Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- اسْتَغْفِرْ لَهُمْ: उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करें।
- سَبْعِينَ مَرَّةً: सत्तर बार (यहाँ यह संख्या अधिकता और पूर्णता के लिए है, सीमा के लिए नहीं)।
- الْفَاسِقِينَ: आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, अवज्ञाकारी।
तफ़सीर (व्याख्या):
हे नबी! आप इन मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) के लिए क्षमा की प्रार्थना करें या न करें — दोनों ही स्थितियों में कोई अंतर नहीं है। यदि आप उनके लिए सत्तर बार भी क्षमा की प्रार्थना करें, तो भी अल्लाह उन्हें क्षमा नहीं करेगा। यह कोई सीमा नहीं है, बल्कि अरबों की भाषा में "सत्तर" का उल्लेख अधिकता और पूर्ण प्रयास को दर्शाने के लिए किया गया है — अर्थात् चाहे आप कितनी ही बार क्षमा माँगें, उनके लिए क्षमा नहीं है। इसका कारण यह है कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र (इनकार) किया, और अल्लाह उन लोगों को सीधा मार्ग नहीं दिखाता जो जानबूझकर उसकी अवज्ञा करते हैं और अपने कुफ़्र पर अड़े रहते हैं। यह आदेश या सूचना के रूप में है — अर्थात् उनके लिए क्षमा की प्रार्थना करना या न करना बराबर है; अल्लाह ने उनके कुफ़्र के कारण उन्हें क्षमा से वंचित कर दिया है।
शिक्षाएँ और लाभ:
- यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की क्षमा उसके अधिकार में है, और वह इसे केवल उन्हीं को प्रदान करता है जो सच्चे दिल से तौबा करें और ईमान लाएँ। किसी नबी या वली की प्रार्थना भी उन लोगों के काम नहीं आ सकती जो कुफ़्र और अवज्ञा पर अड़े रहें।
- यह मुनाफ़िक़ों के खतरे को उजागर करती है — वे बाहरी रूप से मुसलमान दिखते हैं, लेकिन उनका दिल कुफ़्र से भरा होता है, और अल्लाह उनके आंतरिक हाल को जानता है।
- इस आयत से यह भी पता चलता है कि अल्लाह की सुन्नत (रीति) यह है कि वह फ़ासिक़ों (अवज्ञाकारियों) को हिदायत नहीं देता — यह उनके स्वयं के कर्मों का परिणाम है, क्योंकि उन्होंने सत्य को जानते हुए भी उसे अस्वीकार किया।
- यह हमें सिखाती है कि दूसरों के लिए दुआ करना अच्छा है, लेकिन यदि कोई व्यक्ति स्वयं सुधार नहीं चाहता और कुफ़्र पर अड़ा है, तो उसके लिए दुआ बेकार है। सच्ची मदद उसे सत्य का मार्ग दिखाना और उसे अच्छाई की ओर बुलाना है।
- यह आयत मुसलमानों को यह भी बताती है कि अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो उसकी ओर लौटते हैं, और उसकी पकड़ उन लोगों के लिए है जो उसकी अवज्ञा करते हैं — यह न्याय और हिकमत पर आधारित है।
📜 आयत 78-82 — सूरा अत-तौबा
अनुवाद — अत-तौबा 80
सूरा अत-तौबा आयत 80 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : (ऐ रसूल) ख्वाह तुम उन (मुनाफिक़ों) के लिए मग़फिरत की…सूरा आयत 80/129 — सूरा अत-तौबा التوبة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अत-तौबा सुनें, सूरा अत-तौबा अनुवाद, सूरा अत-तौबा mp3, सूरा अत-तौबा pdf. आयत 78–82. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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