अल-कहफ · 15/110
अनुवाद उच्चारण — अल-कहफ
هَٰؤُلَاءِ قَوْمُنَا اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ آلِهَةً ۖ لَّوْلَا يَأْتُونَ عَلَيْهِم بِسُلْطَانٍ بَيِّنٍ ۖ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا ۝١٥
Haaa`ulaaa`i qawmunat takhazoo min dooniheee aalihatal law laa yaatoona `alaihim bisultaanim baiyin; faman azlamu mimmaniftaraa `alal laahi kazibaa
📖 हिंदी अर्थ
अगर हम ऐसा करे तो यक़ीनन हमने अक़ल से दूर की बात कही (अफसोस एक) ये हमारी क़ौम के लोग हैं कि जिन्होनें ख़ुदा को छोड़कर (दूसरे) माबूद बनाए हैं (फिर) ये लोग उनके (माबूद होने) की कोई सरीही (खुली) दलील क्यों नहीं पेश करते और जो शख़्श ख़ुदा पर झूट बोहतान बाँधे उससे ज्यादा ज़ालिम और कौन होगा

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अनुवाद — Tafsir

ये हैं हमारी क़ौम के लोग जिन्होंने अल्लाह को छोड़कर दूसरे माबूद (पूज्य) बना लिए हैं। वे अपनी इन पूज्य वस्तुओं पर कोई स्पष्ट दलील और प्रमाण क्यों नहीं लाते? अल्लाह पर झूठ बोलने और उसके साथ साझीदार ठहराने से बढ़कर ज़ालिम और कोई नहीं हो सकता।

इस आयत में उन नौजवानों (अहले-कहफ) का ज़िक्र है जिन्होंने अपनी क़ौम के सामने सच्चाई पेश की। उन्होंने देखा कि उनकी क़ौम बिना किसी प्रमाण के मूर्तियों की पूजा कर रही है। उन्होंने साफ़ कहा कि अगर इन मूर्तियों की पूजा सच्ची होती तो उनके पास कोई ठोस सबूत होता। लेकिन उनके पास कोई दलील नहीं, सिर्फ अंधी परंपरा और पूर्वजों की नकल है।

यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चाई की पहचान के लिए दलील और प्रमाण ज़रूरी है, सिर्फ रिवायत या अंधी परंपरा पर चलना सही नहीं। जो लोग बिना ज्ञान के अल्लाह के बारे में झूठी बातें कहते हैं या उसके साथ किसी को साझीदार ठहराते हैं, वे सबसे बड़े ज़ालिम हैं।

इस आयत से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने ईमान और अक़ीदे को दलील और ज्ञान की बुनियाद पर खड़ा करना चाहिए। अल्लाह ने हमें अक्ल और समझ दी है ताकि हम सच्चाई को पहचानें। जो लोग सच्चाई को जानकर भी उस पर अमल नहीं करते, वे खुद पर ज़ुल्म करते हैं। लेकिन जो लोग सच्चाई की तलाश में निकलते हैं, अल्लाह उन्हें हिदायत देता है और उनके दिलों को सुकून अता करता है, जैसा कि उन नौजवानों को मिला जिन्होंने अपने रब पर भरोसा किया और उनकी हिफाज़त की गई।



📜 आयत 13-17 — अल-कहफ

13نَّحْنُ نَقُصُّ عَلَيْكَ نَبَأَهُم بِالْحَقِّ ۚ إِنَّهُمْ فِتْيَةٌ آمَنُوا بِرَبِّهِمْ وَزِدْنَاهُمْ هُدًى
(ऐ रसूल) अब हम उनका हाल तुमसे बिल्कुल ठीक तहक़ीक़ातन (यक़ीन के साथ) बयान करते हैं वह चन्द जवान थे कि अपने (सच्चे) परवरदिगार पर ईमान लाए थे और हम ने उनकी सोच समझ और ज्यादा कर दी है
14وَرَبَطْنَا عَلَىٰ قُلُوبِهِمْ إِذْ قَامُوا فَقَالُوا رَبُّنَا رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَن نَّدْعُوَ مِن دُونِهِ إِلَٰهًا ۖ لَّقَدْ قُلْنَا إِذًا شَطَطًا
और हमने उनकी दिलों पर (सब्र व इस्तेक़लाल की) गिराह लगा दी (कि जब दक़ियानूस बादशाह ने कुफ्र पर मजबूर किया) तो उठ खड़े हुए (और बे ताम्मुल (खटके)) कहने लगे हमारा परवरदिगार तो बस सारे आसमान व ज़मीन का मालिक है हम तो उसके सिवा किसी माबूद की हरगिज़ इबादत न करेगें
15هَٰؤُلَاءِ قَوْمُنَا اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ آلِهَةً ۖ لَّوْلَا يَأْتُونَ عَلَيْهِم بِسُلْطَانٍ بَيِّنٍ ۖ فَمَنْ أَظْلَمُ مِمَّنِ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا
अगर हम ऐसा करे तो यक़ीनन हमने अक़ल से दूर की बात कही (अफसोस एक) ये हमारी क़ौम के लोग हैं कि जिन्होनें ख़ुदा को छोड़कर (दूसरे) माबूद बनाए हैं (फिर) ये लोग उनके (माबूद होने) की कोई सरीही (खुली) दलील क्यों नहीं पेश करते और जो शख़्श ख़ुदा पर झूट बोहतान बाँधे उससे ज्यादा ज़ालिम और कौन होगा
16وَإِذِ اعْتَزَلْتُمُوهُمْ وَمَا يَعْبُدُونَ إِلَّا اللَّهَ فَأْوُوا إِلَى الْكَهْفِ يَنشُرْ لَكُمْ رَبُّكُم مِّن رَّحْمَتِهِ وَيُهَيِّئْ لَكُم مِّنْ أَمْرِكُم مِّرْفَقًا
(फिर बाहम कहने लगे कि) जब तुमने उन लोगों से और ख़ुदा के सिवा जिन माबूदों की ये लोग परसतिश करते हैं उनसे किनारा कशी करली तो चलो (फलॉ) ग़ार में जा बैठो और तुम्हारा परवरदिगार अपनी रहमत तुम पर वसीह कर देगा और तुम्हारा काम में तुम्हारे लिए आसानी के सामान मुहय्या करेगा
17۞ وَتَرَى الشَّمْسَ إِذَا طَلَعَت تَّزَاوَرُ عَن كَهْفِهِمْ ذَاتَ الْيَمِينِ وَإِذَا غَرَبَت تَّقْرِضُهُمْ ذَاتَ الشِّمَالِ وَهُمْ فِي فَجْوَةٍ مِّنْهُ ۚ ذَٰلِكَ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ ۗ مَن يَهْدِ اللَّهُ فَهُوَ الْمُهْتَدِ ۖ وَمَن يُضْلِلْ فَلَن تَجِدَ لَهُ وَلِيًّا مُّرْشِدًا
(ग़रज़ ये ठान कर ग़ार में जा पहुँचे) कि जब सूरज निकलता है तो देखेगा कि वह उनके ग़ार से दाहिनी तरफ झुक कर निकलता है और जब ग़ुरुब (डुबता) होता है तो उनसे बायीं तरफ कतरा जाता है और वह लोग (मजे से) ग़ार के अन्दर एक वसीइ (बड़ी) जगह में (लेटे) हैं ये ख़ुदा (की कुदरत) की निशानियों में से (एक निशानी) है जिसको हिदायत करे वही हिदायत याफ्ता है और जिस को गुमराह करे तो फिर उसका कोई सरपरस्त रहनुमा हरगिज़ न पाओगे
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अनुवाद — अल-कहफ 15

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Tuesday, August 18, 2026

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