अत-तौबा · 124/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَٰذِهِ إِيمَانًا ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا فَزَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ ۝١٢٤
Wa izaa maaa unzilat Sooratun faminhum mai yaqoolu aiyukum zaadat hu haazihee eemaanaa; fa ammal lazeena aamanoo fazaadat hum eemaananw wa hum yastabshiroon
📖 हिंदी अर्थ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से (एक दूसरे से) पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहां उसकी ख़ुशियाँ मनाते है
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • سُورَةٌ: कुरआन का एक अध्याय (सूरह)।
  • زَادَتْهُ: उसे बढ़ा दिया।
  • إِيمَانًا: विश्वास, यक़ीन और आस्था।
  • يَسْتَبْشِرُونَ: खुश होते हैं, शुभ सूचना पाकर प्रसन्न होते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब अल्लाह की ओर से कुरआन का कोई सूरह अवतरित होता है, तो मुनाफ़िक़ीन (कपटियों) में से कुछ लोग मज़ाक़ और उपहास के तौर पर दूसरों से पूछते हैं: "देखो, इस सूरह ने तुममें से किसका ईमान बढ़ाया?" वे इस प्रश्न से इस्लाम और उसके पैग़ाम को बेकार साबित करना चाहते हैं। लेकिन जो लोग सच्चे मोमिन हैं, उनके लिए यही सूरह ईमान में और अधिक वृद्धि का कारण बनती है — क्योंकि वे इसे ध्यान से सुनते हैं, उस पर ग़ौर करते हैं, उसे समझते हैं और उस पर अमल करते हैं। इस प्रकार उनका विश्वास, यक़ीन और अल्लाह के प्रति समर्पण और गहरा हो जाता है। वे इस नई हिदायत पर खुश होते हैं और अल्लाह की रहमत से प्रसन्न रहते हैं, क्योंकि यह उनके लिए दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई का ज़रिया बनती है।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. कुरआन की हर आयत और हर सूरह मोमिन के लिए ईमान, यक़ीन और अमल में बरकत का ज़रिया है — बशर्ते वह इसे सच्चे दिल से पढ़े और समझे।
  2. कुरआन से लाभ उठाने का असली रहस्य उस पर ग़ौर-ओ-फ़िक्र करना और उसके अनुसार जीवन ढालना है।
  3. ईमान एक स्थिर चीज़ नहीं, बल्कि यह बढ़ता और घटता रहता है; कुरआन की तिलावत और अमल से यह बढ़ता है।
  4. मोमिन की पहचान यह है कि वह अल्लाह की हिदायत पर खुश होता है और उसे अपने लिए नेमत समझता है, जबकि मुनाफ़िक़ उसी चीज़ का मज़ाक़ उड़ाता है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि हम अपने दिल को कुरआन के लिए खुला रखें, ताकि हर नई आयत हमारे ईमान को मज़बूत करे और हमें अल्लाह के और करीब लाए।
🎧 सुनें

📜 आयत 122-126 — अत-तौबा

122۞ وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا كَافَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَائِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ
और ये भी मुनासिब नहीं कि मोमिननि कुल के कुल (अपने घरों में) निकल खड़े हों उनमें से हर गिरोह की एक जमाअत (अपने घरों से) क्यों नहीं निकलती ताकि इल्मे दीन हासिल करे और जब अपनी क़ौम की तरफ पलट के आवे तो उनको (अज्र व आख़िरत से) डराए ताकि ये लोग डरें
123يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قَاتِلُوا الَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ الْكُفَّارِ وَلْيَجِدُوا فِيكُمْ غِلْظَةً ۚ وَاعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ مَعَ الْمُتَّقِينَ
ऐ ईमानदारों कुफ्फार में से जो लोग तुम्हारे आस पास के है उन से लड़ों और (इस तरह लड़ना) चाहिए कि वह लोग तुम में करारापन महसूस करें और जान रखो कि बेशुबहा ख़ुदा परहेज़गारों के साथ है
124وَإِذَا مَا أُنزِلَتْ سُورَةٌ فَمِنْهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمْ زَادَتْهُ هَٰذِهِ إِيمَانًا ۚ فَأَمَّا الَّذِينَ آمَنُوا فَزَادَتْهُمْ إِيمَانًا وَهُمْ يَسْتَبْشِرُونَ
और जब कोई सूरा नाज़िल किया गया तो उन मुनाफिक़ीन में से (एक दूसरे से) पूछता है कि भला इस सूरे ने तुममें से किसी का ईमान बढ़ा दिया तो जो लोग ईमान ला चुके हैं उनका तो इस सूरे ने ईमान बढ़ा दिया और वह वहां उसकी ख़ुशियाँ मनाते है
125وَأَمَّا الَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ فَزَادَتْهُمْ رِجْسًا إِلَىٰ رِجْسِهِمْ وَمَاتُوا وَهُمْ كَافِرُونَ
मगर जिन लोगों के दिल में (निफाक़ की) बीमारी है तो उन (पिछली) ख़बासत पर इस सूरो ने एक ख़बासत और बढ़ा दी और ये लोग कुफ़्र ही की हालत में मर गए
126أَوَلَا يَرَوْنَ أَنَّهُمْ يُفْتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٍ مَّرَّةً أَوْ مَرَّتَيْنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمْ يَذَّكَّرُونَ
क्या वह लोग (इतना भी) नहीं देखते कि हर साल एक मरतबा या दो मरतबा बला में मुबितला किए जाते हैं फिर भी न तो ये लोग तौबा ही करते हैं और न नसीहत ही मानते हैं
अत-तौबाकुरान सूची
129आयत
मदनीRevelation
124आयत

अनुवाद — अत-तौबा 124

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Tuesday, August 18, 2026

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