हूद · 106/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
فَأَمَّا الَّذِينَ شَقُوا فَفِي النَّارِ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَشَهِيقٌ ۝١٠٦
Fa ammal lazeena shaqoo fafin Naari lahum feehaa zafeerunw wa shaheeq
📖 हिंदी अर्थ
तो जो लोग बदबख्त है वह दोज़ख़ में होगें और उसी में उनकी हाए वाए और चीख़ पुकार होगी
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • زَفِيرٌ (ज़फ़ीर): साँस को ज़ोर से बाहर निकालना, जो दर्द और पीड़ा की वजह से होता है।
  • شَهِيقٌ (शहीक़): साँस को ज़ोर से अंदर खींचना, जो हालत की सख्ती और बेचैनी को दर्शाता है।

तफ़सीर (व्याख्या):

जिन लोगों ने दुनिया में कुफ़्र (इनकार) और बुरे आमाल (कर्मों) के ज़रिए अपने लिए शक़ावत (बदबख़्ती) का रास्ता अपनाया, उनका अंजाम यह होगा कि वे आग (जहन्नम) में डाले जाएँगे। वहाँ उनके लिए ज़फ़ीर और शहीक़ होगा — यानी उनकी साँसें इस कदर बेचैन और दर्दनाक होंगी कि वे न तो साँस को आराम से बाहर निकाल सकेंगे और न ही अंदर ले सकेंगे। यह आवाज़ें सबसे भयानक और कुरूप होती हैं, जो इंसान की हालत की सख्ती को ज़ाहिर करती हैं। यह अज़ाब हमेशा के लिए है — वे इसी हालत में हमेशा रहेंगे, जब तक आसमान और ज़मीन क़ायम हैं। उनका अज़ाब कभी खत्म नहीं होगा और न ही उन्हें कोई राहत मिलेगी। हालाँकि, अल्लाह की मर्ज़ी यह है कि जिन मोमिनों ने गुनाह किए हैं, वे एक मुद्दत के बाद आग से निकाल लिए जाएँगे, लेकिन काफ़िरों के लिए यह अज़ाब हमेशा के लिए है। अल्लाह जो चाहता है, वही करता है, और उसके फ़ैसले से कोई टकरा नहीं सकता।

फ़ायदे (सबक़):

  1. यह आयत हमें यह समझाती है कि दुनिया में हमारा अमल (कर्म) ही हमारी आख़िरत की किस्मत तय करता है। जो लोग अल्लाह की नाफ़रमानी करते हैं और उसके हुक्मों को ठुकराते हैं, वे इसी तरह की भयानक सज़ा के हक़दार बनते हैं।
  2. ज़फ़ीर और शहीक़ का ज़िक्र हमें अहमियत देता है कि हम अपनी ज़िंदगी में अल्लाह की रहमत और मग़फ़िरत के तलबगार रहें, क्योंकि आख़िरत का अज़ाब बेहद सख्त और दर्दनाक है।
  3. यह आयत मोमिनों के लिए एक चेतावनी है कि वे गुनाहों से बचें और तौबा करते रहें, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन लोगों के लिए है जो उसकी तरफ़ रुजू करते हैं। साथ ही, यह हमें अल्लाह की क़ुदरत और उसके फ़ैसले के आगे सर झुकाने की तालीम देती है।
🎧 सुनें

📜 आयत 104-108 — हूद

104وَمَا نُؤَخِّرُهُ إِلَّا لِأَجَلٍ مَّعْدُودٍ
और हम बस एक मुअय्युन मुद्दत तक इसमें देर कर रहे है
105يَوْمَ يَأْتِ لَا تَكَلَّمُ نَفْسٌ إِلَّا بِإِذْنِهِ ۚ فَمِنْهُمْ شَقِيٌّ وَسَعِيدٌ
जिस दिन वह आ पहुँचेगा तो बग़ैर हुक्मे ख़ुदा कोई शख़्श बात भी तो नहीं कर सकेगा फिर कुछ लोग उनमे से बदबख्त होगें और कुछ लोग नेक बख्त
106فَأَمَّا الَّذِينَ شَقُوا فَفِي النَّارِ لَهُمْ فِيهَا زَفِيرٌ وَشَهِيقٌ
तो जो लोग बदबख्त है वह दोज़ख़ में होगें और उसी में उनकी हाए वाए और चीख़ पुकार होगी
107خَالِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ إِلَّا مَا شَاءَ رَبُّكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ فَعَّالٌ لِّمَا يُرِيدُ
वह लोग जब तक आसमान और ज़मीन में है हमेशा उसी मे रहेगें मगर जब तुम्हारा परवरदिगार (नजात देना) चाहे बेशक तुम्हारा परवरदिगार जो चाहता है कर ही डालता है
108۞ وَأَمَّا الَّذِينَ سُعِدُوا فَفِي الْجَنَّةِ خَالِدِينَ فِيهَا مَا دَامَتِ السَّمَاوَاتُ وَالْأَرْضُ إِلَّا مَا شَاءَ رَبُّكَ ۖ عَطَاءً غَيْرَ مَجْذُوذٍ
और जो लोग नेक बख्त हैं वह तो बेहश्त में होगें (और) जब तक आसमान व ज़मीन (बाक़ी) है वह हमेशा उसी में रहेगें मगर जब तेरा परवरदिगार चाहे (सज़ा देकर आख़िर में जन्नत में ले जाए
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अनुवाद — हूद 106

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Tuesday, August 18, 2026

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