ायम रहते तो हम ज़रूर उनको अलग़ारों पानी से सेराब करते
17لِّنَفْتِنَهُمْ فِيهِ ۚ وَمَن يُعْرِضْ عَن ذِكْرِ رَبِّهِ يَسْلُكْهُ عَذَابًا صَعَدًا
ताकि उससे उनकी आज़माईश करें और जो शख़्श अपने परवरदिगार की याद से मुँह मोड़ेगा तो वह उसको सख्त अज़ाब में झोंक देगा
18وَأَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلَا تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَدًا
और ये कि मस्जिदें ख़ास ख़ुदा की हैं तो लोगों ख़ुदा के साथ किसी की इबादन न करना
19وَأَنَّهُ لَمَّا قَامَ عَبْدُ اللَّهِ يَدْعُوهُ كَادُوا يَكُونُونَ عَلَيْهِ لِبَدًا
और ये कि जब उसका बन्दा (मोहम्मद) उसकी इबादत को खड़ा होता है तो लोग उसके गिर्द हुजूम करके गिर पड़ते हैं
20قُلْ إِنَّمَا أَدْعُو رَبِّي وَلَا أُشْرِكُ بِهِ أَحَدًا
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि मैं तो अपने परवरदिगार की इबादत करता हूँ और उसका किसी को शरीक नहीं बनाता
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अनुवाद — अल-जिन्न 18

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Tuesday, August 18, 2026

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