अल-फुरकान · 32/77
अनुवाद उच्चारण — सूरा अल-फुरकान
وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْآنُ جُمْلَةً وَاحِدَةً ۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِ فُؤَادَكَ ۖ وَرَتَّلْنَاهُ تَرْتِيلًا ۝٣٢
Wa qaalal lazeena kafaroo law laa nuzzila `alaihil Quraanu jumlatanw waahidah; kazaalika linusabbita bihee fu`aadaka wa rattalnaahu tarteelaa
📖 हिंदी अर्थ
और कुफ्फार कहने लगे कि उनके ऊपर (आख़िर) क़ुरान का कुल (एक ही दफा) क्यों नहीं नाज़िल किया गया (हमने) इस तरह इसलिए (नाज़िल किया) ताकि तुम्हारे दिल को तस्कीन देते रहें और हमने इसको ठहर ठहर कर नाज़िल किया

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अनुवाद — Tafsir

शब्दों के अर्थ:

  • جُمْلَةً وَاحِدَةً: एक साथ, एक ही बार में (जैसे तौरात, इंजील और ज़बूर उतारे गए थे)।
  • لِنُثَبِّتَ بِهِ فُؤَادَكَ: ताकि इसके द्वारा हम आपके दिल को मज़बूत करें (आपके सीने को क़ुरआन के नुज़ूल से इत्मिनान और सुकून दें)।
  • وَرَتَّلْنَاهُ تَرْتِيلًا: और हमने इसे थोड़ा-थोड़ा करके, स्पष्ट रूप से, अच्छी तरह समझा-समझाकर उतारा।

तफ़सीर (व्याख्या):

जब काफ़िरों ने देखा कि क़ुरआन करीम एक ही बार में नाज़िल नहीं हुआ, बल्कि 23 साल की अवधि में थोड़ा-थोड़ा करके उतरा, तो उन्होंने आपत्ति जताई और कहा: "इस पैग़म्बर पर पूरा क़ुरआन एक ही बार में क्यों नहीं उतारा गया, जैसे पहले की किताबें (तौरात, इंजील, ज़बूर) एक ही बार में उतारी गई थीं?" उनका यह कहना वास्तव में एक बहाना था, क्योंकि उनका असली मक़सद सच्चाई को मानना नहीं था, बल्कि झगड़ा और इंकार करना था।

अल्लाह तआला ने इसका जवाब दिया कि हमने क़ुरआन को इसी तरह (थोड़ा-थोड़ा करके) इसलिए उतारा ताकि तुम्हारे दिल को मज़बूत किया जाए। जब भी कोई नई मुश्किल, कोई नया सवाल या कोई नई घटना पेश आती, तो उसी के अनुसार क़ुरआन की आयतें उतरतीं, जिससे पैग़म्बर ﷺ के दिल को तसल्ली होती और उनका यक़ीन और बढ़ता। यह एक बड़ी रहमत थी कि क़ुरआन धीरे-धीरे उतरा, ताकि उसे आसानी से हिफ़्ज़ (कंठस्थ) किया जा सके, उसके मायने समझे जा सकें और उस पर अमल किया जा सके।

अल्लाह ने फ़रमाया: "और हमने इसे रुक-रुक कर, स्पष्ट रूप से उतारा" यानी हमने इसे थोड़ा-थोड़ा करके, साफ़ और वाज़ेह अंदाज़ में उतारा, ताकि लोगों के लिए इसे समझना, याद करना और उस पर चलना आसान हो। यह कोई कमी नहीं, बल्कि इसी में क़ुरआन की अज़मत और हिकमत है।


दावती पहलू (प्रेरणादायक संदेश):

इस आयत से हमें यह सबक मिलता है कि अल्लाह का हर काम हिकमत (बुद्धिमत्ता) से भरा होता है। क़ुरआन का तदरीजी (क्रमिक) नुज़ूल हमारे लिए रहमत था, ताकि हम इसकी हर आयत को अच्छी तरह समझें, उस पर ग़ौर करें और उसे अपनी ज़िंदगी में लागू करें। यह हमें सिखाता है कि दीन को समझना और उस पर अमल करना एक मंज़िल है, जिसे हमें सब्र और हिम्मत के साथ हासिल करना है। जिस तरह अल्लाह ने पैग़म्बर ﷺ के दिल को क़ुरआन से मज़बूत किया, उसी तरह आज भी जो लोग क़ुरआन को पढ़ते हैं, समझते हैं और उस पर अमल करते हैं, अल्लाह उनके दिलों को सुकून और इत्मिनान देता है। क़ुरआन हर दौर में ज़िंदा किताब है, और जो इसे थाम लेता है, वह कभी गुमराह नहीं होता।



📜 आयत 30-34 — सूरा अल-फुरकान

30وَقَالَ الرَّسُولُ يَا رَبِّ إِنَّ قَوْمِي اتَّخَذُوا هَٰذَا الْقُرْآنَ مَهْجُورًا
और (उस वक्त) रसूल (बारगाहे ख़ुदा वन्दी में) अर्ज़ करेगें कि ऐ मेरे परवरदिगार मेरी क़ौम ने तो इस क़ुरान को बेकार बना दिया
31وَكَذَٰلِكَ جَعَلْنَا لِكُلِّ نَبِيٍّ عَدُوًّا مِّنَ الْمُجْرِمِينَ ۗ وَكَفَىٰ بِرَبِّكَ هَادِيًا وَنَصِيرًا
और हमने (गोया ख़ुद) गुनाहगारों में से हर नबी के दुश्मन बना दिए हैं और तुम्हारा परवरदिगार हिदायत और मददगारी के लिए काफी है
32وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوْلَا نُزِّلَ عَلَيْهِ الْقُرْآنُ جُمْلَةً وَاحِدَةً ۚ كَذَٰلِكَ لِنُثَبِّتَ بِهِ فُؤَادَكَ ۖ وَرَتَّلْنَاهُ تَرْتِيلًا
और कुफ्फार कहने लगे कि उनके ऊपर (आख़िर) क़ुरान का कुल (एक ही दफा) क्यों नहीं नाज़िल किया गया (हमने) इस तरह इसलिए (नाज़िल किया) ताकि तुम्हारे दिल को तस्कीन देते रहें और हमने इसको ठहर ठहर कर नाज़िल किया
33وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا
और (ये कुफ्फार) चाहे कैसी ही (अनोखी) मसल बयान करेंगे मगर हम तुम्हारे पास (उनका) बिल्कुल ठीक और निहायत उम्दा (जवाब) बयान कर देगें
34الَّذِينَ يُحْشَرُونَ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ إِلَىٰ جَهَنَّمَ أُولَٰئِكَ شَرٌّ مَّكَانًا وَأَضَلُّ سَبِيلًا
जो लोग (क़यामत के दिन) अपने अपने मोहसिनों के बल जहन्नुम में हकाए जाएगें वही लोग बदतर जगह में होगें और सब से ज्यादा राह रास्त से भटकने वाले
अल-फुरकानकुरान सूची
77आयत
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32आयत

अनुवाद — अल-फुरकान 32

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Friday, October 2, 2026

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