अल-बकरा · 75/286
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-बकरा
۞ أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِن بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ ۝٧٥
Afatatma`oona ai yu`minoo lakum wa qad kaana fareequm minhum yasma`oona Kalaamal laahi summa yuharri foonahoo mim ba`di maa`aqaloohu wa hum ya`lamoon
📖 हिंदी अर्थ
(मुसलमानों) क्या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम्हारा (सा) ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह (साबिक़ में) ऐसा था कि खुदा का कलाम सुनाता था और अच्छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खूब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं

M Mishary Rashid Alafasy ✓
M Mahmoud Khalil Al-Husary ✓
A Abdurrahman As-Sudais ✓
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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • أَفَتَطْمَعُونَ: क्या तुम लालच रखते हो / क्या तुम आशा रखते हो?
  • يُؤْمِنُوا لَكُمْ: तुम्हारी बात मानें / तुम पर ईमान लाएँ
  • فَرِيقٌ: एक समूह / एक गिरोह
  • يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللهِ: अल्लाह का कलाम (तौरात) सुनते थे
  • يُحَرِّفُونَهُ: उसे बदल देते थे / उसमें तहरीफ़ करते थे
  • مِن بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ: उसे समझने और जानने के बाद
  • وَهُمْ يَعْلَمُونَ: हालाँकि वे जानते थे

तफसीर (व्याख्या):

ऐ ईमान वालो! क्या तुम अब भी यह उम्मीद रखते हो कि यहूदी तुम्हारी बात मान लेंगे और तुम्हारे दीन पर ईमान ले आएँगे? यह कैसी आशा है, जबकि तुमने उनका हाल देखा और जाना है! उनके बुज़ुर्ग और आलिम तौरात पढ़ते थे, अल्लाह का कलाम सुनते थे, उसे अच्छी तरह समझते-बूझते थे, फिर भी वे उसे बदल देते थे। वे उसके शब्दों को उलट-पलट कर उसका अर्थ ही बदल देते थे, और यह सब कुछ जानते-बूझते हुए करते थे। उन्हें पूरा यक़ीन था कि वे झूठ बोल रहे हैं, फिर भी वे अल्लाह की आयतों को अपनी मनमानी से बदलते रहे।

यानी जिन लोगों ने खुद अल्लाह की किताब को सुनकर उसे बदला, उनसे तुम कैसे उम्मीद रख सकते हो कि वे तुम्हारे पैग़म्बर की बात मान लेंगे? उन्होंने तो अल्लाह के साथ ही यह सलूक किया, फिर इंसानों के साथ तो वे और भी बुरा करेंगे। उनके आलिमों ने अपने ज्ञान के बावजूद सच्चाई को छिपाया और उसे तोड़ा-मरोड़ा। उन्होंने अपनी किताब में मौजूद उन स्पष्ट आयतों को भी बदल दिया जो मुहम्मद ﷺ के आने की ख़बर देती थीं।

यह आयत हमें सिखाती है कि हमें लोगों की सच्चाई और उनके किरदार को देखकर ही उनसे उम्मीद रखनी चाहिए। साथ ही यह भी सबक देती है कि अल्लाह का कलाम कितना पाक और महान है, उसे बदलना या उसमें तहरीफ़ करना सबसे बड़ा गुनाह है। जो लोग अल्लाह की आयतों को जानते-बूझते हुए बदलते हैं, वे अल्लाह की नज़र में सख्त गुनाहगार हैं।

ऐ मुसलमानों! तुम्हें अपने दीन पर भरोसा रखना चाहिए और उन लोगों की परवाह नहीं करनी चाहिए जो सच्चाई को जानकर भी उसका इनकार करते हैं। अल्लाह ने तुम्हें सबसे अच्छा दीन दिया है, और जो लोग उसे ठुकराते हैं, वे अपना ही नुक़सान करते हैं। तुम अपने ईमान पर साबित-क़दम रहो और अल्लाह की रहमत की उम्मीद रखो, क्योंकि अल्लाह की रहमत उन लोगों के करीब है जो उसकी आयतों पर ईमान लाते हैं और उन पर अमल करते हैं।



📜 आयत 73-77 — सूरा अल-बकरा

73فَقُلْنَا اضْرِبُوهُ بِبَعْضِهَا ۚ كَذَٰلِكَ يُحْيِي اللَّهُ الْمَوْتَىٰ وَيُرِيكُمْ آيَاتِهِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
खुदा को उसका ज़ाहिर करना मंजूर था पस हमने कहा कि उस गाय को कोई टुकड़ा लेकर इस (की लाश) पर मारो यूँ खुदा मुर्दे को ज़िन्दा करता है और तुम को अपनी कुदरत की निशानियाँ दिखा देता है
74ثُمَّ قَسَتْ قُلُوبُكُم مِّن بَعْدِ ذَٰلِكَ فَهِيَ كَالْحِجَارَةِ أَوْ أَشَدُّ قَسْوَةً ۚ وَإِنَّ مِنَ الْحِجَارَةِ لَمَا يَتَفَجَّرُ مِنْهُ الْأَنْهَارُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَشَّقَّقُ فَيَخْرُجُ مِنْهُ الْمَاءُ ۚ وَإِنَّ مِنْهَا لَمَا يَهْبِطُ مِنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۗ وَمَا اللَّهُ بِغَافِلٍ عَمَّا تَعْمَلُونَ
ताकि तुम समझो फिर उसके बाद तुम्हारे दिल सख्त हो गये पस वह मिसल पत्थर के (सख्त) थे या उससे भी ज्यादा करख्त क्योंकि पत्थरों में बाज़ तो ऐसे होते हैं कि उनसे नहरें जारी हो जाती हैं और बाज़ ऐसे होते हैं कि उनमें दरार पड़ जाती है और उनमें से पानी निकल पड़ता है और बाज़ पत्थर तो ऐसे होते हैं कि खुदा के ख़ौफ से गिर पड़ते हैं और जो कुछ तुम कर रहे हो उससे खुदा ग़ाफिल नहीं है
75۞ أَفَتَطْمَعُونَ أَن يُؤْمِنُوا لَكُمْ وَقَدْ كَانَ فَرِيقٌ مِّنْهُمْ يَسْمَعُونَ كَلَامَ اللَّهِ ثُمَّ يُحَرِّفُونَهُ مِن بَعْدِ مَا عَقَلُوهُ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
(मुसलमानों) क्या तुम ये लालच रखते हो कि वह तुम्हारा (सा) ईमान लाएँगें हालाँकि उनमें का एक गिरोह (साबिक़ में) ऐसा था कि खुदा का कलाम सुनाता था और अच्छी तरह समझने के बाद उलट फेर कर देता था हालाँकि वह खूब जानते थे और जब उन लोगों से मुलाक़ात करते हैं
76وَإِذَا لَقُوا الَّذِينَ آمَنُوا قَالُوا آمَنَّا وَإِذَا خَلَا بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ قَالُوا أَتُحَدِّثُونَهُم بِمَا فَتَحَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ لِيُحَاجُّوكُم بِهِ عِندَ رَبِّكُمْ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
जो ईमान लाए तो कह देते हैं कि हम तो ईमान ला चुके और जब उनसे बाज़-बाज़ के साथ तख़िलया करते हैं तो कहते हैं कि जो कुछ खुदा ने तुम पर (तौरेत) में ज़ाहिर कर दिया है क्या तुम (मुसलमानों को) बता दोगे ताकि उसके सबब से कल तुम्हारे खुदा के पास तुम पर हुज्जत लाएँ क्या तुम इतना भी नहीं समझते
77أَوَلَا يَعْلَمُونَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
लेकिन क्या वह लोग (इतना भी) नहीं जानते कि वह लोग जो कुछ छिपाते हैं या ज़ाहिर करते हैं खुदा सब कुछ जानता है
अल-बकराकुरान सूची
286आयत
मदनीअवतरण स्थान
75आयत

अनुवाद — अल-बकरा 75

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Monday, September 28, 2026

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