अल-बकरा · 13/286
अनुवाद उच्चारण — अल-बकरा
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا كَمَا آمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْمِنُ كَمَا آمَنَ السُّفَهَاءُ ۗ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَاءُ وَلَٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ ۝١٣
Wa izaa qeela lahum aaminoo kamaaa aamanan naasu qaalooo anu`minu kamaaa aamanas sufahaaa`; alaaa innahum humus sufahaaa`u wa laakil laa ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकूफ़ लोग ईमान लाएँ, ख़बरदार हो जाओ लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • السُّفَهَاء: बुद्धिहीन, मूर्ख, कम अक्ल वाले लोग।
  • أَلَا: सुनो! (ध्यान आकर्षित करने के लिए)
  • لَا يَعْلَمُونَ: वे जानते नहीं (अपनी वास्तविक स्थिति को)।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब मुनाफ़िक़ों (दिखावटी मुसलमानों) से कहा जाता है कि "तुम भी उसी तरह ईमान लाओ जैसे लोग (सहाबा और नेक लोग) ईमान लाए हैं"—यानी दिल, ज़ुबान और अमल से पूर्ण ईमान लाओ—तो वे अहंकार और उपहास के साथ जवाब देते हैं: "क्या हम भी उन बेवक़ूफ़ों की तरह ईमान लाएँ?" उनकी नज़र में सच्चे ईमानवाले, जिन्होंने दुनिया के मोह को छोड़कर आख़िरत को अपना लक्ष्य बनाया, मूर्ख और कम अक्ल थे। वे यह नहीं समझते थे कि असली बुद्धिमानी क्या है।

अल्लाह ने उनके इस उपहास का जवाब देते हुए फ़रमाया: "सुनो! असली मूर्ख और बुद्धिहीन वे ख़ुद हैं, लेकिन उन्हें अपनी इस हालत का एहसास नहीं है।" वे दुनिया की चंद रौनक़ों और फ़ायदों को देखकर आख़िरत की अनंत सफलता को भूल गए। उन्होंने ईमान को कमज़ोर अक्ल की निशानी समझा, जबकि यही ईमान उन्हें दुनिया और आख़िरत दोनों में इज़्ज़त देने वाला था। उनका यह सोचना कि सहाबा जैसे लोग मूर्ख हैं, उनकी अपनी नासमझी और अहंकार की पराकाष्ठा थी।

फ़ायदे (शिक्षाएँ):

  1. ईमान की हक़ीक़त: ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से कहना नहीं, बल्कि दिल से यक़ीन, ज़ुबान से इक़रार और अमल से साबित करना है। यही वह रास्ता है जो इंसान को सच्ची कामयाबी तक पहुँचाता है।
  2. उपहास का अंजाम: जो लोग अल्लाह के दीन और उसके नेक बंदों का मज़ाक उड़ाते हैं, वही असल में नुक़सान में हैं, भले ही वे ख़ुद को समझदार समझें।
  3. अक्ल का सही इस्तेमाल: असली बुद्धिमानी यह है कि इंसान अपने रब की पहचान करे और उसकी इबादत करे। दुनिया की चंद रातों की ख़ुशी के लिए आख़िरत की हमेशा की ज़िंदगी को खो देना सबसे बड़ी मूर्खता है।
  4. मुनाफ़िक़ों की पहचान: इस आयत से मालूम होता है कि मुनाफ़िक़ी सिर्फ़ छिपी हुई चीज़ नहीं, बल्कि उनके तौर-तरीक़ों और बातों से उनकी पहचान हो जाती है। वे ईमानवालों को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन अल्लाह उनकी सच्चाई उजागर कर देता है।
  5. इस्लाम की पाकीज़गी: इस्लाम एक फ़ितरत (स्वाभाविक) दीन है जो इंसान की अक्ल और दिल को संतुष्ट करता है। यह कोई अंधी परंपरा नहीं, बल्कि हर युग में सच्चे इंसानों का मार्ग है।
🎧 सुनें

📜 आयत 11-15 — अल-बकरा

11وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ لَا تُفْسِدُوا فِي الْأَرْضِ قَالُوا إِنَّمَا نَحْنُ مُصْلِحُونَ
और जब उनसे कहा जाता है कि मुल्क में फसाद न करते फिरो (तो) कहते हैं कि हम तो सिर्फ इसलाह करते हैं
12أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْمُفْسِدُونَ وَلَٰكِن لَّا يَشْعُرُونَ
ख़बरदार हो जाओ बेशक यही लोग फसादी हैं लेकिन समझते नहीं
13وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ آمِنُوا كَمَا آمَنَ النَّاسُ قَالُوا أَنُؤْمِنُ كَمَا آمَنَ السُّفَهَاءُ ۗ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ السُّفَهَاءُ وَلَٰكِن لَّا يَعْلَمُونَ
और जब उनसे कहा जाता है कि जिस तरह और लोग ईमान लाए हैं तुम भी ईमान लाओ तो कहते हैं क्या हम भी उसी तरह ईमान लाएँ जिस तरह और बेवकूफ़ लोग ईमान लाएँ, ख़बरदार हो जाओ लोग बेवक़ूफ़ हैं लेकिन नहीं जानते
14وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَوْا إِلَىٰ شَيَاطِينِهِمْ قَالُوا إِنَّا مَعَكُمْ إِنَّمَا نَحْنُ مُسْتَهْزِئُونَ
और जब उन लोगों से मिलते हैं जो ईमान ला चुके तो कहते हैं हम तो ईमान ला चुके और जब अपने शैतानों के साथ तनहा रह जाते हैं तो कहते हैं हम तुम्हारे साथ हैं हम तो (मुसलमानों को) बनाते हैं
15اللَّهُ يَسْتَهْزِئُ بِهِمْ وَيَمُدُّهُمْ فِي طُغْيَانِهِمْ يَعْمَهُونَ
(वह क्या बनाएँगे) खुदा उनको बनाता है और उनको ढील देता है कि वह अपनी सरकशी में ग़लत पेचाँ (उलझे) रहें
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अनुवाद — अल-बकरा 13

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Tuesday, August 18, 2026

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