अत-तौबा · 54/129
अनुवाद उच्चारण — अत-तौबा
وَمَا مَنَعَهُمْ أَن تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ إِلَّا أَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَبِرَسُولِهِ وَلَا يَأْتُونَ الصَّلَاةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ ۝٥٤
Wa maa mana`ahum an tuqbala minhum nafaqaatuhum illaaa annnahum kafaroo billaahi wa bi Rasoolihee wa laa yaatoonas Salaata illaa wa hum kusaalaa wa laa yunfiqoona illaa wa hum kaarihoon
📖 हिंदी अर्थ
और उनकी ख़ैरात के क़ुबूल किए जाने में और कोई वजह मायने नहीं मगर यही कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और नमाज़ को आते भी हैं तो अलकसाए हुए और ख़ुदा की राह में खर्च करते भी हैं तो बे दिली से

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • نَفَقَاتُهُمْ: उनके खर्च (दान)
  • كُسَالَى: आलसी, सुस्त, बोझ समझकर
  • كَارِهُونَ: नापसंद करने वाले, अनिच्छा से

व्याख्या:

इस आयत में अल्लाह तआला मुनाफ़िक़ों (कपटियों) के उस हाल का वर्णन कर रहा है जिसके कारण उनके दान और खर्च कभी स्वीकार नहीं होते। उनके दान अस्वीकार होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के साथ कुफ़्र किया — यानी उन्होंने अल्लाह को नहीं माना और उसके पैग़म्बर को झुठलाया। ईमान ही वह बुनियाद है जिस पर हर नेक अमल की क़बूलियत टिकी होती है; जब यही बुनियाद ही न हो, तो ऊपर बनी कोई भी इमारत क़बूल नहीं हो सकती।

इसके अलावा, जब वे नमाज़ के लिए आते हैं तो बड़ी सुस्ती और आलस के साथ आते हैं — जैसे उन पर कोई बोझ लाद दिया गया हो। वे नमाज़ को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं मानते, बल्कि एक मजबूरी समझते हैं जिसे उन्हें निभाना पड़ता है। उनके दिलों में नमाज़ की कोई अहमियत नहीं, न उन्हें इसका कोई सवाब चाहिए और न छोड़ने का कोई डर।

इसी तरह, जब वे खर्च करते हैं (ज़कात या दान) तो उसे इस तरह करते हैं जैसे उनसे कुछ छीना जा रहा हो। वे इसे नुक़सान समझते हैं और रोकने को फ़ायदा। उनका खर्च किसी नेक नीयत से नहीं होता, बल्कि लोगों को दिखाने या किसी दबाव में आकर होता है। इसलिए उनका यह खर्च भी अल्लाह के यहाँ क़बूल नहीं होता, क्योंकि अल्लाह तो सिर्फ़ उन्हीं लोगों का अमल क़बूल करता है जो उस पर ईमान रखते हैं और खुशी से उसकी इबादत करते हैं।

फ़ायदे और सबक:

  1. ईमान हर नेक अमल की क़बूलियत की शर्त है। बिना ईमान के कोई भी अमल अल्लाह के यहाँ स्वीकार नहीं होता, चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो।
  2. नमाज़ में आलस और सुस्ती मुनाफ़िक़ों की निशानी है। मोमिन की पहचान यह है कि वह नमाज़ को शौक़ और खुशी से अदा करता है, क्योंकि वह जानता है कि यह अल्लाह से मुलाक़ात का ज़रिया है।
  3. खर्च करने में नापसंदगी और कंजूसी भी कमज़ोर ईमान की दलील है। मोमिन अल्लाह की राह में खुशी-खुशी खर्च करता है, क्योंकि उसे यक़ीन है कि अल्लाह उसे बदले में और ज़्यादा देगा।
  4. यह आयत हमें सिखाती है कि अमल की क़ीमत उसकी नीयत पर है। जो काम अल्लाह के लिए नहीं होता, वह दिखावा है और दिखावा अल्लाह के यहाँ कभी क़बूल नहीं होता।
  5. मुसलमान को चाहिए कि वह अपने दिल की हालत हमेशा जाँचता रहे — क्या वह नमाज़ को प्यार से पढ़ता है या बोझ समझकर? क्या वह खर्च करते वक़्त खुश है या दुखी? यही उसके ईमान की कसौटी है।


📜 आयत 52-56 — अत-तौबा

52قُلْ هَلْ تَرَبَّصُونَ بِنَا إِلَّا إِحْدَى الْحُسْنَيَيْنِ ۖ وَنَحْنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمْ أَن يُصِيبَكُمُ اللَّهُ بِعَذَابٍ مِّنْ عِندِهِ أَوْ بِأَيْدِينَا ۖ فَتَرَبَّصُوا إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ
(ऐ रसूल) तुम मुनाफिकों से कह दो कि तुम तो हमारे वास्ते (फतेह या शहादत) दो भलाइयों में से एक के ख्वाह मख्वाह मुन्तज़िर ही हो और हम तुम्हारे वास्ते उसके मुन्तज़िर हैं कि ख़ुदा तुम पर (ख़ास) अपने ही से कोई अज़ाब नाज़िल करे या हमारे हाथों से फिर (अच्छा) तुम भी इन्तेज़ार करो हम भी तुम्हारे साथ (साथ) इन्तेज़ार करते हैं
53قُلْ أَنفِقُوا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا لَّن يُتَقَبَّلَ مِنكُمْ ۖ إِنَّكُمْ كُنتُمْ قَوْمًا فَاسِقِينَ
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुम लोग ख्वाह ख़ुशी से खर्च करो या मजबूरी से तुम्हारी ख़ैरात तो कभी कुबूल की नहीं जाएगी तुम यक़ीनन बदकार लोग हो
54وَمَا مَنَعَهُمْ أَن تُقْبَلَ مِنْهُمْ نَفَقَاتُهُمْ إِلَّا أَنَّهُمْ كَفَرُوا بِاللَّهِ وَبِرَسُولِهِ وَلَا يَأْتُونَ الصَّلَاةَ إِلَّا وَهُمْ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمْ كَارِهُونَ
और उनकी ख़ैरात के क़ुबूल किए जाने में और कोई वजह मायने नहीं मगर यही कि उन लोगों ने ख़ुदा और उसके रसूल की नाफ़रमानी की और नमाज़ को आते भी हैं तो अलकसाए हुए और ख़ुदा की राह में खर्च करते भी हैं तो बे दिली से
55فَلَا تُعْجِبْكَ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُمْ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُعَذِّبَهُم بِهَا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَتَزْهَقَ أَنفُسُهُمْ وَهُمْ كَافِرُونَ
(ऐ रसूल) तुम को न तो उनके माल हैरत में डाले और न उनकी औलाद (क्योंकि) ख़ुदा तो ये चाहता है कि उनको आल व माल की वजह से दुनिया की (चन्द रोज़) ज़िन्दगी (ही) में मुबितलाए अज़ाब करे और जब उनकी जानें निकलें तब भी वह काफिर (के काफिर ही) रहें
56وَيَحْلِفُونَ بِاللَّهِ إِنَّهُمْ لَمِنكُمْ وَمَا هُم مِّنكُمْ وَلَٰكِنَّهُمْ قَوْمٌ يَفْرَقُونَ
और (मुसलमानों) ये लोग ख़ुदा की क़सम खाएंगे फिर वह तुममें ही के हैं हालॉकि वह लोग तुममें के नहीं हैं मगर हैं ये लोग बुज़दिल हैं
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अनुवाद — अत-तौबा 54

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Tuesday, August 18, 2026

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