अल-मुद्दस्सिर · 33/56
अनुवाद उच्चारण — अल-मुद्दस्सिर
وَاللَّيْلِ إِذْ أَدْبَرَ ۝٣٣
Wallaili adbar
📖 हिंदी अर्थ
और रात की जब जाने लगे
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • وَاللَّيْلِ: रात की क़सम।
  • إِذْ أَدْبَرَ: जब वह पीठ फेरकर चला जाए, यानी जब रात ख़त्म होने लगे और सुबह का आगमन हो।

तफ़सीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला ने इस आयत में रात की क़सम खाई है, जब वह विदा होती है और अपने अंधेरे के साथ चली जाती है। यह क़सम उस वक़्त की ओर इशारा करती है जब रात का सन्नाटा टूटता है, अंधेरा छँटने लगता है और सुबह की रोशनी फैलने लगती है। यह वह पल है जब अल्लाह की क़ुदरत के नज़ारे साफ़ दिखाई देते हैं — रात का पीठ फेरना और दिन का आगमन, यह सब अल्लाह के इशारे से होता है।

इस क़सम का मक़सद उन लोगों को जवाब देना है जो रसूल ﷺ के पैग़ाम को झुठलाते थे। अल्लाह फ़रमाता है: यह बात वैसी नहीं है जैसा ये कहते हैं। मैंने क़सम खाई है चाँद की, रात की जब वह जाती है, और सुबह की जब वह रोशन होती है — कि ये क़ुरआन और ये चेतावनी सच है। यह नरक की आग एक बहुत बड़ी आफ़त है, जो इंसानों को डराने और सावधान करने के लिए पेश की गई है।

यह क़समें बताती हैं कि अल्लाह की क़ुदरत की निशानियाँ हर तरफ़ हैं — रात और दिन का बदलना, अंधेरे के बाद उजाला, और हर चीज़ का एक वक़्त पर आना-जाना। जिस तरह रात के बाद सुबह ज़रूर आती है, उसी तरह मौत के बाद हिसाब ज़रूर आएगा। जो लोग इस पर यक़ीन करें और अच्छे काम करें, वे अल्लाह की रहमत के हक़दार होंगे, और जो इनकार करें, उनके लिए अज़ाब तैयार है।

यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की बनाई हर चीज़ में उसकी याद है। रात का जाना और सुबह का आना हमें याद दिलाता है कि हमारी ज़िंदगी भी इसी तरह बदलती रहती है — कभी मुश्किल, कभी आसान। इसलिए हमें हमेशा अल्लाह की तरफ़ रुजू करना चाहिए, उसकी इबादत करनी चाहिए और उसके दिए हुए दीन पर चलना चाहिए। यही वह रास्ता है जो हमें जहन्नुम की आग से बचाकर जन्नत की तरफ़ ले जाता है।

🎧 सुनें

📜 आयत 31-35 — अल-मुद्दस्सिर

31وَمَا جَعَلْنَا أَصْحَابَ النَّارِ إِلَّا مَلَائِكَةً ۙ وَمَا جَعَلْنَا عِدَّتَهُمْ إِلَّا فِتْنَةً لِّلَّذِينَ كَفَرُوا لِيَسْتَيْقِنَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَيَزْدَادَ الَّذِينَ آمَنُوا إِيمَانًا ۙ وَلَا يَرْتَابَ الَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ وَالْمُؤْمِنُونَ ۙ وَلِيَقُولَ الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ وَالْكَافِرُونَ مَاذَا أَرَادَ اللَّهُ بِهَٰذَا مَثَلًا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ اللَّهُ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَمَا يَعْلَمُ جُنُودَ رَبِّكَ إِلَّا هُوَ ۚ وَمَا هِيَ إِلَّا ذِكْرَىٰ لِلْبَشَرِ
और हमने जहन्नुम का निगेहबान तो बस फरिश्तों को बनाया है और उनका ये शुमार भी काफिरों की आज़माइश के लिए मुक़र्रर किया ताकि अहले किताब (फौरन) यक़ीन कर लें और मोमिनो का ईमान और ज्यादा हो और अहले किताब और मोमिनीन (किसी तरह) शक़ न करें और जिन लोगों के दिल में (निफ़ाक का) मर्ज़ है (वह) और काफिर लोग कह बैठे कि इस मसल (के बयान करने) से ख़ुदा का क्या मतलब है यूँ ख़ुदा जिसे चाहता है गुमराही में छोड़ देता है और जिसे चाहता है हिदायत करता है और तुम्हारे परवरदिगार के लशकरों को उसके सिवा कोई नहीं जानता और ये तो आदमियों के लिए बस नसीहत है
32كَلَّا وَالْقَمَرِ
सुन रखो (हमें) चाँद की क़सम
33وَاللَّيْلِ إِذْ أَدْبَرَ
और रात की जब जाने लगे
34وَالصُّبْحِ إِذَا أَسْفَرَ
और सुबह की जब रौशन हो जाए
35إِنَّهَا لَإِحْدَى الْكُبَرِ
कि वह (जहन्नुम) भी एक बहुत बड़ी (आफ़त) है
अल-मुद्दस्सिरकुरान सूची
56आयत
मक्कीRevelation
33आयत

अनुवाद — अल-मुद्दस्सिर 33

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Tuesday, August 18, 2026

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