हूद · 31/123
अनुवाद उच्चारण — हूद
وَلَا أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَائِنُ اللَّهِ وَلَا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَا أَقُولُ إِنِّي مَلَكٌ وَلَا أَقُولُ لِلَّذِينَ تَزْدَرِي أَعْيُنُكُمْ لَن يُؤْتِيَهُمُ اللَّهُ خَيْرًا ۖ اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا فِي أَنفُسِهِمْ ۖ إِنِّي إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ ۝٣١
Wa laa aqoolu lakum `indee khazaa`inul laahi wa laaa a`lamul ghaiba wa laa aqoolu inee malakunw wa laaa aqoolu lillazeena tazdareee a`yunukum lai yu`tiyahumul laahu khairan Allaahu a`lamu bimaa feee anfusihim innee izal laminaz zaalimeen
📖 हिंदी अर्थ
और मै तो तुमसे ये नहीं कहता कि मेरे पास खुदाई ख़ज़ाने हैं और न (ये कहता हूँ कि) मै ग़ैब वॉ हूँ (गैब का जानने वाला) और ये कहता हूँ कि मै फरिश्ता हूँ और जो लोग तुम्हारी नज़रों में ज़लील हैं उन्हें मै ये नहीं कहता कि ख़ुदा उनके साथ हरगिज़ भलाई नहीं करेगा उन लोगों के दिलों की बात ख़ुदा ही खूब जानता है और अगर मै ऐसा कहूँ तो मै भी यक़ीनन ज़ालिम हूँ
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • خَزَائِنُ اللهِ: अल्लाह के ख़ज़ाने, यानी रिज़्क़ और रहमत के भंडार।
  • أَعْلَمُ الْغَيْبَ: मैं छिपी हुई बातों (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ।
  • تَزْدَرِي أَعْيُنُكُمْ: जिन्हें तुम्हारी आँखें हेय (तुच्छ) समझती हैं, यानी जिन्हें तुम लोग घृणा की दृष्टि से देखते हो।
  • الظَّالِمِينَ: अत्याचारी, जो अपनी जगह से हटकर ज़ुल्म करें।

तफ़सीर (व्याख्या):

हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) अपनी क़ौम के सरदारों से फ़रमा रहे हैं, जो उन पर आरोप लगा रहे थे कि तू अपने पास अल्लाह के ख़ज़ाने रखता है, ग़ैब जानता है, या कोई फ़रिश्ता है। वे इन सब बातों से साफ़ इनकार करते हुए कहते हैं: "मैं तुमसे यह नहीं कहता कि मेरे पास अल्लाह के ख़ज़ाने हैं, जिनसे मैं जो चाहूँ खर्च करूँ, और न मैं ग़ैब (छिपी हुई बातों) का ज्ञान रखता हूँ कि तुम्हें भविष्य की ख़बरें दूँ, और न मैं यह दावा करता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो बस तुम्हारे जैसा एक इंसान हूँ, जिसे अल्लाह ने रिसालत (पैग़म्बरी) के लिए चुना है।"

फिर वे उन कमज़ोर और ग़रीब मोमिनों के बारे में फ़रमाते हैं, जिन्हें क़ौम के बड़े लोग हेय समझते थे और कहते थे कि इन्हें अल्लाह कोई भलाई नहीं देगा। नूह (अलैहिस्सलाम) कहते हैं: "मैं उन लोगों के बारे में भी यह नहीं कहता कि अल्लाह उन्हें कोई भलाई (ईमान, हिदायत, या दुनिया का रिज़्क़) नहीं देगा। अल्लाह ही बेहतर जानता है जो कुछ उनके दिलों में है। वे सच्चे मोमिन हैं या नहीं, यह अल्लाह ही जानता है। अगर मैं उन्हें बुरा कहूँ या उनके बारे में ऐसी बात कहूँ जो मुझे नहीं पता, तो मैं ज़ालिमों (अत्याचारियों) में से हो जाऊँगा।"

यानी नूह (अलैहिस्सलाम) ने अपनी बराअत (पवित्रता) और सच्चाई को साबित किया कि वे न तो कोई ऐसा दावा करते हैं जो उनका हक़ नहीं, और न ही किसी मोमिन के बारे में बुरा कहते हैं। वे सिर्फ़ अल्लाह का पैग़ाम पहुँचाने वाले हैं।

फ़ायदे (उपदेश):

  1. पैग़म्बर और दावत देने वाले को चाहिए कि वह अपनी हैसियत से बढ़कर कोई दावा न करे, और लोगों को सिर्फ़ अल्लाह की तरफ़ बुलाए, न कि अपनी तरफ़।
  2. किसी इंसान के बारे में उसकी सूरत, माल या दुनिया की हैसियत देखकर फ़ैसला नहीं करना चाहिए। असली इज़्ज़त अल्लाह के पास है, और वही दिलों के हाल जानता है।
  3. मोमिन को चाहिए कि वह कमज़ोर और ग़रीब लोगों की इज़्ज़त करे, उन्हें हेय न समझे, क्योंकि अल्लाह के नज़दीक सबसे प्यारे वही लोग हैं जो सच्चे दिल से ईमान लाए।
  4. ग़ैब का इल्म सिर्फ़ अल्लाह को है। किसी इंसान को यह दावा नहीं करना चाहिए कि वह भविष्य या छिपी बातें जानता है।
  5. ज़ुल्म सिर्फ़ ज़मीन पर ज़बरदस्ती करना नहीं है, बल्कि किसी के बारे में बिना जाने बुरा गुमान करना और उसे नीचा दिखाना भी ज़ुल्म है।
🎧 सुनें

📜 आयत 29-33 — हूद

29وَيَا قَوْمِ لَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مَالًا ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۚ وَمَا أَنَا بِطَارِدِ الَّذِينَ آمَنُوا ۚ إِنَّهُم مُّلَاقُو رَبِّهِمْ وَلَٰكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ
और तुम हो कि उसको नापसन्द किए जाते हो और ऐ मेरी क़ौम मैं तो तुमसे इसके सिले में कुछ माल का तालिब नहीं मेरी मज़दूरी तो सिर्फ ख़ुदा के ज़िम्मे है और मै तो तुम्हारे कहने से उन लोगों को जो ईमान ला चुके हैं निकाल नहीं सकता (क्योंकि) ये लोग भी ज़रुर अपने परवरदिगार के हुज़ूर में हाज़िर होगें मगर मै तो देखता हूँ कि कुछ तुम ही लोग (नाहक़) जिहालत करते हो
30وَيَا قَوْمِ مَن يَنصُرُنِي مِنَ اللَّهِ إِن طَرَدتُّهُمْ ۚ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
और मेरी क़ौम अगर मै इन (बेचारे ग़रीब) (ईमानदारों) को निकाल दूँ तो ख़ुदा (के अज़ाब) से (बचाने में) मेरी मदद कौन करेगा तो क्या तुम इतना भी ग़ौर नहीं करते
31وَلَا أَقُولُ لَكُمْ عِندِي خَزَائِنُ اللَّهِ وَلَا أَعْلَمُ الْغَيْبَ وَلَا أَقُولُ إِنِّي مَلَكٌ وَلَا أَقُولُ لِلَّذِينَ تَزْدَرِي أَعْيُنُكُمْ لَن يُؤْتِيَهُمُ اللَّهُ خَيْرًا ۖ اللَّهُ أَعْلَمُ بِمَا فِي أَنفُسِهِمْ ۖ إِنِّي إِذًا لَّمِنَ الظَّالِمِينَ
और मै तो तुमसे ये नहीं कहता कि मेरे पास खुदाई ख़ज़ाने हैं और न (ये कहता हूँ कि) मै ग़ैब वॉ हूँ (गैब का जानने वाला) और ये कहता हूँ कि मै फरिश्ता हूँ और जो लोग तुम्हारी नज़रों में ज़लील हैं उन्हें मै ये नहीं कहता कि ख़ुदा उनके साथ हरगिज़ भलाई नहीं करेगा उन लोगों के दिलों की बात ख़ुदा ही खूब जानता है और अगर मै ऐसा कहूँ तो मै भी यक़ीनन ज़ालिम हूँ
32قَالُوا يَا نُوحُ قَدْ جَادَلْتَنَا فَأَكْثَرْتَ جِدَالَنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
वह लोग कहने लगे ऐ नूह तुम हम से यक़ीनन झगड़े और बहुत झगड़े फिर तुम सच्चे हो तो जिस (अज़ाब) की तुम हमें धमकी देते थे हम पर ला चुको
33قَالَ إِنَّمَا يَأْتِيكُم بِهِ اللَّهُ إِن شَاءَ وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ
नूह ने कहा अगर चाहेगा तो बस ख़ुदा ही तुम पर अज़ाब लाएगा और तुम लोग किसी तरह उसे हरा नहीं सकते और अगर मै चाहूँ तो तुम्हारी (कितनी ही) ख़ैर ख्वाही (भलाई) करुँ
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अनुवाद — हूद 31

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Tuesday, August 18, 2026

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