अन-नूर · 9/64
अनुवाद उच्चारण — अन-नूर
وَالْخَامِسَةَ أَنَّ غَضَبَ اللَّهِ عَلَيْهَا إِن كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ ۝٩
Wal khaamisata anna ghadabal laahi `alaihaaa in kaana minas saadiqeen
📖 हिंदी अर्थ
और पाँचवी मरतबा यूँ करेगी कि अगर ये शख्स (अपने दावे में) सच्चा हो तो मुझ पर खुदा का ग़ज़ब पड़े
📜

अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • الْخَامِسَةَ: पाँचवीं गवाही
  • غَضَبَ اللَّهِ: अल्लाह का क्रोध और प्रकोप
  • إِن كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ: यदि वह (पति) सच्चों में से हो (अपने आरोप में सच्चा हो)

तफ़सीर (व्याख्या):

यह आयत उस स्थिति की व्याख्या करती है जब एक पति अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाए और उसके पास चार गवाह न हों। इस्लामी कानून के अनुसार, पति को चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही देनी होती है कि वह अपने आरोप में सच्चा है। इसके बाद पत्नी को यह अधिकार दिया जाता है कि वह इस आरोप से बचने के लिए चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दे कि उसका पति झूठा है।

अब इस आयत में बताया गया है कि पत्नी की पाँचवीं गवाही यह होगी कि वह कहे: "मुझ पर अल्लाह का क्रोध हो, यदि मेरा पति (अपने आरोप में) सच्चा है।" यानी वह अपने ऊपर अल्लाह के ग़ज़ब की दुआ माँगती है, अगर वह झूठी हो और उसका पति सच्चा हो। यह एक बहुत बड़ी और गंभीर बात है, क्योंकि कोई भी इंसान अपने ऊपर अल्लाह का क्रोध नहीं माँगता जब तक कि वह सच्चाई पर दृढ़ न हो।

इस पाँचवीं गवाही के बाद पति और पत्नी के बीच अलगाव (तलाक़) कर दिया जाता है, और उनके बीच हमेशा के लिए अलगाव हो जाता है। यह इस्लामी न्याय प्रणाली की एक अद्भुत व्यवस्था है, जो दोनों पक्षों को न्याय दिलाती है और सच्चाई को सामने लाती है।

दावती पहलू:

यह आयत हमें सिखाती है कि इस्लाम ने परिवार की इज़्ज़त और पवित्रता की कितनी बड़ी रक्षा की है। एक तरफ जहाँ पति को अपनी पत्नी पर आरोप लगाने का अधिकार दिया गया है, वहीं पत्नी को भी अपनी बेगुनाही साबित करने का पूरा अवसर दिया गया है। यह व्यवस्था न्याय और समानता पर आधारित है, जो हमें बताती है कि अल्लाह का दीन कितना निर्दोष और संतुलित है।

इस आयत से हमें यह भी सीख मिलती है कि हमें अपने जीवन में सच्चाई को हमेशा अपनाना चाहिए, क्योंकि अल्लाह सच्चों के साथ है और झूठे लोगों पर उसका क्रोध नाज़िल होता है। यह हमारे लिए एक चेतावनी भी है कि हम कभी झूठी गवाही न दें और न ही किसी पर बिना सबूत के आरोप लगाएँ। अल्लाह हमें सच्चाई पर चलने की तौफ़ीक़ दे। आमीन।

🎧 सुनें

📜 आयत 7-11 — अन-नूर

7وَالْخَامِسَةُ أَنَّ لَعْنَتَ اللَّهِ عَلَيْهِ إِن كَانَ مِنَ الْكَاذِبِينَ
और पाँचवी (मरतबा) यूँ (कहेगा) अगर वह झूट बोलता हो तो उस पर ख़ुदा की लानत
8وَيَدْرَأُ عَنْهَا الْعَذَابَ أَن تَشْهَدَ أَرْبَعَ شَهَادَاتٍ بِاللَّهِ ۙ إِنَّهُ لَمِنَ الْكَاذِبِينَ
और औरत (के सर से) इस तरह सज़ा टल सकती है कि वह चार मरतबा ख़ुदा की क़सम खा कर बयान कर दे कि ये शख्स (उसका शौहर अपने दावे में) ज़रुर झूठा है
9وَالْخَامِسَةَ أَنَّ غَضَبَ اللَّهِ عَلَيْهَا إِن كَانَ مِنَ الصَّادِقِينَ
और पाँचवी मरतबा यूँ करेगी कि अगर ये शख्स (अपने दावे में) सच्चा हो तो मुझ पर खुदा का ग़ज़ब पड़े
10وَلَوْلَا فَضْلُ اللَّهِ عَلَيْكُمْ وَرَحْمَتُهُ وَأَنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ حَكِيمٌ
और अगर तुम पर ख़ुदा का फज़ल (व करम) और उसकी मेहरबानी न होती तो देखते कि तोहमत लगाने वालों का क्या हाल होता और इसमें शक ही नहीं कि ख़ुदा बड़ा तौबा क़ुबूल करने वाला हकीम है
11إِنَّ الَّذِينَ جَاءُوا بِالْإِفْكِ عُصْبَةٌ مِّنكُمْ ۚ لَا تَحْسَبُوهُ شَرًّا لَّكُم ۖ بَلْ هُوَ خَيْرٌ لَّكُمْ ۚ لِكُلِّ امْرِئٍ مِّنْهُم مَّا اكْتَسَبَ مِنَ الْإِثْمِ ۚ وَالَّذِي تَوَلَّىٰ كِبْرَهُ مِنْهُمْ لَهُ عَذَابٌ عَظِيمٌ
बेशक जिन लोगों ने झूठी तोहमत लगायी वह तुम्ही में से एक गिरोह है तुम अपने हक़ में इस तोहमत को बड़ा न समझो बल्कि ये तुम्हारे हक़ में बेहतर है इनमें से जिस शख्स ने जितना गुनाह समेटा वह उस (की सज़ा) को खुद भुगतेगा और उनमें से जिस शख्स ने तोहमत का बड़ा हिस्सा लिया उसके लिए बड़ी (सख्त) सज़ा होगी
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अनुवाद — अन-नूर 9

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Tuesday, August 18, 2026

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