यूनुस · 32/109
अनुवाद उच्चारण — सूरा यूनुस
فَذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمُ الْحَقُّ ۖ فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ إِلَّا الضَّلَالُ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ ۝٣٢
Fazaalikumul laahu Rabbukumul haqq; famaazaa ba`dal haqqi illad dalaalu fa annnaa tusrafoon
📖 हिंदी अर्थ
फिर वही ख़ुदा तो तुम्हारा सच्चा रब है फिर हक़ बात के बाद गुमराही के सिवा और क्या है फिर तुम कहाँ फिरे चले जा रहे हो

M Mishary Rashid Alafasy ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • فَذَٰلِكُمُ – तो वही है (वह सर्वोच्च सत्ता)
  • الْحَقُّ – सत्य, जो वास्तविकता पर आधारित हो
  • الضَّلَالُ – पथभ्रष्टता, सत्य से भटक जाना
  • فَأَنَّىٰ – तो कैसे / किस प्रकार
  • تُصْرَفُونَ – तुम्हें फेरा जा रहा है (सत्य से विमुख किया जा रहा है)

विस्तृत व्याख्या:

अल्लाह तआला इस आयत में अपनी महान शक्ति और एकत्व के प्रमाण प्रस्तुत करने के बाद फ़रमाता है कि यही वह अल्लाह है जो तुम्हारा रब है, जो सत्य है। वही सच्चा मालिक और पालनहार है, जिसकी इबादत के योग्य कोई और नहीं। उसकी सत्ता, उसके गुण और उसके कार्य — सब कुछ सत्य पर आधारित है। उसके सिवा जो कुछ भी है, वह सब असत्य और मिथ्या है।

फिर अल्लाह तआला एक अत्यंत स्पष्ट और तार्किक प्रश्न उठाता है: "सत्य के बाद और क्या है, सिवाय पथभ्रष्टता के?" इसका अर्थ यह है कि सत्य और असत्य के बीच कोई तीसरा विकल्प नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सत्य को नहीं अपनाता, तो वह स्वतः ही असत्य और भ्रम में पड़ जाता है। यह एक द्वंद्वात्मक (दो-विकल्पीय) स्थिति है — या तो सत्य होगा या फिर पथभ्रष्टता। कोई बीच का रास्ता नहीं है।

इसके बाद अल्लाह तआला आश्चर्य व्यक्त करता है: "तो तुम कहाँ से फेरे जा रहे हो?" अर्थात् जब सत्य इतना स्पष्ट है, उसके प्रमाण इतने उजागर हैं, तो फिर तुम्हें किस प्रकार सत्य से हटाकर असत्य की ओर मोड़ा जा रहा है? तुम्हारी बुद्धि और समझ पर क्या बीती कि तुम सत्य को छोड़कर मिथ्या की ओर जा रहे हो? यह एक लाक्षणिक प्रश्न है जो उनकी बुद्धि पर आश्चर्य प्रकट करता है।

शिक्षाएँ एवं लाभ:

  1. सत्य का एकमात्र स्रोत अल्लाह है — यह आयत हमें सिखाती है कि सत्य केवल अल्लाह और उसका मार्ग है। उसके सिवा हर चीज़ असत्य है। यह विश्वास मुसलमान को जीवन में एक स्पष्ट दिशा प्रदान करता है।
  2. मध्यमार्ग का भ्रम — इस आयत से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धर्म के मामले में "बीच का रास्ता" नहीं होता। या तो आप सत्य पर हैं या फिर असत्य पर। यह स्पष्टता मुसलमान को अपने ईमान में दृढ़ता प्रदान करती है।
  3. तर्क और बुद्धि का उपयोग — अल्लाह तआला इस आयत में तर्कसंगत प्रश्न पूछकर हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करने की प्रेरणा देता है। इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो अंधानुकरण नहीं, बल्कि समझदारी और विवेक पर आधारित है।
  4. कृतज्ञता का पाठ — जब हमें सत्य मिला है, तो यह अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है। हमें इस नेमत की क़द्र करनी चाहिए और उस पर स्थिर रहना चाहिए।
  5. सत्य की ओर बुलाना — यह आयत हमें सिखाती है कि जो लोग सत्य से भटके हुए हैं, उन्हें प्रेम और तर्क के साथ सत्य की ओर बुलाना चाहिए, क्योंकि सत्य के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय पथभ्रष्टता के।
  6. अल्लाह की महानता का अनुभव — जब हम यह समझते हैं कि अल्लाह ही सत्य है और उसके सिवा सब कुछ मिथ्या है, तो हमारा दिल उसकी ओर झुकता है और हम उसकी इबादत में सुकून पाते हैं। यही सच्ची सफलता है।


📜 आयत 30-34 — सूरा यूनुस

30هُنَالِكَ تَبْلُو كُلُّ نَفْسٍ مَّا أَسْلَفَتْ ۚ وَرُدُّوا إِلَى اللَّهِ مَوْلَاهُمُ الْحَقِّ ۖ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ
(ग़रज़) वहाँ हर शख़्श जो कुछ जिसने पहले (दुनिया में) किया है जाँच लेगा और वह सब के सब अपने सच्चे मालिक ख़ुदा की बारगाह में लौटकर लाए जाएँगें और (दुनिया में) जो कुछ इफ़तेरा परदाज़िया (झूठी बातें) करते थे सब उनके पास से चल चंपत हो जाएगें
31قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ أَمَّن يَمْلِكُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَمَن يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَمَن يُدَبِّرُ الْأَمْرَ ۚ فَسَيَقُولُونَ اللَّهُ ۚ فَقُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ
ऐ रसूल तुम उने ज़रा पूछो तो कि तुम्हें आसमान व ज़मीन से कौन रोज़ी देता है या (तुम्हारे) कान और (तुम्हारी) ऑंखों का कौन मालिक है और कौन शख़्श मुर्दे से ज़िन्दा को निकालता है और ज़िन्दा से मुर्दे को निकालता है और हर अम्र (काम) का बन्दोबस्त कौन करता है तो फौरन बोल उठेंगे कि ख़ुदा (ऐ रसूल) तुम कहो तो क्या तुम इस पर भी (उससे) नहीं डरते हो
32فَذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمُ الْحَقُّ ۖ فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ إِلَّا الضَّلَالُ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ
फिर वही ख़ुदा तो तुम्हारा सच्चा रब है फिर हक़ बात के बाद गुमराही के सिवा और क्या है फिर तुम कहाँ फिरे चले जा रहे हो
33كَذَٰلِكَ حَقَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى الَّذِينَ فَسَقُوا أَنَّهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
ये तुम्हारे परवरदिगार की बात बदचलन लोगों पर साबित होकर रही कि ये लोग हरगिज़ ईमान न लाएँगें
34قُلْ هَلْ مِن شُرَكَائِكُم مَّن يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ۚ قُلِ اللَّهُ يَبْدَأُ الْخَلْقَ ثُمَّ يُعِيدُهُ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
(ऐ रसूल) उनसे पूछो तो कि तुम ने जिन लोगों को (ख़ुदा का) शरीक बनाया है कोई भी ऐसा है जो मख़लूकात को पहली बार पैदा करे फिर उन को (मरने के बाद) दोबारा ज़िन्दा करे (तो क्या जवाब देगें) तुम्ही कहो कि ख़ुदा ही पहले भी पैदा करता है फिर वही दोबारा ज़िन्दा करता है तो किधर तुम उल्टे जा रहे हो
यूनुसकुरान सूची
109आयत
मक्कीअवतरण स्थान
32आयत

अनुवाद — यूनुस 32

सूरा यूनुस आयत 32 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : फिर वही ख़ुदा तो तुम्हारा सच्चा रब है फिर हक़…

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Thursday, October 1, 2026

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