अल-मोमिनुन · 58/118
अनुवाद उच्चारण — अल-मोमिनुन
وَالَّذِينَ هُم بِآيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ ۝٥٨
Wallazeena hum bi Aayaati Rabbihim yu`minoon
📖 हिंदी अर्थ
और जो लोग अपने परवरदिगार की (क़ुदरत की) निशानियों पर ईमान रखते हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • आयात (آيات): अल्लाह की निशानियाँ और प्रमाण, विशेष रूप से कुरआन की आयतें।
  • रब्बिहिम (ربهم): उनके पालनहार की।
  • यू'मिनून (يؤمنون): ईमान लाते हैं, पूर्ण विश्वास करते हैं।

तफ़सीर (व्याख्या):

इस आयत में अल्लाह तआला उन मोमिनिन (ईमानवालों) की विशेषता बयान कर रहा है जो सच्चे ईमान के धनी हैं। ये लोग अपने रब की आयतों पर ईमान लाते हैं—चाहे वे आयतें कुरआन की हों, जो स्पष्ट मार्गदर्शन और हिदायत का स्रोत हैं, या क़ौन (ब्रह्मांड) में फैली हुई निशानियाँ हों। वे इन आयतों को सिर्फ़ ज़बान से नहीं दोहराते, बल्कि दिल से उन्हें सच मानते हैं और उन पर अमल करते हैं। उनका ईमान अटल और दृढ़ होता है, जो उन्हें अल्लाह की इबादत, उसकी रहमत की उम्मीद और उसके अज़ाब के डर पर स्थिर रखता है।

यह ईमान उन्हें जीवन के हर क्षेत्र में सच्चाई, नेकी और परहेज़गारी की राह पर चलाता है। वे जानते हैं कि अल्लाह की आयतें ही सच्ची हैं, और उन्हीं पर उनकी कामयाबी और नजात (मुक्ति) का दारोमदार है। यही वह ईमान है जो उन्हें दुनिया में इज़्ज़त और आख़िरत में जन्नत की ऊँची मंज़िलों तक पहुँचाता है।

दावती पहलू:

प्यारे भाइयों और बहनों! यह आयत हमें सिखाती है कि सच्चा ईमान वही है जो अल्लाह की आयतों पर पूरा यक़ीन रखे और उस पर अमल करे। जब हम कुरआन की आयतें पढ़ते हैं, तो हमें उन पर ग़ौर करना चाहिए और उन्हें अपनी ज़िंदगी में उतारना चाहिए। अल्लाह की हर आयत हमारे लिए रहमत और हिदायत है। जो व्यक्ति इन आयतों पर ईमान लाता है, अल्लाह उसे सीधी राह दिखाता है, उसके दिल को सुकून देता है और उसे दुनिया और आख़िरत की भलाइयाँ अता करता है। आइए, हम सब अपने ईमान को मज़बूत करें और अल्लाह की आयतों पर अमल करके उसकी मुहब्बत और रज़ा (प्रसन्नता) हासिल करें। यही कामयाबी की कुंजी है।



📜 आयत 56-60 — अल-मोमिनुन

56نُسَارِعُ لَهُمْ فِي الْخَيْرَاتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
(ऐसा नहीं) बल्कि ये लोग समझते नहीं
57إِنَّ الَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
उसमें शक नहीं कि जो लोग अपने परवरदिगार की वहशत से लरज़ रहे है
58وَالَّذِينَ هُم بِآيَاتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
और जो लोग अपने परवरदिगार की (क़ुदरत की) निशानियों पर ईमान रखते हैं
59وَالَّذِينَ هُم بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ
और अपने परवरदिगार का किसी को शरीक नही बनाते
60وَالَّذِينَ يُؤْتُونَ مَا آتَوا وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَاجِعُونَ
और जो लोग (ख़ुदा की राह में) जो कुछ बन पड़ता है देते हैं और फिर उनके दिल को इस बात का खटका लगा हुआ है कि उन्हें अपने परवरदिगार के सामने लौट कर जाना है
अल-मोमिनुनकुरान सूची
118आयत
मक्कीRevelation
58आयत

अनुवाद — अल-मोमिनुन 58

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Tuesday, August 18, 2026

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