अन-नूर · 49/64
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नूर
وَإِن يَكُن لَّهُمُ الْحَقُّ يَأْتُوا إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ ۝٤٩
Wa iny-yakul lahumul haqqu yaatooo ilaihi muz`ineen
📖 हिंदी अर्थ
और (असल ये है कि) अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए (चुपके) रसूल के पास दौड़े हुए आते

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • مُذْعِنِينَ: आज्ञाकारी, विनम्र, झुकने वाले, पूरी तरह से समर्पित होकर मानने वाले।

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उन लोगों के दोहरे मापदंड (double standards) को उजागर करती है, जिनके दिलों में नबी ﷺ के फैसले के प्रति सच्ची निष्ठा नहीं होती। अल्लाह तआला फ़रमाता है कि जब इन मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमानों) के पक्ष में सच्चाई और हक़ होता है, यानी जब उन्हें यक़ीन होता है कि फैसला उनके हक़ में आएगा, तो वे बड़ी जल्दी और पूरी आज्ञाकारिता के साथ नबी ﷺ की ओर दौड़ते हुए आते हैं। वे अपने मुक़दमे का फैसला आप ﷺ से कराने में कोई देर नहीं करते, क्योंकि उन्हें पूरा भरोसा होता है कि आप ﷺ का फैसला हमेशा सच्चाई और इंसाफ़ पर आधारित होता है।

लेकिन यही लोग जब देखते हैं कि सच्चाई उनके विरोधी के पक्ष में है, तो वे आप ﷺ की अदालत में आने से कतराते हैं और अपने पुराने रिवाजों या किसी और को हक़म बनाना चाहते हैं। यह उनकी मंज़िली (hypocrisy) की साफ़ निशानी है। वे सच्चाई को नहीं मानते, बल्कि अपनी जीत को मानते हैं। वे इंसाफ़ के पक्षधर नहीं, बल्कि अपने नफ़्स के पक्षधर हैं।

इस आयत में हमारे लिए एक बहुत बड़ा सबक़ है। एक सच्चा मुसलमान वही है जो हर हालत में हक़ को क़बूल करे — चाहे वह उसके पक्ष में हो या उसके ख़िलाफ़। हमें चाहिए कि हमारा पैमाना सिर्फ़ और सिर्फ़ सच्चाई और इंसाफ़ हो, न कि अपना फ़ायदा और नफ़ा। नबी ﷺ का फैसला हमेशा हक़ पर होता था, और आज भी क़ुरआन और सुन्नत ही हमारे लिए हक़ का आख़िरी पैमाना हैं। जो शख्स हक़ को क़बूल करता है, अल्लाह उसे दुनिया और आख़िरत दोनों में इज़्ज़त देता है। और जो हक़ से मुँह मोड़ता है, वह खुद अपने नुक़सान का सामान करता है।

याद रखिए, ईमान का तक़ाज़ा है कि हम हर मामले में अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के फैसले को बिना किसी हिचकिचाहट के सिर झुकाकर क़बूल करें। यही वह रास्ता है जो हमें कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाता है।



📜 आयत 47-51 — सूरा अन-नूर

47وَيَقُولُونَ آمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُم مِّن بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ
और (जो लोग ऐसे भी है जो) कहते हैं कि ख़ुदा पर और रसूल पर ईमान लाए और हमने इताअत क़ुबूल की- फिर उसके बाद उन में से कुछ लोग (ख़ुदा के हुक्म से) मुँह फेर लेते हैं और (सच यूँ है कि) ये लोग ईमानदार थे ही नहीं
48وَإِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ
और जब वह लोग ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रदगिरदानी करता है
49وَإِن يَكُن لَّهُمُ الْحَقُّ يَأْتُوا إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ
और (असल ये है कि) अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए (चुपके) रसूल के पास दौड़े हुए आते
50أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ارْتَابُوا أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُ ۚ بَلْ أُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि (मुबादा) ख़ुदा और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- (ये सब कुछ नहीं) बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
51إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
ईमानदारों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको ख़ुदा और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने (हुक्म) सुना और (दिल से) मान लिया और यही लोग (आख़िरत में) कामयाब होने वाले हैं
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीअवतरण स्थान
49आयत

अनुवाद — अन-नूर 49

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Thursday, October 1, 2026

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