अन-नूर · 48/64
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नूर
وَإِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ ۝٤٨
Wa izaa du`ooo ilal laahi wa Rasoolihee li yahkuma bainahum izaa fareequm minhum mu`ridoon
📖 हिंदी अर्थ
और जब वह लोग ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रदगिरदानी करता है

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • دُعُوا – बुलाए जाएँ
  • لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ – ताकि वह उनके बीच फैसला करे
  • مُعْرِضُونَ – मुँह मोड़ने वाले, किनारा करने वाले

तफसीर:

जब ये मुनाफ़िक़ीन (दिखावटी मुसलमान) अपने झगड़ों और विवादों में किसी फैसले के लिए बुलाए जाते हैं कि अल्लाह की किताब (क़ुरआन) और उसके रसूल (ﷺ) की सुन्नत के अनुसार फैसला हो, तो उनमें से एक गिरोह साफ़ इनकार करते हुए मुँह मोड़ लेता है। वे इसलिए किनारा करते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि अल्लाह और उसके रसूल का फैसला उनके खिलाफ़ जाएगा, और वे अपनी मनमानी और स्वार्थ को सच्चाई पर तरजीह देते हैं। यह उनके निफ़ाक़ (दोहरेपन) की साफ़ निशानी है—जब हक़ उनके मतलब के खिलाफ़ होता है, तो वे उससे भागते हैं, हालाँकि यही हक़ उनके लिए बेहतर और सच्चाई है।

दावती पहलू:

यह आयत हर उस इंसान के लिए एक आईना है जो दावा करता है कि वह अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखता है। सच्चा ईमान सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं, बल्कि दिल और अमल से होता है। जब हमें किसी मामले में अल्लाह की किताब और रसूल (ﷺ) की सुन्नत की ओर बुलाया जाए, तो हमें बिना किसी हिचकिचाहट के उसे क़बूल करना चाहिए, चाहे वह हमारी इच्छाओं के खिलाफ़ ही क्यों न हो। याद रखिए—अल्लाह और उसके रसूल का फैसला ही सबसे बेहतर, सबसे न्यायपूर्ण और हमारे लिए सबसे फ़ायदेमंद होता है। जो इसे क़बूल करता है, वही सच्चा मोमिन है, और जो मुँह मोड़ता है, वह अपने नुक़सान का सामना खुद करता है। आइए, हम अपने जीवन के हर मामले—चाहे वह छोटा हो या बड़ा—को अल्लाह और उसके रसूल (ﷺ) के फैसले के सुपुर्द करें, क्योंकि इसी में हमारी दुनिया और आख़िरत की भलाई है।



📜 आयत 46-50 — सूरा अन-नूर

46لَّقَدْ أَنزَلْنَا آيَاتٍ مُّبَيِّنَاتٍ ۚ وَاللَّهُ يَهْدِي مَن يَشَاءُ إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
हम ही ने यक़ीनन वाजेए व रौशन आयतें नाज़िल की और खुदा ही जिसको चाहता है सीधी राह की हिदायत करता है
47وَيَقُولُونَ آمَنَّا بِاللَّهِ وَبِالرَّسُولِ وَأَطَعْنَا ثُمَّ يَتَوَلَّىٰ فَرِيقٌ مِّنْهُم مِّن بَعْدِ ذَٰلِكَ ۚ وَمَا أُولَٰئِكَ بِالْمُؤْمِنِينَ
और (जो लोग ऐसे भी है जो) कहते हैं कि ख़ुदा पर और रसूल पर ईमान लाए और हमने इताअत क़ुबूल की- फिर उसके बाद उन में से कुछ लोग (ख़ुदा के हुक्म से) मुँह फेर लेते हैं और (सच यूँ है कि) ये लोग ईमानदार थे ही नहीं
48وَإِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ
और जब वह लोग ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रदगिरदानी करता है
49وَإِن يَكُن لَّهُمُ الْحَقُّ يَأْتُوا إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ
और (असल ये है कि) अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए (चुपके) रसूल के पास दौड़े हुए आते
50أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ارْتَابُوا أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُ ۚ بَلْ أُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि (मुबादा) ख़ुदा और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- (ये सब कुछ नहीं) बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीअवतरण स्थान
48आयत

अनुवाद — अन-नूर 48

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Thursday, October 1, 2026

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