अल-बकरा · 121/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَٰئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ ۝١٢١
Allazeena aatainaahumul Kitaaba yatloonahoo haqqa tilaawatiheee ulaaa`ika yu`minoona bi; wa mai yakfur bihee fa ulaaa`ika humul khaasiroon
📖 हिंदी अर्थ
जिन लोगों को हमने किताब (कुरान) दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार करते हैं वही लोग घाटे में हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ: इसे पढ़ें जैसा कि इसे उतारा गया है, बिना किसी बदलाव या विकृति के, और इसके आदेशों का पालन करें।
  • الْخَاسِرُونَ: वे लोग जिन्होंने अपना नुकसान किया, और अल्लाह की रहमत से वंचित रहे।

तफसीर (व्याख्या):

अल्लाह तआला उन लोगों का ज़िक्र कर रहा है जिन्हें उसने किताब (तौरात और इंजील) दी थी। उनमें से कुछ ऐसे हैं जो इस किताब को सही तरीके से पढ़ते हैं, यानी इसे वैसे ही पढ़ते हैं जैसे इसे उतारा गया था, बिना किसी शब्द को बदले या छिपाए। वे इसके आदेशों का पालन करते हैं और इसकी शिक्षाओं पर अमल करते हैं। ये वही लोग हैं जो इस किताब में मौजूद सच्चाई को पहचानते हैं, जिसमें अल्लाह के सभी रसूलों पर ईमान लाना शामिल है, और उनमें से आखिरी रसूल मुहम्मद ﷺ पर भी ईमान लाना शामिल है, क्योंकि उनकी नबुव्वत की निशानियाँ उन किताबों में मौजूद थीं। ये लोग सच्चे मोमिन हैं।

लेकिन जिन लोगों ने अपनी किताबों में बदलाव किया, उनके शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा, और उनमें से कुछ हिस्सों को छिपाया, उन्होंने मुहम्मद ﷺ पर ईमान नहीं लाया और उन पर कुफ्र किया। ऐसे लोग सबसे बड़े नुकसान में हैं, क्योंकि उन्होंने सीधे रास्ते के बदले गुमराही को चुना, और अल्लाह की तरफ से मिलने वाले इनाम को खो दिया। उनका यह नुकसान सबसे बड़ा है, क्योंकि उन्होंने दुनिया और आखिरत दोनों को खो दिया।

फायदे और सबक:

  1. सिर्फ किताब पढ़ना काफी नहीं है, बल्कि उसे सही तरीके से पढ़ना और उस पर अमल करना जरूरी है। सही तिलावत का मतलब है कि किताब को समझना, उसके आदेशों का पालन करना, और उसकी हिदायतों को अपनी जिंदगी में लागू करना।
  2. जो लोग अपनी किताबों को सही तरीके से पढ़ते और उन पर अमल करते हैं, वे सच्चाई को पहचान लेते हैं और अल्लाह के आखिरी रसूल ﷺ पर ईमान ले आते हैं। यह दिखाता है कि सच्चाई की तलाश और उस पर अमल करने से इंसान सही रास्ते पर आ जाता है।
  3. किताबों में बदलाव करना, शब्दों को तोड़ना-मरोड़ना, और सच्चाई को छिपाना बहुत बड़ा गुनाह है, जो इंसान को अल्लाह की रहमत से दूर कर देता है।
  4. कुफ्र और सच्चाई से मुंह मोड़ने का अंजाम सबसे बड़ा नुकसान है — यह दुनिया और आखिरत दोनों में इंसान को बर्बाद कर देता है।
  5. यह आयत हमें सिखाती है कि अल्लाह की किताब के साथ हमारा रिश्ता सिर्फ पढ़ने का नहीं, बल्कि समझने, उस पर अमल करने, और उसके जरिए सच्चाई को अपनाने का होना चाहिए। यही वह रास्ता है जो हमें सच्ची कामयाबी और अल्लाह की रहमत तक पहुंचाता है।


📜 आयत 119-123 — अल-बकरा

119إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ بِالْحَقِّ بَشِيرًا وَنَذِيرًا ۖ وَلَا تُسْأَلُ عَنْ أَصْحَابِ الْجَحِيمِ
(ऐ रसूल) हमने तुमको दीने हक़ के साथ (बेहिश्त की) खुशख़बरी देने वाला और (अज़ाब से) डराने वाला बनाकर भेजा है और दोज़ख़ियों के बारे में तुमसे कुछ न पूछा जाएगा
120وَلَن تَرْضَىٰ عَنكَ الْيَهُودُ وَلَا النَّصَارَىٰ حَتَّىٰ تَتَّبِعَ مِلَّتَهُمْ ۗ قُلْ إِنَّ هُدَى اللَّهِ هُوَ الْهُدَىٰ ۗ وَلَئِنِ اتَّبَعْتَ أَهْوَاءَهُم بَعْدَ الَّذِي جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ ۙ مَا لَكَ مِنَ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
और (ऐ रसूल) न तो यहूदी कभी तुमसे रज़ामंद होगे न नसारा यहाँ तक कि तुम उनके मज़हब की पैरवी करो (ऐ रसूल उनसे) कह दो कि बस खुदा ही की हिदायत तो हिदायत है (बाक़ी ढकोसला है) और अगर तुम इसके बाद भी कि तुम्हारे पास इल्म (क़ुरान) आ चुका है उनकी ख्वाहिशों पर चले तो (याद रहे कि फिर) तुमको खुदा (के ग़ज़ब) से बचाने वाला न कोई सरपरस्त होगा न मददगार
121الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ يَتْلُونَهُ حَقَّ تِلَاوَتِهِ أُولَٰئِكَ يُؤْمِنُونَ بِهِ ۗ وَمَن يَكْفُرْ بِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْخَاسِرُونَ
जिन लोगों को हमने किताब (कुरान) दी है वह लोग उसे इस तरह पढ़ते रहते हैं जो उसके पढ़ने का हक़ है यही लोग उस पर ईमान लाते हैं और जो उससे इनकार करते हैं वही लोग घाटे में हैं
122يَا بَنِي إِسْرَائِيلَ اذْكُرُوا نِعْمَتِيَ الَّتِي أَنْعَمْتُ عَلَيْكُمْ وَأَنِّي فَضَّلْتُكُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ
बनी इसराईल मेरी उन नेअमतों को याद करो जो मैंनं तुम को दी हैं और ये कि मैंने तुमको सारे जहाँन पर फज़ीलत दी
123وَاتَّقُوا يَوْمًا لَّا تَجْزِي نَفْسٌ عَن نَّفْسٍ شَيْئًا وَلَا يُقْبَلُ مِنْهَا عَدْلٌ وَلَا تَنفَعُهَا شَفَاعَةٌ وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
और उस दिन से डरो जिस दिन कोई शख्स किसी की तरफ से न फिदया हो सकेगा और न उसकी तरफ से कोई मुआवेज़ा क़ुबूल किया जाएगा और न कोई सिफारिश ही फायदा पहुचाँ सकेगी, और न लोग मदद दिए जाएँगे
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीRevelation
121आयत

अनुवाद — अल-बकरा 121

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Wednesday, August 19, 2026

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