Mishary Rashid Alafasy
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Mahmoud Khalil Al-Husary
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Abdurrahman As-Sudais
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Mohamed Siddiq Al-Minshawi
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Abdul Basit Abdul Samad
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Ali Al-Hudhaify
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Ahmed ibn Ali al-Ajamy
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Abu Bakr Ash-Shaatree
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Muhammad Ayyoub
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Abdullah Basfar
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Abdullah Al-Juhani
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Maher Al Muaiqly
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अनुवाद — Tafsir
शब्दों के अर्थ:
- لَقُوا: मिले
- خَلَا: अकेले में गए, एकांत में बात की
- فَتَحَ اللهُ عَلَيْكُمْ: जो अल्लाह ने तुम्हारे लिए खोला, अर्थात तुम्हें बताया और स्पष्ट किया
- لِيُحَاجُّوكُم: ताकि वे तुमसे दलील और तर्क करें
- عِندَ رَبِّكُمْ: तुम्हारे रब के पास (क़यामत के दिन)
तफ़सीर (व्याख्या):
यह आयत यहूदियों के उस गिरोह के बारे में बताती है जो मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी ईमान लाने वाले) थे। जब ये लोग मुसलमानों से मिलते थे, तो अपनी ज़बान से कहते थे: "हम ईमान लाए" — यानी हम तुम्हारे दीन और तुम्हारे रसूल पर ईमान रखते हैं, जिसका ज़िक्र तौरात में किया गया है। लेकिन जब ये आपस में अकेले में मिलते थे, तो एक-दूसरे को मलामत करते हुए कहते थे: "क्या तुम मुसलमानों को वह बातें बता देते हो जो अल्लाह ने तुम्हारी किताब (तौरात) में खोल दी हैं — यानी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सच्चाई और उनके आने की ख़बर — ताकि वे तुम्हारे रब के पास तुम्हारे ख़िलाफ़ दलील पकड़ लें? क्या तुम अक़्ल नहीं रखते?"
इन यहूदियों का हाल यह था कि वे मुसलमानों के सामने ईमान का इज़हार करते थे, लेकिन उनका दिल ईमान से खाली था। जब वे आपस में मिलते थे, तो उनके सरदार उन्हें डांटते थे कि तुमने मुसलमानों को वह राज़ क्यों बता दिए जो तौरात में मौजूद हैं? अगर ये बातें उन तक पहुँच गईं, तो वे क़यामत के दिन या इसी दुनिया में तुम्हारे ख़िलाफ़ यह हुज्जत पेश करेंगे कि तुम्हारी अपनी किताब में तो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सच्चाई लिखी हुई है, फिर तुम उनका अनुसरण क्यों नहीं करते?
यह आयत यहूदियों के मुनाफ़िक़ाना रवैये और उनकी साज़िशों को उजागर करती है, जो ईमान का दावा करके भी सच्चाई छिपाते थे और दूसरों को भी सच्चाई छिपाने की तरग़ीब देते थे।
फ़ायदे (सबक़):
- ईमान का दावा ज़बान से काफ़ी नहीं — सच्चा ईमान वह है जो दिल में हो और अमल से साबित हो। जो लोग ज़बान से ईमान कहें और दिल से झुठलाएँ, वे मुनाफ़िक़ हैं।
- सच्चाई छिपाना बुराई है — जिन लोगों को अल्लाह ने सच्चाई का इल्म दिया है, उन्हें चाहिए कि वह सच्चाई बयान करें, उसे छिपाएँ नहीं। सच्चाई छिपाने वालों पर अल्लाह की लानत है।
- अक़्ल का इस्तेमाल करना ज़रूरी है — अल्लाह ने इंसान को अक़्ल दी है ताकि वह सही और ग़लत में फ़र्क़ करे। जो लोग अपनी अक़्ल का इस्तेमाल नहीं करते, वे गुमराही में पड़े रहते हैं।
- दूसरों को सच्चाई से रोकना बड़ा गुनाह है — यहूदियों की तरह जो लोग दूसरों को सच्चाई अपनाने से रोकते हैं, वे अल्लाह के यहाँ सख़्त पकड़ में आएँगे।
- इस्लाम सच्चाई और स्पष्टता का दीन है — इस्लाम में छिपाव, धोखा और मुनाफ़िक़ी की कोई गुंजाइश नहीं। मुसलमान को सच्चा, स्पष्ट और सीधा रहना चाहिए।
📜 आयत 74-78 — सूरा अल-बकरा
अनुवाद — अल-बकरा 76
सूरा अल-बकरा आयत 76 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो…सूरा आयत 76/286 — सूरा अल-बकरा البقرة (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: सूरा अल-बकरा सुनें, सूरा अल-बकरा अनुवाद, सूरा अल-बकरा mp3, सूरा अल-बकरा pdf. आयत 74–78. हिंदी अर्थ: اردو.
पवित्र क़ुरआन
Monday, September 28, 2026
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