अनुवाद — Tafsir
शब्दार्थ:
- मरज़ (मर्ज़): दिल की बीमारी, यहाँ मुराद निफ़ाक़ (दोहरापन) और कुफ़्र है।
- इर्ताबू: शक करना, संदेह में पड़ना।
- यहीफ़: ज़ुल्म करना, इंसाफ़ से हटकर फ़ैसला करना, किसी का हक़ मारना।
तफ़सीर:
अल्लाह तआला इस आयत में उन लोगों पर सख्त सवाल उठा रहे हैं जो रसूलुल्लाह ﷺ के फ़ैसले को क़बूल करने से कतराते हैं और उसकी तरफ़ बुलाए जाने पर अकड़ जाते हैं। अल्लाह फ़रमाता है: क्या इनके दिलों में निफ़ाक़ की बीमारी है? या इन्हें मुहम्मद ﷺ के नबी होने पर शक है? या इन्हें ये डर है कि अल्लाह और उसका रसूल इनके साथ इंसाफ़ नहीं करेंगे और इनके हक़ में ज़ुल्म करेंगे?
ये तीनों बातें बिल्कुल ग़लत और बेबुनियाद हैं। अल्लाह तो सबसे बड़ा आदिल (इंसाफ़ करने वाला) है, और उसका रसूल ﷺ भी हमेशा इंसाफ़ और हक़ पर चलता है। असल बात ये है कि इन लोगों के दिलों में हक़ के आगे झुकने की ज़िद और सरकशी है। ये लोग खुद ज़ालिम हैं, क्योंकि ये हक़ को छोड़कर बातिल की तरफ़ भागते हैं और अल्लाह के फ़ैसले को क़बूल करने के बजाय अपनी ख्वाहिशात (इच्छाओं) को तरजीह देते हैं।
अल्लाह ने यहाँ तीन सवाल उठाकर उनकी हर मुमकिन वजह को ख़त्म कर दिया, ताकि साफ़ हो जाए कि उनका इंकार सिर्फ़ ज़ुल्म और सरकशी की वजह से है, न कि किसी वाजिब वजह से। ये आयत हमें सिखाती है कि मोमिन का फ़र्ज़ है कि वो अल्लाह और उसके रसूल के फ़ैसले पर बिना किसी शक के राज़ी हो जाए, क्योंकि अल्लाह का फ़ैसला ही सबसे बेहतर और इंसाफ़ पर आधारित होता है।
इस आयत में हमारे लिए बड़ी नसीहत है कि हम अपने दिलों को निफ़ाक़, शक और अल्लाह के फ़ैसले पर एतराज़ से पाक रखें। अल्लाह और उसके रसूल का फ़ैसला हमारे लिए रहमत और भलाई है, चाहे हमारी समझ में वो कैसा भी लगे। जो शख्स अल्लाह के फ़ैसले पर दिल से राज़ी हो जाता है, अल्लाह उसके दिल को सुकून और इत्मिनान अता करता है और उसे दुनिया और आख़िरत की भलाईयाँ नसीब करता है।
📜 आयत 48-52 — अन-नूर
अनुवाद — अन-नूर 50
सूरा अन-नूर आयत 50 - पढ़ें, सुनें, अनुवाद, हिन्दी : क्या उन के दिल में (कुफ्र का) मर्ज़ (बाक़ी) है…सूरा आयत 50/64 — अन-नूर النور (मदनी). पढ़ें सुनें अनुवाद (हिन्दी). सुनें: अन-नूर सुनें, अन-नूर अनुवाद, अन-नूर mp3, अन-नूर pdf. आयत 48–52. हिंदी अर्थ: اردو.
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Tuesday, August 18, 2026
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