अन-नूर · 50/64
अनुवाद उच्चारण — सूरा अन-नूर
أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ارْتَابُوا أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُ ۚ بَلْ أُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ ۝٥٠
Afee quloobihim ma radun amirtaabooo am yakhaafoona ani yaheefallaahu `alaihim wa Rasooluh; bal ulaaa`ika humuz zaalimoon
📖 हिंदी अर्थ
क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि (मुबादा) ख़ुदा और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- (ये सब कुछ नहीं) बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं

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अनुवाद — Tafsir

शब्दार्थ:

  • मरज़ (मर्ज़): दिल की बीमारी, यहाँ मुराद निफ़ाक़ (दोहरापन) और कुफ़्र है।
  • इर्ताबू: शक करना, संदेह में पड़ना।
  • यहीफ़: ज़ुल्म करना, इंसाफ़ से हटकर फ़ैसला करना, किसी का हक़ मारना।

तफ़सीर:

अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों पर सख्त सवाल उठा रहे हैं जो रसूलुल्लाह ﷺ के फ़ैसले को क़बूल करने से कतराते हैं और उसकी तरफ़ बुलाए जाने पर अकड़ जाते हैं। अल्लाह फ़रमाता है: क्या इनके दिलों में निफ़ाक़ की बीमारी है? या इन्हें मुहम्मद ﷺ के नबी होने पर शक है? या इन्हें ये डर है कि अल्लाह और उसका रसूल इनके साथ इंसाफ़ नहीं करेंगे और इनके हक़ में ज़ुल्म करेंगे?

ये तीनों बातें बिल्कुल ग़लत और बेबुनियाद हैं। अल्लाह तो सबसे बड़ा आदिल (इंसाफ़ करने वाला) है, और उसका रसूल ﷺ भी हमेशा इंसाफ़ और हक़ पर चलता है। असल बात ये है कि इन लोगों के दिलों में हक़ के आगे झुकने की ज़िद और सरकशी है। ये लोग खुद ज़ालिम हैं, क्योंकि ये हक़ को छोड़कर बातिल की तरफ़ भागते हैं और अल्लाह के फ़ैसले को क़बूल करने के बजाय अपनी ख्वाहिशात (इच्छाओं) को तरजीह देते हैं।

अल्लाह ने यहाँ तीन सवाल उठाकर उनकी हर मुमकिन वजह को ख़त्म कर दिया, ताकि साफ़ हो जाए कि उनका इंकार सिर्फ़ ज़ुल्म और सरकशी की वजह से है, न कि किसी वाजिब वजह से। ये आयत हमें सिखाती है कि मोमिन का फ़र्ज़ है कि वो अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले पर बिना किसी शक के राज़ी हो जाए, क्योंकि अल्लाह का फ़ैसला ही सबसे बेहतर और इंसाफ़ पर आधारित होता है।

इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि हम अपने दिलों को निफ़ाक़, शक और अल्लाह के फ़ैसले पर एतराज़ से पाक रखें। अल्लाह और उसके रसूल का फ़ैसला हमारे लिए रहमत और भलाई है, चाहे हमारी समझ में वो कैसा भी लगे। जो शख्स अल्लाह के फ़ैसले पर दिल से राज़ी हो जाता है, अल्लाह उसके दिल को सुकून और इत्मिनान अता करता है और उसे दुनिया और आख़िरत की भलाईयाँ नसीब करता है।



📜 आयत 48-52 — सूरा अन-नूर

48وَإِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ إِذَا فَرِيقٌ مِّنْهُم مُّعْرِضُونَ
और जब वह लोग ख़ुदा और उसके रसूल की तरफ बुलाए जाते हैं ताकि रसूल उनके आपस के झगड़े का फैसला कर दें तो उनमें का एक फरीक रदगिरदानी करता है
49وَإِن يَكُن لَّهُمُ الْحَقُّ يَأْتُوا إِلَيْهِ مُذْعِنِينَ
और (असल ये है कि) अगर हक़ उनकी तरफ होता तो गर्दन झुकाए (चुपके) रसूल के पास दौड़े हुए आते
50أَفِي قُلُوبِهِم مَّرَضٌ أَمِ ارْتَابُوا أَمْ يَخَافُونَ أَن يَحِيفَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَرَسُولُهُ ۚ بَلْ أُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है या शक में पड़े हैं या इस बात से डरते हैं कि (मुबादा) ख़ुदा और उसका रसूल उन पर ज़ुल्म कर बैठेगा- (ये सब कुछ नहीं) बल्कि यही लोग ज़ालिम हैं
51إِنَّمَا كَانَ قَوْلَ الْمُؤْمِنِينَ إِذَا دُعُوا إِلَى اللَّهِ وَرَسُولِهِ لِيَحْكُمَ بَيْنَهُمْ أَن يَقُولُوا سَمِعْنَا وَأَطَعْنَا ۚ وَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
ईमानदारों का क़ौल तो बस ये है कि जब उनको ख़ुदा और उसके रसूल के पास बुलाया जाता है ताकि उनके बाहमी झगड़ों का फैसला करो तो कहते हैं कि हमने (हुक्म) सुना और (दिल से) मान लिया और यही लोग (आख़िरत में) कामयाब होने वाले हैं
52وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَيَخْشَ اللَّهَ وَيَتَّقْهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْفَائِزُونَ
और जो शख्स ख़ुदा और उसके रसूल का हुक्म माने और ख़ुदा से डरे और उस (की नाफरमानी) से बचता रहेगा तो ऐसे ही लोग अपनी मुराद को पहुँचेगें
अन-नूरकुरान सूची
64आयत
मदनीअवतरण स्थान
50आयत

अनुवाद — अन-नूर 50

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Friday, October 2, 2026

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